सोमवार, 17 सितंबर 2012

मनमोहन कसाना की शेरो शायरी

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शेर-ओ-शायरी


             1    ऐ हाथ छिटकने वाले
                           जरा सोच ले
                      तेरे भी दो हाथ हैं 
  
            2        हो गई है ये गलियाँ
                       एक चाँद जो यहां
                         पैदल चला था


           3     पूछते हें जनाब खामोश क्यों हो
                            मालूम नहीं शायद
                    ये जालिम इश्क का कहर तो
                               खुद ने ढाया है
 
          4              नशा इतना था हम पर
                                उस वेवफा का
                              मर गया कसाना
                            खुली रह गई आंखें 
                    और नशा छलकता रह गया

5    कहने को हर जोड़ी कहती है
                  इंकलाब लायेंगे
        ‘कसाना' देखी है कहीं ‘कूवत'
           सिर्फ खुले में मिलने की।

6    ऐ! हसीनों बदली है
बदली है जमाने की ‘बयार'
बापर्दा रहा करो
गली-गली में जो आशिक पैदा हुए।

7    एक पल लगा भूल गया ‘कसाना'
किसी को जब देखा आईना तो साफ दिखा
आज भी ‘अक्‍स' उस जालिम का है
हमारी तो सिर्फ परछाईं ही थी।

8    जालिम का थोड़ा सा
         पल्‍लू क्‍या सरका
         बीच रोड पर कतार लग गई।

     
9      वो क्‍या कम खूबसूरत थी
       जो उसके बाद तूने․․․․․․․․․
            ऐ परवरदिगार
       ये नक्‍काशी बनाई।

10           एक रात तन्‍हाई ने
एक रात बेवफाई ने
और तो और ‘कसाना'
आज रात तो․․․․․․․․․․․․․
उसके आशिकों ने ही मारा।

 

--

 

लेखक परिचय-

मनमोहन कसाना

गांव- भौंडागांव, पोस्‍ट- जगजीवनपुर

तहसील- वैर, जिला- भरतपुर राजस्‍थान 321408

फोन- 09672281281, 09214281281

blog:- ekkona.blogspot.com

email:- manmohan.kasana@gmail.com

संप्रति-

देनिकभास्‍कर, राजस्‍थानपत्रिका, रचनाकार, हिमप्रस्‍थ, आदिमें कविता, कहानी,

प्रकाशित। वर्तमान में देहाती संगीत पर कार्य।

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