सोमवार, 17 सितंबर 2012

दिलीप भाटिया का व्यंग्य - टीचर

टीचर

मैं, शिवानी, एक टीचर। भाई की इंजीनियरिंग में पापा का पूरा फंड फुंक गया। मैंने बी.ए., फिर ट्‌यूशन कर बी.एड.किया। प्राइवेट स्‍कूल में 4 वर्ष टीचर रही, दो हजार रूपए देते थे, तीन हजार पर साइन करवाते थे, पूरा तेल निकाल लेते थे। सच कहूं तो खून पी जाते थे। किसी तरह रो धो कर थर्ड ग्रेड टीचर सरकारी स्‍कूल के एक गांव में हो गई, अब तो आराम है। खूब सारी तनख्‍वाह मिलती है। मजे ही मजे हैं।

स्‍कूटी जानबूझ कर नहीं ली है। गांव जाने वाली बस जब पहुंचेगी तभी तो स्‍कूल का ताला खोलूंगी। बन्‍द भी उसी तरह से करना होता है। शिक्षा विभाग के आदेश स्‍कूलों के लिए अलग हैं, पर प्राइवेट बसों के समय पर किसी का आदेश लागू नहीं होता। गांव वाले बच्‍चों को पढ़ाना ही कौन सा चाहते हैं? खेत में मक्‍का काटनी है, घर का चौका चूल्‍हा करना है, परीक्षा है नहीं, कक्षा 8 तक फेल नहीं कर सकते। अगली कक्षा में चढ़ाना ही है फिर ये लड़कियाँ जिन्‍हें गणित, अंग्रेजी कुछ नहीं आती, दसवीं की बोर्ड की परीक्षा में पास भी कैसे होंगी? इसलिए इन्‍हें कोई ऐसा राजकुमार तो नहीं मिलेगा, जो इनके लिए बाई रखे, इसलिए इन्‍हें घर गृहस्‍थी के काम तो सीखने ही होंगे।

मिड डे मील में तो पूरी कमाई है, दौ सौ का नामांकन है। बच्‍चे आते हैं पचास, खूब बचत हो जाती है, बच्‍चों को पुरानी किताबें दे देती हूँ। नई किताबें अपनी सहेली को बेच देती हूँ, जो प्राइवेट स्‍कूल चलाती है एवं उसके स्‍कूल के नियमानुसार बच्‍चे किताबें उसी से खरीदेंगे। यह भी ऊपरी कमाई का सशक्‍त स्रोत है। एक रिटायर्ड अंकल हर साल कापी, पेन, पेन्‍सिल बांटने आते हैं, उनके जाने के बाद बच्‍चों से सब वापिस लेकर शाम को उसी स्‍टेशनरी की दुकान पर बेच आती हूँ। तीन टीचर हैं, हफ्‍ते में दो-दो दिन ही आती हैं। छुट्‌टी का प्रार्थना पत्र रजिस्‍टर में रख आते हैं, इन्‍सपेक्‍टर अधिकारी आते हैं, तो बता देते हैं, वरना रजिस्‍टर में साइन कर देते हैं। अपने बच्‍चों को तो प्राइवेट स्‍कूल में पढ़ाती हूँ, जब डॉक्‍टर अपना आपॅरेशन स्‍वयं नहीं कर सकता, नाई अपनी कटिंग स्‍वयं नहीं कर सकता, स्‍त्री रोग विशेषज्ञ को भी मम्‍मी बनने के लिए दूसरी डॉक्‍टर के पास जाना ही होता है, फिर अपने ही बच्‍चों को मैं अपने स्‍कूल में ‘‘नहीं पढ़ाने‘‘ का खतरा कैसे ले सकती हूँ।

सच, गांव के सरकारी स्‍कूल में कुछ काम नहीं, एक संस्‍थान ने हम सभी को सम्‍मानित किया शिक्षक दिवस पर तो स्‍वयं पर शर्म आ रही थी। हम कुछ नहीं, फिर हमें क्‍यों सम्‍मानित कर रहे हैं? जी हाँ, ट्‌यूशन अभी भी चल रही हैं, एक बात और बताऊँ, मुझ में एक अच्‍छाई भी है। जेठजी तो आई आई टी कर के विदेश चले गए सास ससुर को दो टाइम रोटी मैं ही दे रही हूँ, इसलिए घर में मुझे अच्‍छी बहू का प्रशस्‍ति पत्र भी मिला है। पति की कच्‍ची नौकरी है, मेरी तनख्‍वाह से ही घर में दूध, राशन, सब्‍जी आती है और ऊपर की कमाई से मैं अपना ब्‍यूटी पार्लर मोबाइल टाप अप जैसे आवश्‍यक काम निकाल लेती हूँ। मेरी मानिए, आप भी बी.ए., बी.एड. कर टीचर बन जाना, सुखी रहोगे।

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