बुधवार, 19 सितंबर 2012

पद्मा मिश्रा की कविताएं

कविता --
कहाँ तुम  खो गई हिंदी?

न जाने कितने चौराहे,
गली सड़कों ,दीवारों में,
इन उंची पट्टिकाओं पर,
टंगे बेशर्म नारों में,
कहाँ तुम  खो गयी हिंदी.
कहीं गुम है तुम्हारी अस्मिता,
इन संविधानों में,
कहीं हो राष्ट्र की भाषा,
चुनावी प्रावधानों में.
किताबों के धुआंते अक्षरों में,
सो गयी हिन्दी .
कहाँ तुम खो गयी हिन्दी?
विविध भाषा, विविध धर्मा,
ये अपना देश है पावन,
तुम्हारे लोक गीतों में,
कभी बरसा था ये सावन.
मगर इन रैप गीतों में,
अंग्रेजी के सलीकों में,
कहीं गुम हो गयी हिन्दी.
कहाँ तुम खो गयी हिन्दी?
समूचे विश्व की संपर्क भाषा,
मान  है हिन्दी.
अजानी वीथिकाओं में ,
कोई पहचान है हिन्दी.
है सींचा सृजन को जिसने,
बनी वह पावनी गंगा.
अँधेरे रास्तों पर
मधुरतम सहगान है हिन्दी.
क्यों विकृत हो गयी है आज,
माँ के भाल की बिंदी .
कहाँ तू खो गयी हिन्दी?

--

कविता

धरती के भीगे अंतर में,
नव-स्नेह अंकुरित हो पाए,
और बूँद बूँद नभ कोरों पर,
गीतों की छटा उमड़ जाये.
तुम बरसा दो नव रस कण में,
वह प्रेम गुंजरित हो जाये.
तुम मेघ दूत बन आ जाओ,
मेरा संसार बुलाता है,
रिमझिम बूंदों की तान लिए,
पावस का हास बुलाता है.
तुम छू लो मन के  तार आज,
जीवन का राग संवर जाये,
शूलों से बिंध कर भी खिलती ,
कोमल गुलाब की कलिकाएँ,
संघर्षों में भी पलती है,
दुर्गम राहों पर लतिकाएँ.
तुम बनो बांसुरी कान्हा की,
मधुबन की प्रीत मुखर गाये.
गीतों के कोमल स्वर लय पर ,
मेरी कविता के भाव बनो,
अंतर में पलती प्रीति मधुर ,
तुम रसवंती जल-धार बनो,
बूंदों के संग बिखर जाओ,
यह पावस अमृत हो जाये .--


शिक्षक दिवस पर कविता ---
शिक्षक हैं हम समाज को जगाते रहेंगे.

ये जिन्दगी का मंत्र है ,सिखाते रहेंगे,
शिक्षक हैं हम, समाज को जगाते रहेंगे.
अज्ञान के अंधेरों में लिपटी हुई दुनिया,
हम ज्ञान के सूरज को, जगमगाते रहेंगे.
अंकुर नई उम्मीद के हमने उगाये हैं,
आँखों में उनके सपनों को सजाते रहेंगे.
शिक्षक हैं हम समाज को जगाते रहेंगे.
जब स्वार्थ,भ्रष्टाचार,और अन्याय पला था,
तब बन चुनौती,चाणक्य सा शिक्षक ही लड़ा था.
जब देश ने अशिक्षा की  जंग लड़ी थी.
तब' कृष्णन' के नाम शिक्षक दिवस की नींव पड़ी थी.
हम ही नई पीढ़ी के नव निर्माण की सुबह,
सोये हुए सपनों को हम जगा के रहेंगे ,
शिक्षक हैं हम समाज को जगाते रहेंगे.
हमने दिया इतिहास को गौरव का सिलसिला,
अब वर्तमान को ऊँचाईयों पर ला के रहेंगे.
बुझने न देंगे ज्ञान का अविराम यह दिया,
हम आँधियों के गर्व को हिला के रहेंगे.
शिक्षक हैं हम समाज को जगाते रहेंगे.

