रेखा जोशी की लघुकथा - भार्या तुम्हारी

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''मैं तुम्हारी भार्या हूँ और रिश्वत के इस पैसे को मैं अपने घर में हरगिज़ खर्च नहीं करूँगी ,''सीमा ने राजेश से कहा। दोनों के बीच में कल रात से ही झगड़ा चल रहा था ,मुद्दा वही उपर की आमदनी का ,जिसे वह अपने घर में कदापि भी खर्च करना नहीं चाहती थी। राजेश ने अपनी पत्नी को पैसे की अहमियत के बारे में बहुत समझाया और बताया कि उसके दफ्तर में सब मिल बाँट कर खाते हैं लेकिन सीमा के लिए रिश्वत तो पाप कि कमाई थी , राजेश के लाख समझाने पर भी जब वह नहीं मानी तो गुस्से में उसने सीमा से साफ़ साफ़ कह दिया था कि अगर उसने इस मुद्दे पर और बहस की तो वह उससे सदा के लिए सम्बन्ध विच्छेद कर लेगा ,बात बढ़ती देख सीमा चुप हो गई और मेज़ पर रखा हजार का नोट उठा कर उसे एक लिफाफे में डाल कर अपने घर में बने छोटे से मंदिर में रख दिया और से रसोई में व्यस्त हो गई। तभी उसे बाहर आंगन में माली की आवाज़ सुनाई दी ,जो राजेश से कुछ दिनों की छुट्टी मांग रहा था और उसे अपने बीमार बेटे के इलाज के लिए कुछ रुपयों की जरूरत थी ,सीमा ने झट से अपने मंदिर से वह लिफाफा उठाया और माली के हाथ में थमा दिया।

 

रेखा जोशी

फरीदाबाद

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