गुरुवार, 27 सितंबर 2012

प्रेमचन्द्र की पुस्तक समीक्षा - ‘हिन्दी : विविध आयाम’

पुस्तक समीक्षा - ‘हिन्दी : विविध आयाम’

विविध रूपा हिन्दी के विविध आयाम

डॉ. प्रेमचन्द्र

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हिन्दी के विविध आयामों की संकल्पना अत्यंत व्यापक कार्य है। इससे संबंधित किसी भी बृहद संकलन का संपादन कार्य संपादक की रुचि एवं उत्तरादायित्व को दर्शाता है। लेखों के इस भाषायी संगम के सहारे मानव मूल्यों की विविध समस्याओं, साधनों एवं समाधानों की खोज की कोशिश एक महत्वपूर्ण प्रयास है। निस्संदेह विभिन्न लेखों के ऐसे समागन से हिन्दी की देशीय-विदेशीय स्थिति को पुष्ट करने वाली ऐतिहासिक प्रक्रिया को एक गति मिलती है। दोराय नहीं कि इससे हिन्दी प्रतिष्ठित होती है।

युवा लेखक आनंद पाटील द्वारा संपादित पुस्तक ‘हिन्दी : विविध आयाम’ का प्रकाशन हाल ही में तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली से हुआ है। यह पुस्तक सैंतालिस लेखों से समृद्ध एक ऐसा संकलन है, जिसमें हिन्दी भाषा के बहुआयामी स्वरूप, भाषिक संघर्ष और विकास पर गहन शोधपरक दृष्टि से विचार किया गया है। भाषा का सरोकार सदैव प्रासंगिक रहता है। इस दृष्टि से यह कृति वर्तमान हिन्दी भाषा की गति का तसदीक (टेस्टिमोनी) है। भाषा मानव की अभिन्न जीवन संगिनी होने के कारण मानवीय विकास की परिचायक भी है। लिफ़ाफ़ा देखकर खत का मजमून भाँप लेने वाली बात की तरह पुस्तक की संपादकीय पूर्वोक्ति – ‘बदलाहट की बयार और भाषायी अस्मिता’ भी विभिन्न लेखों की विषय-वस्तु पर एक सजग दृष्टिपात/हस्तक्षेप है। निश्चित रूप से हिन्दी को वर्तमान उदारीकरण, बाज़ारीकरण और भूमण्डलीकरण/वैश्वीकरण की नीति और स्थिति को संदर्भोचित रूप में देखा गया है। संपादक ने इसे ‘बिना सिर पैर की अंध विकासवादी प्रक्रिया’ माना है।

पुस्तक के अधिकांश लेखकों ने हिन्दी की वर्तमान दशा, इसका भाषिक गुण, वैश्विक प्रचार-प्रसार, इंटरनेट पर प्रयोग व तकनीकी विकास के साथ-साथ हिन्दी भाषा को युग की विविध चुनौतियों से पाठक का सीधा परिचय कराया है। मानव और उसकी सभ्यता की तरह जन्म, विकास, चुनौतियाँ और पतन का असर भाषाओं पर भी होता है। परंतु, तकनीकी इस संदर्भ में कितना हस्तक्षेप कर रही है, इस ओर भी लेखकों ने प्रकाश डाला है। पूर्वोक्ति में हिन्दी भाषा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को रेखांकित करते हुए युवा लेखक आनंद पाटील ने भविष्य में आने वाली चुनौतियों को ‘विकराल और मारात्मक’ माना है।

पुस्तक में संकलित तमाम लेखों में व्यक्त भाषा संबंधी विविध विचारों की हिन्दी के प्रति अपनी-अपनी चिंताएँ एवं सुझाव हैं। सार्वजनिक और सार्वकालिक होने के कारण भाषा के रूप, रचना एवं संरचना में होने वाला परिवर्तन अकाट्य है। परंतु इस परिवर्तन के दौरान हिन्दी के सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने हेतु अधिंकाश लेखकों ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारतीय भाषाओं के जिस सायुज्य (इंटिमेसी) की आकांशा दिखाई है, वह उल्लेखनीय है।

