गुरुवार, 27 सितंबर 2012

हरीन्द्र दवे का उपन्यास : वसीयत - प्रथम प्रकरण

सुप्रसिद्ध गुजराती कवि, विवेचक, पत्रकार, उपन्यासकार स्व. श्री हरीन्द्र दवे के उपन्यास 'वसीयत' का हिंदी अनुवाद धारावाही रूप में (किश्तों में ) प्रस्तुत कर रहे हैं श्री हर्षद दवे. प्रस्तुत है पहली कड़ी.

उपन्यास

       वसीयत    

हरीन्द्र दवे

अनुवाद : हर्षद दवे

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[१]

'शेफाली, तुम्हें मिसेज डिसूजा बुला रही है,' नन्दिता ने कहा.  

'मुझे?' किसलिए मुझे बुला रही होंगी?" शेफाली को विस्मय हुआ. अभी पिछले सोमवार को ही उसकी किचन ड्यूटी पूरी हुई थी. अब तो उसका कोई भी काम नहीं हो सकता. शेफाली ने उपन्यास एक और रख दिया. जो पृष्ठ अधूरा था वहीँ पर बुकमार्क रखा. दीवार पर लगे दर्पण में देखकर बाल सँवारे. कपड़े पर एक नजर डाली. साड़ी की चुन्नटें ठीक कीं.  "चलेगा?", ऐसे  मन ही मन सोचा. पैरों के स्लीपर टेबिल के नीचे रख दिए. सैंडिल पांवों में डाल ही रही थी कि उतने में राजू दौड़ी दौड़ी आई. राजू मिसेज डि'सूजा की सहायिका थी.

'शेफाली, जल्दी कर, तेरा कोल है.' 

'कोल?' शेफाली ने आश्चर्य से पूछा.

वह पिछले तीन साल से यहाँ पढ़ती थी. महीनेभर में एक या दो चिठ्ठियाँ या कभी चैक के साथ रजिस्ट्री ख़त या कभी मनीऑर्डर आता था. शायद ही सालभर में उसे कोई मिलने के लिए आता होगा. वह भी 'कल प्रैक्टिकल नहीं है' या 'सवेरे इमर्जन्सी आपरेशन है: सर ने दो तिन स्टुडेंट्स को खास तौर पर उपस्थित रहने के लिए कहा है' ऐसे सन्देश पहुँचाने के लिए आता था. फोन भी ऐसे ही किसी काम के लिए आता था. तिन साल में उसका कोई भी कोल कभी नहीं आया था. वह तेज रफ्तार से चली. ऑफिस में दाखिल हुई. मिसेज डिसूजा फोन पर ही बातें कर रहीं थीं. उनके चेहरे के भाव कुछ तंग थे. शेफाली को देखते ही उन्होंने कहा: ‘यह लो, शेफाली आ गई.’

शेफाली ने रिसीवर उठाया. ‘हेलो’ बोलते ही सामने से आवाज सुनाई दी: ‘क्या आप शेफाली राव है?’

‘हाँ जी, मैं शेफाली राव हूँ.’ शेफाली ने कहा.

सामनेवाली व्यक्तिने कहा: ‘शेफाली, आप शायद मुजे नहीं पहचान पाएंगी. मैं बैंगलोर से डो.मिश्र बोल रहा हूँ, - डॉक्टर अंकल का नया सहायक. आप दोपहर की फ्लाईट से जल्दी यहाँ आ जाइए.’

‘क्यों?’

‘डॉक्टर अंकल का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. आपके मम्मी अवं पप्पा को भी संदेशा भेजा है.’

