शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य : प्रजातन्‍त्र में प्रश्‍न

यह देश प्रश्‍नों का जंगल हो गया है। प्रजातन्‍त्र है तो प्रश्‍न भी होंगे। प्रश्‍न होंगे तो उनके उत्‍तर भी ढूंढे जायेंगे। उत्‍तर नहीं मिलेंगे तो जिज्ञासा बनी रहेगी। जिज्ञासा की मीमांसा से आलोचना की उत्‍पत्‍ति होगी और प्रश्‍नों का बने रहना किसी भी सरकार के लिए घातक होता है। प्रश्‍नों का आधा-अधूरा ही सही उत्‍तर दिया जाना चाहिये। वैसे भी प्रजातन्‍त्र में घिसे पिटे प्रश्‍नों के रटे रटाये उत्‍तर देने की परम्‍परा काफी पुरानी है।

जब स्‍कूल में पढ़ता था तो अक्‍सर क्‍लास में प्रश्‍न पूछने की गुस्‍ताखी कर बैठता था वो जमाना मार खाने का था तो मार खाना, बेंच पर खड़े हो जाना या स्‍केल, पेन्‍सिल की मदद से शारीरिक दण्‍ड भुगतना पड़ता था। और ज्‍यादा प्रश्‍न पूछने पर कक्षा से बाहर निकाल दिया जाता था। घर पर हर प्रश्‍न का जवाब एक चांटा ही होता था अतः प्रश्‍न पूछने से पहले ही गाल बचाने की जुगत करनी पड़ती थी। पिताजी प्रश्‍नों के उत्तर कभी कभी चुप रह कर भी दे देते थे, मगर अक्‍सर रिश्‍तेदार प्रश्‍नों और जिज्ञासाओं से डरते थे, वे छोटों को समझा देते थे- तुम अभी छोटे हो ये प्रश्‍न और उत्‍तर की अभी तुम्‍हारी उम्र नहीं है।

साक्षात्‍कार में, समाज में प्रश्‍न पूछना एक सामान्‍य घटना है और पूछने वाला अपना हक समझ कर जवाब मांगता हैं। टाइम क्‍या हुआ है ? का जवाब कौन नहीं मांगता। मगर राजनीति में टाइम क्‍या हुआ है ? का जवाब है अभी चुनाव दूर है। कोयला काला क्‍यों है ? का जवाब है मेरी खामोशी ने हजारों सवालों की आबरु रख ली।

महाभारत में यक्ष ने प्रश्‍न पूछे थे। भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव उत्‍तर नहीं दे सके, युद्धिप्‍ठिर ने उत्‍तर दिये और भाईयों को बचाया मगर आज की राजनीति में युद्धिप्‍ठिर मौन है। आज का यक्ष भी धर्म, नैतिकता के प्रश्‍न नहीं पूछता वो भी राजनीतिक प्रश्‍न पूछ कर सब को हैरान कर देता हैं। वैसे भी देश में समस्‍याएँ ही इतनी है कि किसी भी प्रश्‍न का कोई भी उत्‍तर दिया जा सकता है और उस जवाब से कुछ होना- जाना नहीं है। देश का विपक्ष यक्ष बनने की फिराक है और युद्धिप्‍ठिर को अपने भाईयों की चिन्‍ता है ऐसे में सही प्रश्‍नों के सही जवाब कहाँ से आयेंगे। प्रजातन्‍त्र में शाश्‍वत प्रश्‍न है-गरीबी कब खतम होगी ? महंगाई कब कम होगी ? सबको शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य कब मिलेगा ? लेकिन इन शाश्‍वत प्रश्‍नों के उत्‍तर न आज मिले न कल। मजमे मैं मदारी बन्‍दरिया को नचा नचा कर पूछता है तू क्‍यों नाच रही है और बन्‍दरिया पेट पर हाथ रख कर कहती है पेट के लिए। तो साहबान। कद्रदान हर प्रश्‍न पापी पेट के लिए है और हर उत्‍तर बन्‍दरिया के नाच की तरह हो जाता है। पब्‍लिक देखती है, तमाशे का मजा लेती है और पैसा फेंक कर चल देती है। कभी नचिकेता ने यम से प्रश्‍न पूछे थे सावित्री ने यमराज से पूछा थे। प्रश्‍नोपशिद जैसा ग्रन्‍थ भी है। विज्ञान में क्‍यों?क्‍या?कैसे? की प्रश्‍न श्रखंला से सब चलता है मगर सत्‍ता और सरकार में प्रश्‍नों के जवाब ढूढना भूसे के ठेर में सुई ढूढना है। प्रश्‍नों के विराट समूह में उत्‍तर समाहित है।

प्रश्‍न छोटे हो या बड़े उनके उत्‍तर अस्‍पप्‍ट, घोलमाल करके दिये जा सकते है टीवी पर प्रवक्‍ता अपनी-अपनी ढपली और अपना अपना राग अलापते है। वे उत्‍तरों को इतना लम्‍बा कर देते है कि प्रश्‍न पूछने वाला घबरा कर प्रश्‍न और उत्‍तर से पिण्‍ड छुड़ाने की कोशिश में लग जाता है। कई बार उत्‍तर देने वाला भी समझदार होता है उससे खेत के सम्‍बन्‍ध में प्रश्‍न पूछते है तो खलिहान वाला रटा रटाया जवाब देता हे। पुलिस अपराधी से जो प्रश्‍न पूछती है उसका जवाब अपराध की स्‍वीकृति से ही सभंव है। जनता के हर प्रश्‍न का एक ही जवाब हो सकता है-अगले चुनाव तक इन्‍तजार करो।कुछ प्रश्‍न अनाथ और अवैध होते है बेचारे। केबीसी में अमिताभ भी प्रश्‍न पूछते है तो विकल्‍प देते है और लाइफलाइन भी होती है, मगर ये सरकार से प्रश्‍न पूछने वाले। लेकिन-मेरी खामोशी ही हर सवाल का जवाब है शायर ने ठीक ही कहा है- न तुम्‍हारा जवाब है न हमारा जवाब है वल्‍लाह सब लाजवाब है। लेकिन इस प्रश्‍नोपनिपद के अन्‍त में कबीर को याद किया जाना जरुरी है-

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

मो․․09414461207

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