शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

नीरा सिन्हा की कविता - सास

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सास

सास वो एहसास है

जीने नहीं देता

चैन से कभी

बहू को

आवाज सास की

दिखाई देती है हरदम

बहू को

नहीं थमता

सास होने का सिलसिला

तबतक

परिवर्तित न हो जाती बहू

सास में

जबतक

बहू

नहीं बन पाती बहू बेटी कभी

उठाती है हर नाज

करती जो कहती है सास

न जाने कैसा है यह रिश्‍ता

सदियों से कोशिश करती

आयी है बहू

बन जाए वो बटी

न रहे बहू

सदियों से पर होता ऐसा नहीं

कोशिश में हो लीन

रह जाती है वो

न ही बेटी और न ही बहू

नीरा सिन्‍हा

ईमेल- nirasinha54@gmail.com

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