‘क्या हुआ डॉक्टर अंकल को?’ शेफाली ने घबराकर पूछा. ‘क्या यहाँ से किसी विशेषज्ञ डॉक्टर की आवश्यकता है?’ ‘नहीं, लेकिन आप जल्दी से यहाँ आ जाइए, बहुत जरुरी काम है. आपकी हॉस्टल के सुपरिंटेंडेंट के साथ मेरी बात हों चुकी है. वे आपको हवाई जहांज का टिकट पहुंचा देंगे. अब आप फ़ौरन निकलिए.’ सामने से फोन रख दिया गया. वह कुछ देर तक डायलटोन की एक सी आवाज सुनती रही. फिर अन्यमनस्क भाव से उसने रिसीवर नीचे रखा. मिसेज दीसूजा ने खड़े हो कर शेफाली के कंधे पर हाथ रखा और उसे सामने कि कुर्सी पर बिठाया.

‘शंकर, जरा पानी लाना तो,’ मिसेज डि'सूजा ने प्यून से कहा. और फिर शेफाली के सिर को सहलाते हुए कहा: ‘बेटी, परेशान मत होना. तुम्हारा कोई काम होगा इसलिए बुलाया है.’

शेफाली कुछ बोल न पाई. वह काँप रही थी. इस फोन से वह भीतर से एकदम घबरा गई थीं. मिसेज डिसूजा ने शेफाली के पासवाली कुर्सी पर बैठकर कहा, ' तूं परेशान मत होना. मैं अभी तेरे लिए टिकट का प्रबंध करती हूँ. जोशीचाचा और नंदिता तुजे एअरपोर्ट तक तेरे साथ रहेंगे.' नंदिता द्वार पर ही खड़ी थीं. शेफाली का कोल है यह सुनकर वह भी दौड़ी चली आई थी.

'चल शेफाली, मैं तेरा बैग तैयार कर दूँ.' नंदिता ने कहा.

'नंदिता, शेफाली को रुम तक ले जा. घंटेभर में निकलना होगा. डॉ. मिश्र बैंगलोर के एअरपोर्ट पर उसे लेने के लिए आने वाले हैं.'

शेफाली खड़ी हुई. मिसेज डिसूजा ने उसकी पीठ पर हाथ पसारते हुए कहा: 'इतनी बड़ी हो गई, लेकिन बिलकुल एक छोटे बच्चे कि सी हरकतें करती है.'

