रविवार, 9 सितंबर 2012

डाक्टर चंद जैन "अंकुर" की कविता - उत्तीष्ठ

सूर्य

उत्तीष्ठ.....
(जागरण गीत )
ये सूर्य  का आदेश है
इसकी किरणें निर्देश है
ये भोर है, ये नभ नयन
अब ये खुला, तू जाग जा
है यह प्रभा निर्माण की,
यह नव दिशा
दृश्य की पहली छटा,तू सो रहा
स्वर्ण आभा खो रहा
आ ........ह ये निश्चेतना
ये मानसी ,ये उर्वशी ,कोमलांगी
ये........गौर वर्ण ,काली घटा
मत रोक .....वो पौरुष पड़ा
सेज पर
तेरे संग में
ये ................
क्या शाख में लिपटी हुई तू बेल है
या सेज में सिमटी हुई तुम प्रेयसी
देख वो
बोझिल पड़ा पुरुषत्व है
आ .....ह ,अर्ध चेतना
कह रही ओस की बूंद ये
है यह अमावस अश्रुधारा
ये .....अब जाग जा
देख न, अब ये  उषा काल है
जा.....ग न ,ये किरणे वीणा की  तार है
अब ये , अश्रुधारा ,
जगमग हुआ अलंकृत
कोपलें
चींटियो की सेतु ये
धरा पर कल कल नदी की धार ये
श्वेत बगुले साथ में ,जैसे सैन्य दल आकाश में
शांति का उपदेश ले
वीर योद्धा चल पड़े
तू सो रहा ,
सब बढ रहे अग्रिम दिशा की ओर
संगीत पर, साज पर
किसी अनकही आवाज़ पर
ये किसका शासन
ये कैसा अनुशासन 
कम से कम उनसे पूछ ले
पलकें खो .......ल ,और मन से सूझ ले
ये गौतमी ,रत्नावली ,ओ उर्मिला
बुद्ध ,तुलसी और लखन की प्रेरणा
अग्नि में जलती विरहणी प्रियतमा
रक्त रंजित धर्म है और तुम कहाँ  ?
सत्य की अर्थी सजी है देख न
भ्रष्ट हाथों में, मेहँदी रची है देख न
कब तक जनेगी इस नपुंसक भीड़ को
कब तक सहेगी ऐसे प्रसव की वेदना
अब मत खो....ल पट्टी
धृतराष्ट्र  के सौगंध की
अब वज्र करना बंद कर
कौरवी संतान को
कंस कौरवदल मिटा दो
कृष्ण का सन्देश है
म़ातृ भूमि लुट रही है
अपनें हि तख्तो ताज़ में
वो  कृष्ण को पुकारती
कोई तो आगे बढ़ो
अब सींखचों में चीखता मातृत्व है
और तू कहाँ ,,,,,,,,,,,,
पाप की दरिया जला दो
शांति का उपदेश है
अब वैचारिक क्रांति हो
चाणक्य की ललकार है
जाग जा
अन्दर आग ला
तू भी  दीप्त है
तू भी  सूर्य है
अंदर कृष्ण है
अंदर अक्ष है
गुरुत्व का आधार ला
माँ से मांग ला
जा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ग जा
उत्ती ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ष्ठ |

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डाक्टर चंद जैन  "अंकुर "
रायपुर

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