शनिवार, 22 सितंबर 2012

रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -87- किशोर पटेल की कहानी : मौक़ा

कहानी

मौक़ा

किशोर पटेल

दक्षिण गुजरात के एक छोटे से शहरनुमा गांव में एक समाज भवन का निर्माण होना था. चन्दा इकट्ठा किया जा रहा था. पिछले कुछ वर्षो में विकास हो रहे इस गांव में बिजलीकरण और प्लंबिंग के छोटे-बड़े कामों से महेश ने अच्छी आमदनी की थी. कुछ अरसे पहले ही उस के पिता नारणभाई की मृत्यु हुई थी. अपने पिता के नाम उसने रुपये दो लाख की राशि चंदे में दी. समाज के कार्यकर्ताओं ने निर्माणाधीन भवन के भूमिपूजन के अवसर पर महेश को सपरिवार बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया. महेश की पत्नी मीना को बहुत आनंद हुआ. पहली बार किसी ने अपने पति को इस सन्मान के लायक समझा था. मारे ख़ुशी के कार्यक्रम के अगले दिन देवर-देवरानी को अपनी तरफ से न्योता देने वह उन के घर चली गई.

महेश के दिल में अपने छोटे भाई नरेश के लिए बहुत स्नेह था. काम की व्यस्तता के कारण वह चाहते हुए भी अपने छोटे भाई से ज्यादा मिल नहीं पाता था. नरेश एक या दूसरे कारण बना कर बड़े भाई से मिलना टाल देता था. दोनों की स्त्रियों के बीच अच्छा मेलजोल था.

नारणभाई के छोटे बेटे नरेश ने बड़े भाई के मुकाबले धन तो नहीं कमाया था पर नाम बड़ा अर्जित किया था. लोग उसे नारणभाई का असली उत्तराधिकारी कहते थे. गांव की स्कूल के हेड मास्टर रह चुके नारणभाई गांधी विचारों से प्रभावित थे. गांव में व्यसन मुक्ति और सामाजिक सुधार के प्रयास वह आजीवन करते आये थे. छोटे मोटे सांसारिक मसले पर लोग नारणभाई की सलाह लेने आते थे. स्कूल में महेश लगातार फ़ेल होता था जब कि नरेश हमेशा अव्वल आता था. शिक्षा पूर्ण होने पर उसे गांव के ही स्कूल में शिक्षक की नौकरी मिल गई थी. पिता की छाँव में बड़े हुए नरेश ने पिता के जैसे बोलना सीख लिया था. नारणभाई के निधन के बाद लोग नरेश के पास सल्ला-मशवरा करने आने लगे. नरेश अपने पिता के वचनों को दोहरा कर नाम और कीर्ति कमाने लगा था.

चंदे के लिए जब लोग उस के पास आये तो उस ने हाथ उपर कर दिए.   'हां अगर आप लोग चाहेंगे तो एक अच्छा सा भाषण जरुर दूंगा!' उसने कहा था. गांव के भोले भाले कार्यकर्ताओं ने इसे भी अपना नसीब समझा और बड़े जोरों से प्रचार में जुट गए: “हमारे दिवंगत नेता नारणभाई के महान सुपुत्र नरेशभाईजी इस मौके पर उपस्थित रहेंगे!”

भाभी जबसे आई थी नरेश ने अपने आप को कमरे में बंद कर लिया था. उसे भाषण तैयार करना था. वह ऐसा भाषण देना चाहता था जिसे सुन कर लोग न सिर्फ तालियां बजाये, ये भी कहे कि कितने ग्यानी है हमारे नरेश भाईजी!

मीना कई देर तक अपनी देवरानी से बतियाते रही. दोनों की अच्छी पटती थी. स्वाभिमानी देवरजी की पीठ पीछे मीना देवरानी को आर्थिक मदद किया करती थी. निर्मला ने बच्ची के जरिये अन्दर संदेशा भी भेजा कि एक बार भाभी से मिल लो. पर नरेश अपने कर्त्तव्य से नहीं चूका. पूरे दो घंटे वह अपने अति महत्त्व के काम में डूबा रहा. पति की ओर से निर्मला ने जेठानी से माफ़ी मांगी तो मीना बोल पड़ी, 'अरे बहेन, देवरजी हमारे जैसे आम इंसान नहीं है! अगर कुछ काम में वे व्यस्त है तो ठीक है ना, खामखां क्यूं उनका वक़्त जाया करें हम?' 