मिसेज डिसूजा को शेफाली से काफी लगाव था. हॉस्टल कि 'सबसे सयानी' लड़की की उपाधि पिछले साल वार्षिक समारोह में उन्होंने उसे प्रदान की थी. शेफाली के शायद ही कोई मित्र होंगे. वह मेडिकल में पढ़ती थी फिर भी कभी अपना रौब नहीं जमाती थी. उसके साथ पढ़ती राजश्री हाथ में स्टेथोस्कोप घुमाती चली आती: 'आज डॉ. वोरा ने कमाल कर दी जोड़ो का बारीक ओपरेशन - क्या नजाकत दिखाई! अ पोएम इन इटसेल्फ़' - जैसे शब्द बोलती रहती. शेफाली के मुंह से तो जैसे कभी कोई शब्द निकलता ही नहीं था. मेडिकल में पढ़ रही अन्य पाँचों लड़कियाँ सप्ताह में चार दिन तो रात को किसी न किसी पार्टी में चली जाती थीं. अगर करने को कुछ नहीं हो तो फिर फिल्म के अंतिम शो में पायीं जातीं थी. कभी मिसेज डिसूजा कि अनुमति ले कर तो कभी अनुमति लिए बगैर ही चलीं जातीं. सब के फोन काफी देर तक चलते रहते. शेफाली को न फोन, न पार्टी, न फिल्म. अगर वह कोलेज में नहीं होती या वार्ड में नहीं होती तो समज लो वह किसी बस में मिलती, या फिर हॉस्टल में. शुरू में सब इस बात पर हैरान थे. मिसेज डिसूजा को इस पर सबसे बड़ा आश्चर्य होता था. लेकिन अब 'शेफाली इस से कुछ और हो ही नहीं सकती' ऐसा हरकोई मानने लगा था. तीन साल से शेफाली की इस सरलता के सब आदी हो चुके थे. मिसेज डिसूजा को शाम की प्रेयर के समय केवल शेफाली की ही कंपनी मिलती थी. वह हमेशा मिसेज डिसूज़ा के रूम पर आती थी. मिसेज डिसूजा आँखे मूंदकर बैठतीं. शेफाली बाईबल से या स्तोत्र मेसे कुछ न कुछ पढ़कर सुनाती. उसकी आवाज में ऋजुता थी. वह आस्तिक थी. कभी कभार वह स्तोत्र के दो-तीन शब्द बोलकर, देर तक चुप्पी साध लेती. यह मौन प्रार्थना से भी बढ़कर अधिक अर्थसभर हो जाता. शेफाली माध्यम वर्ग के परिवार से है यह बात मिसेज डिसूजा जानती थीं. डॉ. दिवाकर पंडित की वह दत्तक पुत्री थीं, जिसका पालन वे ही कर रहे थे. उसकी फ़ीस, उसके हॉस्टल के खर्च का चैक या उसके निजी खर्च की राशि डॉ.पंडित ही भेजते थे. शेफाली पढ़ाई के लिए जब बम्बई आई तब कोक्टर पंडित ने ‘माननीय मेडम सुपरिटेंडेंट’ ऐसा संबोधन करते हुए मिसेज डिसूजा को खत लिखा था. और उसमे शेफाली के लिए सिफारिश की थी. शेफाली के लिए कभी कोई खर्च करना पड़े तो निःसंकोच करना और मुझे लिखियेगा ता कि मैं यहाँ से उचित राशि भेज सकूं, ऐसा भी उन्होंने लिखा था. वर्ष में दो-तीन बार शेफाली के बारे में, उस पर ध्यान रहे इसलिए कुछ पूछताछ करते हुए डॉ. पंडित के पत्र आते रहते: उन पत्रों में मिसेज डिसूजा के बारे में भी संवेदनशील उल्लेख होता था. मिसेज डिसूजा ने कभी भी डॉक्टर पंडित को देखा न था. फिर भी मानों वे उन के अस्तित्व के एक अंश बन गए थे. आज के इस फोन का संकेत स्पष्ट था. डॉ.पंडित या तो इस दुनिया को छोड़ कर चल बसे है या इस दुनिया को छोड़ने के लिए आखिरी सांसें गिन रहे हैं. उनके अंतिम समय पर उन्होंने शेफाली को याद किया होगा. इसीलिए ही मिश्र ने फोन किया होगा. डॉ. पंडित का स्वास्थ्य ठीक नहीं है यह जानकार मिसेज डिसूजा को अपना ही कोई स्वजन अंतिम सांसे गिन रहा हों ऐसा लगा. उनके सख्त दीखते चेहरे पर कोमल – मृदु रेखाएँ उभर आईं. उन कि तनावयुक्त आँखे सजल हों उठीं. फिर तुरंत स्वस्थ हों कर उन्होंने अकाउंट अकाउंटन्ट जोशी को आवाज लगाईं: ‘जोशी, इन्डियन एअर लाइन्स में फोन कर के जोसेफ को कहो कि बैंगलोर के लिए एक टिकट बुक करा के रखे. और हाँ, तैयार रहना, शेफाली को छोड़ने के लिए आप ही को जाना है.’ इस प्रकार लगातार सूचना देतीं रहीं.

० ० ०

बम्बई हवाईअड्डे से हवाई जहाज के उड़ान भरते ही विमान परिचारिका ने अपनी विनम्र आवाज में फ्लाईट इन्फर्मेशन देना शुरू कर दिया, तब भी शेफाली का दिमाग चकरा ही रहा था, शांत नहीं हो रहा था. उसके सरल धारा की तरह बहते जीवन में ऐसी घटना कभी नहीं घटी थी. उसे डॉक्टर अंकल की याद आने लगी. वह काफी छोटी थी, तब से डॉक्टर अंकल उसे बहुत दुलार करते थे: ‘रावसाहब,’ वे शेफाली के पिता को कहते, ‘आप की इस बेटी को मैं अपने यहाँ ले जानेवाला हूँ.’ पप्पा छोटी सी शेफाली को पूछते: ‘ तूं किसकी बेटी है, पप्पा की या डॉक्टर अंकल की?’ तब शेफाली अचूक यही उत्तर देती थी ‘डॉक्टर अंकल की’, यह शेफाली को अच्छी तरह से याद था.