युवा लेखक आनंद पाटील की संपादकीय कुशलता इस बात में है कि उन्होंने पुस्तक की शुरुआत वरिष्ठ लेखक एवं समाजकर्मी सुरेश पंडित का लेख ‘समय में असरदार हस्तक्षेप करता हिन्दी लेखन’ से की जो हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रति सकारात्मक नज़रिये से भरपूर है और इस बात पर प्रकाश डालता है कि हिन्दी को सर्वांग संपीर्ण भाषा बनाने के लिए कई प्रयास हो रहे हैं। जिसमें भाषा, व्याकरण, शब्द कोश, एन्साइक्लोपीडिया, पर्यायवाची कोश, विश्‍व ज्ञान कोश आदि का बख़ूबी सृजन हो रहा है। हिन्दी में साहित्य से इतर क्षेत्रों यथा – कम्प्यूटर विज्ञान, इंजीनियरिंग, आयुर्विज्ञान, राजनीतिशास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र, समाज विज्ञान आदि अनुशासनों में हुए अनुसंधानों पर हिन्दी में लगातार मौलिक अनूदित पुस्तकें आ रही हैं तथा इनकी तकनीकी शब्दावली हिन्दी को अधिकाधिक समृद्ध बना रही है। यह पाठ हिन्दी में हो रहे दलित, आदिवासी, स्त्री-विमर्श को लेकर प्रचुर लेखन एवं विविध विधाओं के सृजन क्षेत्र की भी जानकारी देता है।

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए प्रो. सुवास कुमार का लेख ‘उच्च अध्ययन (पाठ्यक्रम) में हिन्दी साहित्य’ वर्तमान विश्‍वविद्यालयी शिक्षा पद्धति में हो रहे परिवर्तन पर प्रकाश डालता है और समयानुसार बदलते परिवेश में उच्च व उच्चतर पाठ्यक्रमों के स्वरूप-परिवर्तन की माँग करता है। इसके अंतर्गत वे साहित्यिकता, विषय की प्रासंगिकता, पाठ्यक्रमों का नवीनीकरण, तुलनात्मक अध्ययन, देश-विदेश में हिन्दी के विकास, अंतर विद्यावर्ती अध्ययन एवं ज्ञानानुशासनों के संदर्भ में हिन्दी को देखने-परखने की बात गंभीर तरीक़े से रखते हैं।

संकलित लेखों में प्रो. राजेन्द्र कुमार ने अपने लेख ‘हिन्दी : विविध रूप, विविध समस्याएँ’ के अंतर्गत ‘अनेक हिन्दी बोलियों के भरे-पूरे परिवार को संयुक्तता का बोध कराने वाला भाषिक अभिधान’ माना है। इसमें सभी बोलियों की आशाओं-आकांक्षाओं और उनके समुचित विकास को ज़रूरी माना गया है। लेख में क्षेत्रवाद और हिन्दी का द्वंद्व, भाषा स्वाभिमान, तथाकथित भूमण्डलीकरण की आँधी और भारतीय भाषाओं के साथ हिन्दी का कालग्रास बनना आदि भाषिक समस्याओं पर विचार व्यक्त किया है।

इसके अलावा वरिष्ठ मार्क्सवादी विचारक, साथी जी. पी. मिश्र (गिरिजा प्रसाद मिश्र) का लेख ‘औपनिवेशिक शिकंज़ें में सिसकती हिन्दी’ वर्तमान परिवेश में हिन्दुस्तान की भाषायी गुलामी को सिलसिलेवार बयाँ करता है। भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में हिन्दी को धता बताकर अंग्रेज़ी को प्रारंभिक परीक्षा में शामिल कर लेने और उसके अंक अंतिम मेरिट में जुड़ने की बात को वे सरकार की साज़िश मानते हैं। भाषा नीति के संबंध में सरकारी दुर्भाग्यपूर्ण रवैये को कई लेखों में रेखांकित किया गया है। अधिकांश लेख भाषा संबंधी हैं। कुछेक लेख एवं कविताएँ हिन्दी साहित्य, समाज, संस्कृति, मानव-मूल्य, वर्तमान परिवेश, सृजन की दशा एवं दिशा, तुलनात्मक अध्ययन, भाषायी-मानवीय अस्मिता, राष्ट्रीय सौहार्द एवं शिक्षा आदि विषय पर लिखे गये हैं। इन लेखों के अंतर्गत ‘कविता और भारतीय समाज’, डॉ. घनश्याम और शम्भु बादल की कुछ कविताएँ, ‘हिन्दी : रंगमंच के संदर्भ में’, ‘साहित्य-संस्कृति की सरिता सूखने कगार पर’, ‘उच्च अध्ययन (पाठ्यक्रम) में हिन्दी साहित्य’, ‘तुलनात्मक अध्ययन और अनुवाद’, ‘राष्ट्रीय सौहार्द और हिन्दी’ तथा ‘हिन्दी का सांस्कृतिक परिदृश्य’ आदि उल्लेखनीय हैं।