यह सुन कर नरेश बड़ा खुश हुआ. काम में डूबे होने का ढोंग करते हुए बाहर औरतें की बातें सुनने के लिए उस ने कान लगा रखे थे.

औरतें अक्सर फ़िज़ूल की बातें किया करती है. नरेश को लगा की वह अपना कीमती समय बर्बाद कर रहा है. लेकिन जब घर की मरम्मत की बात निकली तो नरेश चौकन्ना हो गया. निर्मला ने कहा कि घर में कई सारी जगह काम करवाने की जरुरत है. कम से कम बीस पच्चीस हजार तो लग ही जायेंगे. निर्मला कई बार इस बात को लेकर पति का माथा खा चूकी थी. नरेश यह जानने बेताब था कि भाभी क्या कहती है. भाभी ने बहुत ही धीमे से कहा कि 'कहो तो तुम्हारे जेठ से बात चलाऊं?' निर्मला घभरा कर फ़ौरन बोल पड़ी. 'हाय बहना, ऐसा गजब मत करना. तुम्हारे देवरजी मेरी चटनी बना देंगे! उन को यह कभी मंजूर नहीं होगा!' बात आई गई हो गई. कल समारोह में कौन से वस्त्र पहनने है और कौनसे जेवरात से शोभा बढ़ानी है इस बात में औरतें लग गई.

नरेश का मन विचलित हो उठा. किसी तरह उसने काम में मन लगाने कि कोशिश की.

जेठानी तो निमंत्रण दे कर चल दी. निर्मला को अपने पति का व्यवहार ठीक नहीं लगा. इसी विषय में कुछ कहने के लिए वह पति के कमरे में गई तो नरेश ने उसे झाड़ दिया. 'छोटी छोटी बातों के लिए मेरे पास वक़्त नहीं है निर्मला! तुम्हारे पति का जन्म ही बड़े कामों के लिए हुआ है!’

निर्मला को भी गुस्सा आ गया. बोली, 'अपने बड़ों का आदर करना क्या छोटी बात है?'

'आदमी सिर्फ धन-दौलत से बड़ा नहीं होता!' नरेश के दिल की बात जुबान पर आ गई. 'बड़े भाईसाहब ने कैसे धंधे कर के धन कमाया है यह मैं जानता हूं. मेरा मुंह मत खुलवाओ! आइंदा ऐसी बातों के लिए मुझसे उम्मीद मत रखो!' निराश हो कर निर्मला लौट गई.

नरेश फिर अपने काम में जुट गया. लेकिन वह अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर पा रहा था. अगले दिन क्या माजरा होगा यही सोच में वह डूब गया. दो लाख का चन्दा मामूली नहीं होता. महेशभाई का खूब मान-सन्मान होगा यह सोच कर उस का दिल डूबा जा रहा था.

सजी धजी लडकियां महेशभाई और भाभी को चन्दन का तिलक लगाएंगी...स्वागत में गीत गायेंगी... उन की आरती उतारी जायेगी...समाज के एक मुखिया फूलों की माला पहनाएंगे... दूसरा मुखिया भाई का परिचय देते हुए उन्होंने अपने धंधे में की हुई प्रगति की दास्तान सुनाएगा...और यह सब होगा उस की उपस्थिति में.