वह बिलकुल बच्ची – छः आठ महिने की - थी तब डॉ. दिवाकर पंडित बैंगलोर में आए. जिस बंगले के आऊट हाऊस में शेफाली के माता पिता रहते थे वह बँगला उन्होंने ख़रीदा. शेफाली के पिता कृष्ण राव डर रहे थे कि यह कश्मीरी ब्राह्मिन अवश्य उसको आऊट हाऊस से निकालेगा . बंगले की मरम्मत एवं नए सिरे से व्यवस्थित रूप से सजाने की शुरूआत हुई. तब एक बार डॉ.पंडित आए और बंगले के बरामदे में बैठे. उन्होंने कृष्ण राव को मिलने के लिए बुलाया.

‘अवश्य, यह मधुरभाषी कश्मीरी मुझे जगह खाली करने के लिए ही कहेगा’. कृष्ण राव के मन में कुछ ऐसे ही विचार चल रहे थे.

डॉ.पंडित ने उठकर कृष्ण राव के साथ हाथ मिलाए, ‘आइये, बैठिये. आप कॉफ़ी तो लेंगे ही, क्यों?

इस के पहले वहां रहते कन्नड़ उद्योगपति ने कभी भी कृष्ण राव को इतनी मधुरता से बुलाया न था. एक या दो बार बाकी किराये कि वसूली के लिए ही बुलाया था. इसलिए प्रतिरक्षा के बारे में सोचकर के कृष्ण राव ने कहा, ‘डॉक्टर साहब, मैं पिछले बीस साल से यहाँ रहता हूँ. किराया भी नियमित रूप से देता रहा हूं. पिछले महिने का किराया बाकी है. लेकिन – ‘

डॉक्टर पंडित यह सुनकर हंस पड़े और ऊपर से कहा; ‘कृष्ण राव, पहले बैठिये तो सही. कॉफ़ी तो लीजिए. मैंने आपको किराये के लिए नहीं बुलाया.’ कृष्ण राव का मन इस से कुछ शांत हुआ. कॉफ़ी ले रहे कृष्ण राव से डॉक्टर ने कहा:

‘अगर करवाना चाहें तो बहुत कुछ निकल सकता है. लेकिन एकसाथ इतना खर्च नहीं हो पाएगा, इसलिए सबकुछ ऐसे ही रह गया है. देखते हैं, अभी कुछ करा लूंगा, बाद में अगर सुविधा हो पाई तो बाकी सब भी करवा लेंगे.’

फिर एकबार डॉक्टर हंस पड़े: ‘कृष्ण राव, आप कि बात सही है. अगर सुतार-थवई को अलग से रखो तो मुश्किल हों जाता है. लेकिन यहाँ पर महीना तो हो ही जाएगा, इस में दो-चार रोज अधिक लगेंगे और क्या. आखिरकार वह घर पूरे मकान का एक हिस्सा ही तो है न? खर्च की चिंता न करो.’ और फिर आवाज दे कर बंगले की नव-व्यवस्था देखने वाले ठेकेदार को बुलाया: ‘देखो, रावसाहब के मकान में जा कर वहाँ सुतार का, थवई का एवं रंग का जो भी काम हो वह सब कर देना. रंगाई-पुताई के समय अगर असुविधा हो रही हो तो बंगले के आऊट हाऊस की और बंद रहते दोनों कमरे रावसाहब को रहने के लिए खोल देना.’

