शनिवार, 8 सितंबर 2012

मोहसिन ‘तन्हा’ की 2 ग़ज़लें


ग़ज़ल
क़ैफ़ की इन ख़ुमारियों से डर लगता है,
मुझको मेरी दुश्वारियों से डर लगता है ।

अबके रमज़ान में भी न गए हम पढ़ने तराबी,
मस्जिद की चहार दीवारियों से डर लगता है ।

क़ौम परस्ती का जज़्बा लिए फिरते हो दिल में,
मुझको मुल्क़ की बीमारियों से डर लगता है ।

न शोलों की परवाह है न ही ख़ाक होने की,
मुझको तो चिंगारियों से डर लगता है ।

अब न जाते हैं अमीर दोस्तों की महफ़िलों में,
मुफ़लिसी में दिलदारियों से डर लगता है ।

रह न जाऊँ कहीं दो राहों के बीच ‘तन्हा’,                                                
मुझको मेरी ख़ुद्दारियों से डर लगता है ।

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ग़ज़ल
बात तेरी आँखों की नहीं निगाहों की थी,
तू गुनाहगार नहीं ज़िंदगी गुनाहों की थी ।

चलता रहे उम्रभर कोई और मंज़िल न मिले,
ग़लती उसकी थी या राहों की थी ।

सिर झुकाता रहा मैं शान में दूसरों की,
उम्र सारी मेरी पनाहों की थी ।

मिटाने को कोई क़सर न छोड़ी थी सबने,
साथ मेरे ताक़त उसकी दुआओं की थी ।

डॉ.मोहसिन ख़ान
सहायक प्राध्यापक हिन्दी
जे. एस. एम. महाविद्यालय,
अलिबाग – जिला – रायगढ़
महाराष्ट्र – पिन - ४०२ २०१

ई – मेल : Khanhind01@gmail.com

5 blogger-facebook:

  1. तू गुनाहगार नहीं ज़िंदगी गुनाहों की थी ।

    ग़लती उसकी थी या राहों की थी ।

    kya shabd kahe hain khan ji ........

    उत्तर देंहटाएं
  2. क़ौम परस्ती का जज़्बा लिए फिरते हो दिल में,
    मुझको मुल्क़ की बीमारियों से डर लगता है
    achhi ghazal.

    उत्तर देंहटाएं
  3. विजय वर्मा जी, धन्यवाद ! आपने ग़ज़ल पढ़ी । हमसे भी बढ़कर हमारा मुल्क़ होता है, केवल नारे लगाने, जयंतियाँ मनाने, मोमबत्ती जलाने से देशभक्ति नहीं होती, देश को हर पल संवारना पड़ता है ।

    डॉ.मोहसिन ख़ान

    उत्तर देंहटाएं
  4. मनमोहन जी, धन्यवाद ! यह तो आपकी इनायत है, जो आप तारीफ़ कर रहे हैं, वरना हमारी क्या हस्ती है, ग़ज़ल कहने की ।

    आपका

    डॉ.मोहसिन ख़ान

    उत्तर देंहटाएं
  5. चलता रहे उम्रभर कोई और मंज़िल न मिले,
    ग़लती उसकी थी या राहों की थी ।ati sundr rachna dr mohsin khan ji

    उत्तर देंहटाएं

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