नरेश यह सब सोचते हुए पागल हुआ जा रहा था. स्कूल में अव्वल तो मैं आता था. क्या मिला मुझे?  यही फ़ालतू की नौकरी? लोगों की वाह वाही से किसी का पेट तो नहीं भरता! और उन को देखो! साल दर साल फेल होते थे! आज वो कहां है और मैं कहां हूं? आये दिन महफिलें सजती हैं उन की कोठी पर! हां ठीक है, मेहनत की है उन्होंने. लेकिन कोई आदमी क्या सिर्फ मेहनत करने से उपर उठता है? गोलमाल तो अवश्य की होगी. बड़े बड़े सरकारी कोन्ट्रेक्ट ऐसे ही मिलते है भला किसी को? कई साहबों की मुठ्ठी गर्म की होगी उन्होंने! अब यही दो लाख के चन्दा की बात ले लो. यह कोई दान-धर्म नहीं है. रिश्वत है रिश्वत. समाज के इस भवन के बिजलीकरण और प्लंबिंग और न जाने और कौन कौन से कांट्रेक्ट भी इन्ही को मिलेंगे! जाहिर बात है! दो लाख का चन्दा दे कर बीस पच्चीस लाख का मुनाफा तो अवश्य ही कमा लेंगे भाई साहब!

उसने अपने भाषण पर एक नजर डाली. बच्चों में शिक्षा का महत्त्व. वही घिसी पीटी फ़ालतू बात. नहीं, यह नहीं, कुछ ऐसा कहे कि लोग चौकन्ने हो जाए. लेकिन क्या?   

यकायक नरेश के दिमाग में एक विचार बिजली की तरह दौड़ा. क्यों न इसी मौके पर भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया जाए? जनजीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार के मुद्दे की आड़ में भाईसाहब की पोल खोलने का सुनहरी मौक़ा!

नरेश को अपनी बुद्धिमत्ता पर गर्व हुआ. दो घंटे से जो भाषण वह लिख रहा था उसे उसने फाड़ दिया. रात के खाने का बुलावा आया फिर भी वह अपने क्रांतिकारी काम में जुटा रहा. देर रात तक उसने अपना भाषण लिखा. बार बार लिखा और उसे अधिक से अधिक पैना बनाया. दुनिया के जाने माने लीडरों की उक्तियों का सन्दर्भ देते हुए अपने भाषण को उसने खूब संवारा सजाया.  

अब उसे अच्छी नींद आ गई, खाली पेट.

* * *

दुसरे दिन इतवार की छुट्टी थी. सुबह के चाय-नाश्ते के बाद नरेश ने पत्नी और बच्ची दोनों को सामने बिठा कर अपने भाषण का पठन किया. बच्ची तो बीच में ही सो गई, निर्मला ने कहा, 'इतना समजती हूं कि आपने बड़े भाई साहब को निशाना बनाया है.'

नरेश खुश हो गया. 'निर्मला, तुम तो बड़ी बुद्धिमान निकली!'  वह मन ही मन कहने लगा कि इसे समज में आ गया यानी सब को समज में आयेगा.

'आप यह ठीक नहीं कर रहें है. भाई साहब वैसे नहीं है जैसे आप समज रहें है!'

नरेश क्रोधित हो उठा. 'चुप कर मूर्ख औरत! मुझे मत सिखा क्या ठीक है और क्या नहीं!'      

* * *

समारोह में बिलकुल वैसे ही हुआ जैसी नरेश ने कल्पना की थी. मंच पर वह एक कुर्सी में बैठा रहा और अपने बड़े भाई का भव्य स्वागत अपनी आंखों से देखता रहा. उस के अंगांग में अग्नि की ज्वालाएं भड़कती रही. किसी तरह वह अपने आप को समझाता रहा की नरेशभाईजी, थोड़ा सा सब्र करो, आप की भी बारी आने वाली है.

एक-दो मुखिया के प्रासंगिक उद्बोधन के बाद मुख्य अतिथि विशेष महेशभाई को अनुरोध किया गया कि दो शब्द वह कहें. महेश भाई ने बड़े ही सकुचाते हुए समाज के कार्यकर्ताओं का आभार प्रकट किया. उन्होंने कहा कि वह अच्छा काम कर रहें है तब जा कर उसे कुछ करने का मौक़ा मिला है. मेरे पूज्य पिताजी के विषय में कुछ कहने की  मेरी पात्रता नहीं है. मैं तो मजदूर आदमी हूं. शिक्षित पिता की छत्र छाया होते हुए मैं आवारागर्दी करता रहा और अनपढ़ ही रह गया. मुझसे भी ज्यादा सन्मान के अधिकारी तो मेरे छोटे भाई नरेशभाईजी है जिन्होंने पूज्य पिताजी के नक़्शे कदम पर चलते हुए एक मिसाल कायम की है. समाजकार्य की जो भावना नरेशभाईजी  में है उस का थोड़ा सा भी अंश मुझ में आ जाए तो मैं उसे अपना भाग्य समझूंगा.