--


-तुलसी के राम - --पद्मा मिश्रा
'हुलसी' के आँचल में 'तुलसी' सा पुष्प खिला,
वन्दनीय गाथा है 'तुलसी' के नाम की.
तुलसी के 'मानस' ने गढ़ दी है परिभाषा ,
मानव संबंधों की, रघुवंशी आन की .
जन जन में व्यापित है मानस की राम कथा,
पूजित हर घर में है मर्यादा राम की.
प्राणों में गुंजित है आज भी अयोध्या के,
जब से विराजे हैं राम-सिया-जानकी.
आज वही सीता भटकती है,द्वार,द्वार,
लांछित, अपमानित, सी  कितनी है एकाकी,
मौन ,मूक दर्शक से राम ,यहाँ क्यों चुप हैं?
कहाँ खो गयी है अब मर्यादा राम की?
सबको प्रतीक्षा है तुलसी के आने की,
पथराई आँखों को आशा है राम की.
राम की अयोध्या में मर्यादित राम नहीं,
चलता है छल छंदी रावण का राज यहाँ,
आज फिर पुकारती है पीड़िता वसुन्धरा,
आज फिर प्रतीक्षा है तुलसी के राम की.
तुलसी के 'मानस' में राम पुनः आयेंगे,
पुनः मुस्कराएगी श्यामला  वसुन्धरा,
सावन के मेघों से स्नेह पुनः बरसेगा,
जागेगी मानस की पावनी- परंपरा.
गीत धरा गायेगी मानव की जीत की. --

 
-- नदी और सागर का रिश्ता बहुत पुराना है, एक अनोखा रिश्ता,जिसका कोई नाम नहीं होता ......


नदी-सागर-और दोस्ती''

दूर रह कर भी नहीं जो टूटती है,
अनकही सी भावनाएं जोड़ती है,
दोस्ती अहसास की कच्ची कली है,
जो कहानी धड़कनों में सोचती है.
दोस्ती ऎसी नदी है जिन्दगी की,
धार बन बहती रही हैं भावनाएं,
मन का सागर पा सके न दो किनारे,
लहर संग ढलती रही हैं कामनाएँ.
साथ चलना है हमें सागर किनारे,
पर लहर के साथ हम बहने न पायें
मिल न पायें हम,भले ही युग युगों तक,
रास्ते विश्वास के मिटने न पायें.
कल कभी तुम साथ आओ या न आओ,
मै अकेली ही चलूंगी कर्म पथ पर,
बस यही अहसास हो संबल हमारा ,
तुम हमेशा ही मेरे अहसास में हो.......!
कह उठा सागर 'समर्पण हूँ तुम्हारा,
दूर हो, फिर भी मगर -हर सांस में हो.
-

 

माँ'' वाणी से एक प्रार्थना ''


तुम पारस मैं यस अपावन,

तुम छू लो कंचन हो जाऊँ.

अक्षर अक्षर बांध लिया है ,

स्नेह सुमन मुक्ताहरों से,

अब मन का आकाश खुला है,

तुम आओ पावन हो जाऊं.

अंतर अंतर भींग रहा है,
नेह-वारी के भावकणों  से,
माँ नयनों में आंसू बन कर ,
बरसों तुम मधुमय हो जाऊं.
जग सोता है घोर तिमिर में ,
मेरे नयन जागृत रहते,
मधुर कल्पना के पंखों पर,
स्वप्न हजारों तिरते रहते.
एकाकी मन के त्रिभुवन में ,
ज्योतिर्मय तुम,दीप जलाऊँ
मेरी सृजन शक्ति की राहें,
निर्भय हों,उन्मुक्त गगन दो,
पथ के सरे शूल सरल हों,
मानवता का पथ निर्मल दो,
बन चन्दन-बन-गंध पावनी,
परसों मन, सुरभित हो जाऊं.


-पद्मा मिश्र

[jamshedpur]

2 blogger-facebook:

  1. padma ji pranam! apki kavitayen shamaa bandhti najar aa rahi hai | kavita khil uthi hai | layatmak aur bhawanatmak kavitayen hain| bahut badhai !
    manoj 'aajiz'

    उत्तर देंहटाएं
  2. padma ji awesome webak or jaandaar subject

    उत्तर देंहटाएं

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