कृष्ण राव को बचपन में माँ –बाप ‘कृष्ण’ कहकर पुकारते थे, जब कि अब बैंक के साथी राव या कृष्ण राव कहते हैं. पहलीबार उनको किसी ने ‘रावसाहब’ जैसे माननीय शब्दों से पुकारा था. वे डॉक्टर पंडित की और कृतज्ञभाव से देखते रहे. किस प्रकार कृतज्ञता प्रकट करें यह उनकी समज में नहीं आ रहा था. आज तक उन्होंने डॉक्टर पंडित को दूर से ही देखा था. गाड़ी से उतरते हुए, जाते हुए, आते हुए या कभी काम करते हुए, लोगों के साथ हंसकर बातें करते हुए देखा था. आज उनके सामने बिच की तिपाई जितने ही चार फूट की दूरी पर बैठे डॉक्टर पंडित को वे एकटक देखते रहे. अपनी उम्र के लग रहे थे. मुश्किल से पैंतीस के होंगे. उनके चेहरे पर स्वस्थ भाव छलक रहे थे. उनकी आँखों में नमीं एवं गहराई थीं. ऊंचे, गौर एवं मितभाषी डॉक्टर पंडित के होठों पर स्मित का पंखी सदा फुदकता रहता था. ‘कृष्ण राव, आप तो गहरी सोच में पड गए?’

कृष्ण राव सहसा धरती पर आ गए:’नहीं, डॉक्टर साहब, मैं तो आपका शुक्रिया कैसे अदा करूँ इस सोच में उलझ गया था.’

‘उलझन में फंस जाए ऐसे विचार करने ही नहीं चाहिए, राव साहब, लीजिए, दूसरा कप दूँ?’ कहते हुए डॉ. पंडित ने बात का विषय ही बदल डाला.

पिता ने डॉक्टर अंकल के साथ हुए प्रथम परिचय की कही हुई बात शेफाली के दिमाग से कभी नहीं हटी थी. अपने मध्यम वर्ग के पिता को सम्मान मिले एवं वे गौरवान्वित हो सके उस प्रकार अगर कोई उनके साथ व्यवहार करे तो उस बात को याद करते ही शेफाली का चित्त आंदोलित हो उठता. बह तो उस समय बहुत छोटी थी. माँ कहती: हमारे घर की रंगाई हो रही थी तब डॉक्टर अंकल के विशाल बंगले में अलग प्रवेश द्वार वाले दो खंड में हम रहे थे. वे चार दिन डॉक्टर अंकल का महाराज-रसोइया ही राव परिवार के लिए भी खाना पकाता था. माँ और पप्पा की काफी मनाही के बावजूद भी नन्ही सी शेफाली घुटनों पर चलकर डॉक्टर अंकल जहाँ बैठे हों वहीँ जा पहुँचती. वे समाचार पत्र पढ़ते तो उसे खींचकर भी उनका ध्यान अपनी और खींचती.

‘रावसाहब, यूं तो मुझे नन्हें बच्चे दूर से देखना पसंद है, परन्तु, आप की बेटी ने मेरे करीब आकर मेरे दूरत्व को कुचल डाला है. अब मुझे बच्चे पसंद आने लगे हैं. बस केवल उसे उठाने से डर लगता है. जैसे फूल को छूने पर कहीं उसकी पंखुड़ी गिर न जाएँ ऐसी फिकर लगी रहती है, कुछ ऐसे ही.’

लेकिन छोटी सी शेफाली ने यह दूरत्व भी मिटा दिया. रंगाई हो जाने पर वे तुरंत आऊट हाऊस में रहने के लिए चले गए थे. किन्तु रोज सवेरे शेफाली को मिले बगैर डॉक्टर को करार नहीं आता था.