प्रो. राणा प्रताप ने ‘कविता और भारतीय समाज’ में स्थापित किया है कि ‘समाज विहीन कविता का अस्तित्व न के बराबर है। वह अपनी जिजीविषा और संघर्ष के बल पर ही लावण्यवान है अन्यथा वह वाग्जाल और शीशे के घरों में सजाने लायक शो पीस बनकर रह जाती है।' यह लेख कविता की विभिन्न परिभाषाओं से पूरित उनकी सार्थकता पर प्रकाश डालता है। प्रो. राणा प्रताप जैसे विद्वान लेखक ने कविता/साहित्य में ‘सरोकार’ को केन्द्र में रखा है। ‘सोशल चेन्ज’ और ‘लोकतन्त्र के प्रति विमोह’ इस लेख के मूल में है। कवि शम्भु बादल और घनश्याम ने अपनी कविताओं के सहारे वर्तमान भारतीय समाज के कटु सत्य को उकेरा है। जिसमें अन्ना है तो निगमानन्द भी हैं, अंधेरा है तो उजाले का आभास भी है। कवि की आवाज में वक्त की निराशा है, तो भविष्य के प्रति आशा और जिज्ञासा भी है। डॉ. घनश्याम की कविताएँ ‘खेत किसान बैल’, ‘बुर्जुआ’, ‘मदारी और वंशज’, ‘सिस्टम’, ‘कलम बनाम सरकार’ और ‘धूमिल को समर्पित’ आदि अपने शीर्षक मात्र से कथ्य का बोध कराती हैं। निस्संदेह कविताएँ सह्रदयी को सोचने पर बाध्य करती हैं।

नाटककार एवं रंगकर्मी अशोक पागल द्वारा लिखित ‘हिन्दी : रंगमंच के सन्दर्भ में’ लेख की ख़ासियत सामाजिक-सांस्कृतिक विकास में नाटकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को दर्शाना है। वे मानते हैं कि नाटक मूल्यों के संवाहक की भूमिका निभाते हैं। समतामूलक समाज की संरचना में नाटक का उल्लेखनीय योगदान होता है। वह समाज को जोड़ने में अन्तर्सूत्र का काम करते हैं। वही क्षमता हिन्दी भाषा में है। परन्तु लेखक इसके पीछे राजनीतिक मंशा और प्रान्तीयता को बाधक मानते हैं। यह ज्ञानवर्द्धक लेख हिन्दी नाटक के क्रमिक विकास को भी दर्शाता है।

डॉ. सरिता शुक्ल का लेख ‘साहित्य संस्कृति की सरिता सूखने के कगार पर’ के द्वारा भारतीय संस्कृति की अक्षुण्णता पर विचारधाराओं के खोखलेपन के संक बादलों को मण्डराते हुए दिखाया गया है। उन्होंने आधुनिक तकनीकी को मनुष्य और उसके सृजन के बीच में फूँस के रूप में देखा है। एक कदम आगे बढ़ते हुए वे मानती हैं कि आनेवाली सहस्त्राब्दी में भाषाओं और साहित्य का भविष्य बाज़ार तय करेगा। अनुवादक संतोष अलेक्स के लेख ‘तुलनात्मक अध्ययन और अनुवाद’ में सत्य की खोज और स्थापना का अनुवाद में तुलना को महत्त्वपूर्ण माना गया है। भारत जैसे बहुभाषी देश के लिए तुलनात्मक अध्ययन और अनुवाद दोनों ही भाषा तथा साहित्य के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। यह बात अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी लागू होती है। यह लेख हिन्दी का भारतीय एवं वैश्विक जुड़ाव और सुदृढ़ीकरण के प्रति आस्था एवं जागरूकता को चिन्हित करता है।