लोगों ने खूब तालियां पीटी. भाईसाहब की बातें सुन कर निर्मला की आंखों में पानी आ गया और नरेश हक्का बक्का रह गया.

महेशभाई के हाथो दीप प्रज्वलन होना था. इस मौके पर उन्होंने नरेश को अपने साथ बुला लिया. नरेश को समज में नहीं आया की क्यों उस के हाथ कांप रहे थे. जब नरेश को दो शब्द बोलने का अनुरोध किया गया तब अपने विस्फोटक भाषण का एक शब्द भी वह बोल नहीं पाया. उसने कहा, 'भाईसाहब ने आज मेरा बहुत बड़ा सन्मान किया है. पूज्य पिताजी के बारे में कुछ कहने के लिए मैं तो उनसे भी छोटा हूं.'  

लोगों ने फिर ढेर सारी तालियां पीटी. निर्मला की आंखें अब की बार खूब बरसी.

* * *

देर रात तक निर्मला पति के पैर दबाती रही. शाम की घटना याद कर के फिर उस की आंखों में पानी उमड़ा.

कहने लगी, 'आज भाई साहब ने आप को कितना मान दिया! और आप है कि उन के खिलाफ बोलने के लिए हमेशा तैयार रहते है!'

क्या कहता नरेश? उस ने आंखे मूंद ली.

निर्मला ने कहा, 'अच्छा हुआ आपने कुछ अनाप शनाप बकवास नहीं किया.'

नरेश चिढ़ उठा. बोला, 'अब तू बकवास बंध कर, मुझे नींद आ रही है!'

निर्मला एक बात पूछना चाहती थी. बोल उठी, 'आपने मेरे गले में जो हार था वह देखा था?'  नरेश ने वह चमकता हार देखा था पर उस के बारे में कोई सोच-विचार या पृच्छा करने कि मन:स्थिति में नहीं था. निर्मला ने कहा, 'भाभीजी ने दिया था.’ नरेश कुछ बोला नहीं. ‘बड़ा आग्रह कर के दिया था उन्होंने जब कल आई थी.'

नरेश को मौक़ा मिल गया. वह कैसे चुप रह पाता? बोल उठा, 'क्यों न देती? पता है ना हार तो वापस आ जाएगा! रुपये देती तो थोड़ी ना वापस आते?'

निर्मला कुछ समज नहीं पाई. 'रुपये? कैसे रुपये?'

'अरे बेवकूफ औरत! इतना नहीं समझती?  क्यूं दिया दो लाख का चन्दा?  नाम कमाने के लिए! पचीस हजार हमें दे देते घर की मरम्मत के लिए तो थोड़ी उन का नाम होता?'  

निर्मला की आंखें फिर बहने लगी.

नरेश गुस्सा हो गया. उसने कहा, 'मूर्ख औरत! रोना तो मुझे चाहिए! देखा,  भाईसाहब ने लोगों के सामने मेरी तारीफ़ के पुल बांध दिए! कितनी गंदी राजनीति! उन की गोलमाल का पर्दाफाश करने का   सुनहरा मौक़ा आया था! छीन लिया मेरे हाथों से! कितने नीच आदमी है!'

नरेश को यह बिलकुल समझ में नहीं आया कि निर्मला क्यों और कैसे बेसुध हो कर गिर गई.

* * *

Dahisar (East), Mumbai-400068.

Email: keyshorpatel@gmail.com

3 blogger-facebook:

  1. वाह, किशोर भाई , बढ़िया कहानी है.... :)

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  2. धन्यवाद राजूभाई! आप को मेरी यह कहानी अच्छी लगी यह जान कर ख़ुशी हुई. टिपण्णी करने के लिए आभारी हूं.

    उत्तर देंहटाएं

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