शेफाली को डॉक्टर अंकल की एक दिन की बात अच्छी तरह से याद थी. उस दिन वह डॉक्टर अंकल की गाड़ी में जा बैठी थी. डॉक्टर अंकल जाना चाहते थे. माँ मुझे समजाकर गाड़ी से नीचे उतार ने के लिए कोशिश कर रहीं थी. ड्राइवर भी शेफाली को समजा रहा था. लेकिन उसने तो रोना-धोना शुरू कर दिया. उसे तो डॉक्टर अंकल के साथ ही जाना था. डॉक्टर मेडिकल इमरजंसी पर जाना चाहते थे. आखिरकार शेफाली को रोती हुई छोड़कर वे गए. बीच रास्ते से ही वे जब लौट आए तब भी शेफाली अभी तक आऊट हाऊस के दरवाजे पर बैठी थी. अब भी वह सिसक रही थी. डॉक्टर अंकल ने उसे उठा लिया. शेफाली ने पहले मुंह फेर लिया, रूठ-सी गई, फिर बाद में मान गई. उन्होंने शेफाली को साथ ले लिया. शेफाली को सम्हाल ने के लिए महाराज को भी साथ में लिया. अस्पताल उतरकर उन्होंने शेफाली एवं महाराज को घूमने के लिए भेज दिया. डेढ़ घंटे के करीब गाड़ी वापस अस्पताल आई. डॉक्टर को संदेशा भेजा. डॉक्टर हँसते हँसते बाहर आये. माँ ने बरसों बाद शेफाली से कहा था: ‘डॉक्टर तेरे कारण देर से पहुंचे थे इसलिए रेसिडेंट डॉक्टर ने कहा था कि पेशंट नहीं बचेगा लेकिन डॉक्टर अंकल ने श्रद्धाभाव से कहा था कि ‘जिस कारण मुझ से देरी हुई है उसे देखते हुए पेशंट बच जाएगा’. अचानक उस मरीज की उखड़ी हुई सांसें एवं डूबती हुई नब्ज में नवजीवन संचार हुआ. डॉक्टर कि चिकित्सा से नहीं, स्पर्श मात्र से मरीज ठीक हुआ हो ऐसी घटना की यह बात है. तब से कोक्टर को शेफाली से अधिक लगाव हो गया.

शेफाली को हवाई जहाज में यही सबकुछ याद आ रहा था. कुछ तो वह समज गई थी. डॉक्टर अंकल को कुछ हुआ होगा? छ: महिने की उसकी उम्र थी तब वे चौंतीस-पैंतीस के थे. अब वे ज्यादा से ज्यादा पचपन के हो सकते है. वे बिलकुल स्वस्थ थे. उनका स्वास्थ्य अच्छा था इसलिए शायद वह जैसा सोच रही है ऐसा न भी हुआ हो और हो सकता है कि कुछ ओर ही वजह से डॉक्टर अंकल ने उसे बुलाया हो. वह अध्ययन कर सकी, पढ़ाई में इतनी आगे आ सकी उस में डॉक्टर अंकल का अच्छा खासा योगदान रहा था. एकबार उन्होंने कहा था:‘मैं ठहरा भूतराम, मेरा कोई भरोसा नहीं. अभी तक तो हनुमानजी की भांति बाल ब्रह्मचारी रहा हूँ. अब इस उम्र में शादी क्या करूँगा? मैं चाहता हूँ कि मेरा नर्सिंग होम, मेरी प्रैक्टिस शेफाली सम्हाल ले.’

शेफाली के मातापिता के लिए उनकी बेटी डॉक्टर बने यह बात सोचना शायद मुश्किल था. किन्तु शेफाली डॉक्टर बनने के विचार मात्र से उत्तेजित हो जाती थी. जब भी वह डॉक्टर अंकल के साथ अस्पताल या उनके नर्सिंग होम में जाती थी तब वहाँ गले के आसपास स्टेथोस्कोप लगाकर घूमते नखरेबाज युवा डॉक्टरों को देखकर वह प्रभावित हो जाती थी. कभी वह खुद भी औरों की तरह गले में स्टेथोस्कोप डाल के घूमेंगी और ‘आज कैसा लग रहा है?’ ‘रात को ठीक से सोये थे क्या?’ जैसे प्रश्न मरीजों से करेगी ऐसा स्वप्न देखती रहती. डॉक्टर पंडित ने यह स्वप्न हकीकत बने इसलिए सबकुछ किया. शेफाली ने भी अध्ययन में जी लगा कर अच्छे अंक प्राप्त कर के आवश्यक सहयोग दिया. उस का ध्यान या तो पढ़ाई में होता, या घर के काम-धाम में, या फिर नीचे नजर करते हुए सवेरे दो या तीन किलोमीटर का चक्कर काटने में रहता था. उस के विद्यालय की सखियाँ भी कहतीं: ‘शेफाली, तू है कि कभी सिनेमा भी नहीं चलती, तेरा इतवार कैसे कट पाता है?’