डॉ. आकाश भदौरिया का लेख ‘राष्ट्रीय सौहार्द और हिन्दी’ इक्कीसवीं सदी के सशंकित वातावरण और देशतोड़ बाज़ारी शक्तियों की साज़िश का पर्दाफाश करता है। उनका मानना है कि समग्रतामूलक राष्ट्रीय सौहार्द को बनाये रखने में हिन्दी की भूमिका हो सकती है।

पुस्तक के अधिकांश लेख हिन्दी भाषा से सम्बन्धित हैं। हिन्दी का उद्भव एवं विकास यात्रा, इसकी विभिन्न भूमिकाएँ, हिन्दी के लिए जनान्दोलन, हिन्दी का भाषिक वर्चस्व, अन्य भाषाओं से प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्थापना, अन्य भारतीय भाषाओं से इसका संबंध, एक भाषा के रूप में इसकी अनिवार्यता (मातृभाषा, संपर्क भाषा. राष्ट्रभाषा, राजभाषा) बाज़ार की भाषा, हिन्दी का इंटरनेट पर प्रयोग, ब्लागिंग तथा तकनीकी विकास आदि को लेकर लेखों की भरमार है। जिनमें से सभी शोधपरक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

गौरीनाथ का लेख ‘जन समाज बचे तभी तो भाषा बचेगी’ लेखक की ग्रामीण सांस्कृतिक चिन्ताओं को उजागर/प्रस्तुत करता है। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अश्विनी कुमार दूबे का लेख ‘हिन्दी की विकास यात्रा’ को दर्शाता है। डॉ. ओमप्रकाश पाण्डेय ने स्वयं सम्पादक होने के कारण ‘बदलते वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भूमण्डलीकरण और हिन्दी’ पर गहन रूप से अपनी बात रखी है। वे हिन्दी की महत्ता इसके विराट सांस्कृतिक महत्त्व के कारण अधिकतर भारतीय अस्मिता से, हिन्दी जन की अस्मिता से जोड़ते हैं। ‘विश्व पटल पर हिन्दी’ को लेकर डॉ. अनिल पतंग, डॉ. राजीव रावत, डॉ. प्रेमचन्द्र, अनीता पाटील, डॉ. मिथिलेश सिन्हा, विनायक काले, शिवानी खरे, अमरिश कुमार आदि के लेख महत्त्वपूर्ण हैं। इनसे हिन्दी की वैश्विक स्थिति, प्रयोग एवं गरिमा तथा विकास के साथ इसकी संभावनाएँ और चुनौतियों के बारे में भी सुदृढ़ जानकारी एवं नवीन तथ्य मिलते हैं।

