मंगलवार, 11 सितंबर 2012

शरद जायसवाल की कविताएं

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1
परिधानों'
की
संस्कृति
पहले थी अमरबेल !
फिर
सेल
अब
कालबेल !!


2
वो
देखो
आए हैं घर में
सजाएंगे
संवारेंगे !
पंखुड़ी
पोर से कहती
नया
रिश्ता है ये अपना !!


3
गुल
हो गई
सभी की
सिट्टी - पिट्टी !
दुल्हन
के
पर्स में
आँगन की मिट्टी !!


4
हमारे
दिल को जो छू ले
वही तो
खास होता है
भले
वो दूर हो हमसे
हमारे
पास होता है !
जमा
है रक्त धमनी में

आंसू
लौट जाते हैं
हों
आँखें खुदबखुद गीली
वही
मधुमास होता है !!


5
सफ़र
कितना भी लम्बा हो
मंजिल
आ ही जाती है !
चले
इठला के बल खा के
थाली
में
चपाती है !!


6
अब
तो
बयां करते हैं
आँखों देखा
हाल !
पति
के
रूमाल !!


7
फलक
को
देखने वाले
पलक
पे
क्या बिठाएंगे !
कहाँ
घूंघट
कहाँ परदे
कहाँ
जुल्फों के साए हैं !!


8
आम
के
आम
गुठली के
दाम !
राशन
कार्ड में दर्ज़ हुआ
बहु का
नाम !!


9
सुबह
का
नाश्ता अक्सर
मुझको
मुंह चिढ़ाता है
आधा
मेम के ऑफिस
बचा
स्कूल जाता है !
फेरे

डाल के लाए
मुसीबत
अपने आँगन में
पड़ोसी
मुंह दबा हँसते
समय भी मुस्कुराता है !!


10
सुख
के
पलवे
भारी होते
दुःख
तो
काँटों में होता है !
इधर
झुके तो
टीस ह्रदय में

उधर
झुके तो
मन रोता है !!

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