हिन्दी भाषा एवं अन्य भारतीय भाषाओं के अस्तित्व/अस्मिता एवं वर्चस्व को लेकर डॉ. श्यामराव का लेख ‘सत्तातंत्र के वर्चस्व की भाषा बनाम हिन्दी’ और डॉ. प्रभा दीक्षित का लेख ‘वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिन्दी की अस्मिता’ ज्ञानवर्द्धक और विचारणीय है। डॉ. घनश्याम का लेख ‘हिन्दी : स्थिति एवं गति, दशा एवं दिशा’ सूचनाओं की भरमार है। उन्होंने हिन्दी को सर्वत्र गतिमान पाया है। यह एक प्रेरक लेख है। डॉ. आत्माराम ने आज के प्रबल बाज़ार तंत्र में हिन्दी भाषा के प्रयोग एवं उसके बाज़ारूपन पर गंभीर दृष्टिपात किया है। डॉ. ऋषभदेव शर्मा, डॉ. बली सिंह, डॉ. पूनम पाठक एवं कृष्ण प्रताप सिंह के लेख क्रमशः ‘हिन्दी के लिए जन आन्दोलन और संघर्ष’, ‘जन आन्दोलन और हिन्दी’, ‘हिन्दी और प्रान्तीय भाषाएँ : कुछ विचार, कुछ प्रश्न’ और ‘भूमिका तो सबसे बड़ी प्रतिरोध की है’ कुछ ऐसे लेख हैं, जो हिन्दी भाषा की सामाजिक भूमिका, उसके संघर्ष और अन्य भाषा-संस्कृति के साथ उसके अन्तर्सम्बन्ध पर विचार करते हैं। निश्चित रूप से ये विचार प्रश्‍नरहित नहीं है। इनमें राष्ट्रीय अस्मिता को शासन की कठपुतली तक मान लिया गया है, जिसे सम्भवतः जनजागरण से ही जगाया जा सकता है। प्रो. बिसवेश्वर प्रसाद केसरी ने एक शोधार्थी की तरह नवीन तथ्यों को उजागर करते हुए झारखण्ड की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में हिन्दी भाषा साहित्य का प्रभूत योगदान माना । अश्विनी कुमार पंकज का लेख भी ‘आदिवासी भाषाओं के साथ हिन्दी के अन्तसंबंध और अन्तर्द्वद्व’ पर प्रकाश डालता है। आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी भारत की मुख्यधारा से कटे हुए पूर्वोत्तर पर प्रो. सुशील कुमार शर्मा का लेख ‘पूर्वोत्तर का भाषाई-संसार और हिन्दी’ तथा डॉ. माधवेन्द्र प्रसाद पाण्डेय का लेख ‘पूर्वोत्तर का सांस्कृतिक वैविध्य और हिन्दी की भूमिका’ में वहाँ की भाषायी विविधता से पूर्ण आठों राज्यों की भौगोलिक संरचना एवं मुख्यतः सांस्कृतिक विविधता को समझाने का सराहनीय प्रयास किया गया है। इन जनजातियों की बोलियों के संसार, संस्कृति एवं वहाँ हिन्दी की स्थिति का अवलोकन करना मुख्यधारा से जुड़े समाज की नैतिक ज़िम्मेवारी है। भाषा के रूप में सांस्कृतिक समन्वयता स्थापित करने में हिन्दी की सर्वाधिक भूमिका होनी चाहिए।

हिम्मत सेठ ने ‘राष्ट्रभाषा और लिपि’ और प्रकाश जैन ने ‘हिन्दी : राष्ट्रभाषा की अनिवार्यता’ एवं रोहितेश्वर सैकिया ने ‘हिन्दी की संवैधानिक स्थिति’ के माध्यम से सदैव ज्वलन्त प्रश्नों को दुहराया गया है। दैनंदिन व्यक्तिगत जीवन, सामाजिक संदर्भ में एवं भारत जैसे विशाल राष्ट्र की भावात्मक एकता को कायम रखने की आकांक्षा सभी लेखों में प्रस्तुत है।

आज का युग सूचना क्रान्ति, प्रौद्योगिकी एवं मनोरंजन की भरमार का युग है। आज की बाज़ारवादी संस्कृति के माहौल में सबकुछ मीड़िया-मनोरंजन का हिस्सा है। फलतः जन संचार माध्यमों में हिन्दी भाषा का प्रयोग विविध कार्य/उद्देश्य हेतु, विविध रूप में हो रहा है। दूरदर्शन, मीड़िया, इंटरनेट (अंतरजाल) पर फैल रही हिन्दी के विभिन्न स्वरूपों पर कई लेख जैसे – डॉ. आत्माराम का लेख ‘हिन्दी का बाज़ार और बाज़ार की हिन्दी’, शिवानी खरे का ‘वेबसाइट निर्माता में हिन्दी अनुवाद की भूमिका’, डॉ. अलका प्रधान का ‘हिन्दी के विविध व्यवहार क्षेत्र’, शम्भु झा का ‘टीवी समाचारों में हिन्दी की बदलती शक़्लो सूरत’, डॉ. दिनेश कुमार चौबे का ‘हिन्दी मीडिया की भाषागत समस्याएँ’, संजय कृष्ण जी का ‘हिन्दी पत्रकारिता और हिन्दी’, डॉ. बलविंदर कौर का ‘मनोरंजन, विज्ञापन और हिन्दी’, डॉ. प्रतिभा येरेकार का ‘हिन्दी के विकास में दूरदर्शन का प्रदेय’, अमरीश कुमार का ‘यूनिकोड में संवरता हिन्दी का भविष्य’, रोहित गुप्त का ‘जन माध्यम व भाषा : एक संवाद’, विनायक काले का ‘हिन्दी में ब्लॉगिंग’ और अनीता पाटील का ‘हिन्दी का इंडिक लोकलाइज़ेशन’ आदि मिलते हैं। इनके लेखों के माध्यम से हिन्दी के अस्तित्व पर ही नहीं, बल्कि उसकी समृद्धि की संभावनाओं पर बात की गयी है। चाहे अख़बार हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ; शुद्ध मनोरंजन का क्षेत्र हो या शिक्षाप्रद कार्यक्रम आज हिन्दी सर्वत्र, सर्वजन हेतु संचार माध्यम, बुद्धिजीवियों की भाषा और सम्मानजनक प्रयोग की भाषा है। यही बात इन लेखों में उपादेय रूप में उभरकर सामने आती है। प्रायः ये लेख हिन्दी प्रयोग की उपादेयता के साथ इसे आने वाले समय की आवश्यकता की तरह भी देखते हैं। यही बात उल्लेखनीय है। हिन्दी भाषा को मनोरंजन के क्षेत्र में सामूहिक भारतीय स्मृति की धरोहर को सँजोने वाली बताया गया है।

‘हिन्दी : विविध आयाम’ युवा और प्रौढ़ लेखकों के लेखों से परिपूरित ग्रंथ है। सभी लेख अपनी बोद्धिक स्तर की भिन्नता के बावजूद हिन्दी भाषा के सर्व-क्षेत्रीय/विविध क्षेत्रीय, वैश्‍विक रूपों का परिबोध कराते हैं और हिन्दी के विकासशील स्वरूप पर प्रकाश डालते हैं। पिछले कुछ दशकों से हिन्दी का प्रयोग एवं प्रचलन विशाल से विशालतर एवं वैश्विक होता जा रहा है। ऐसे समय में हिन्दी की विविधता के बारे में जानकारी एवं अन्य ऐसी सामग्रियों की आवश्यकता महसूस की जा रही है, जो शोध कार्य एवं साधारण पाठक की ज्ञानपिपासा की पूर्ति करे। यह पुस्तक निस्संदेह इस दायित्व का निर्वहन करेगी। अपनी कुछेक कमियों के बावजूद यह पुस्तक भाषा-विचार एवं हिन्दी की वर्तमान एवं भविष्यगत संभावनाओं के साथ विराट विषय-वस्तु के कारण संदर्भ-ग्रंथ के रूप में अपनी बहुमूल्यता सिद्ध करती है। यह निश्चित रूप में न सिर्फ़ पठनीय बल्कि संग्रहणीय रचना है।

- डॉ. प्रेमचन्द्र

गुरुकुल विद्यापीठ, इब्राहिमपट्टणम्,

जिला : रंगारेड्डी, आंध्र प्रदेश (भारत)

चलवार्ता : +91 98490 56528

समीक्ष्य पुस्तक

 

‘हिन्दी : विविध आयाम’ (2012)

सं. आनंद पाटील

तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली

मूल्य : 600/-

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  1. टिप्पणीकार ने बहुत ही गहन एवं गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया है पुस्तक काऔर निश्चित ही बहुत सटीक समीक्षा की है जो कि पुस्तक के संपादक और समस्त लेखक वृंद के श्रम को सार्थक करने के साथ ही स्वयं डॉ प्रेमचंद के गंभीर और विश्वसनीय समालोचक होने का स्वतः प्रमाण है।
    पुस्तक के संपादक, लेखकों तथा समालोचक डॉ प्रेमचंद जी को मेरा नमन।
    सादर

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