इस तरह कटे इतवारों के कारण – नहीं, डॉक्टर अंकल के कारण – वह आज मेडिकल के तीसरे वर्ष में थी. बम्बई में जी.एस.मेडिकल कोलेज जैसी प्रतिष्ठित कोलेज में एडमिशन पा सकी थी. पिछले बीस वर्ष में डॉक्टर अंकल ने शेफाली के लिए क्या कुछ नहीं किया था? एक बार तो उन्होंने शेफाली को गोद लेने कि बात भी कही थी. किन्तु उसके पप्पा के चेहरे पर डर एवं विषाद के भाव छा गए थे यह देखकर उन्होंने तुरंत बात बदल दी थी:

‘राव साहब, शेफाली राव यकायक शेफाली पंडित हों जाए ऐसा मैं नहीं चाहता. किन्तु जबतक वह बड़ी हो कर शादी न कर ले अवं अपने कार्यक्षेत्र पर जम न जाए तबतक उसकी पूरी जिम्मेदारी मेरी रहेगी.’ डॉक्टर अंकल ने कहा था.

दसवीं कक्षा में पढ़ती शेफाली ये सब समझती थी, उसके पिता के चेहरे पर पहले घैले हुए डर के भाव और उसके बाद तुरंत उभरे संतोष के भाव अच्छी तरह से देखे थे. डॉक्टर अंकल के भी दोनों कथनों में छिपे भावों की झंकार को वह पहचान पाई थी. वह बम्बई पढ़ाई के लिए आई उसके पहले डॉ-एक साल तक वह सुबह कि चाय हमेशा डॉक्टर अंकल के साथ ही लेती थी. मोर्निंग वोक से उसके लौटने का समय एवं अंकल के सवेरे कि चाय लेने का समय एक ही था. वे हमेशा बरामदे में शेफाली का रास्ता देखते बैठे रहते थे.

शेफाली कि मम्मी ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी. कन्नड़ भाषा में मुश्किल से चिठ्ठी लिख पति थी. इसलिए वह डॉक्टर अंकल के साथ खास कुछ बातें नहीं करतीं थीं. अगर बात होती भी तो डॉक्टर की टूटीफूटी कन्नड़ और मम्मी की टूटीफूटी हिंदी से होते वे संवाद ज्यादा देर टिक नहीं पते थे, किन्तु मम्मी शेफाली से कहती: ‘मेरे पितामह को मेरी बेटी को शेलाने कि बड़ी इच्छा थी; मेरे सारे भाई-बहनों के बेटे ही थे. इसलिए वे कहते थे कि मेरी छोटी के तो अवश्य बेटी ही होगी. वे तो जब में नन्हीं-सी थी तब के चल बसे थे. मुझे तो तेरे डॉक्टर अंकल में मेरे पितामह की ममता एवं स्नेह नजर आते हैं.’

कृष्ण राव का बैंक, मम्मी का गृहकार्य, शेफाली की पढ़ाई एवं डॉक्टर अंकल का जोरों से चलता हुआ व्यवसाय, इन सब के बिच गुजर रहे बरसों में अचानक एक परिवर्तन आ गया. एक सरल फिर भी रौबदार औरत कभी कभी डॉक्टर अंकल के साथ आने लगी. देर तक वे साथ साथ बंगले के बरामदे में बैठे रहते. शेफाली को इस औरत में दिलचस्पी जभी. वह कभी सलवार-कमीज में आती तो कभी साड़ी में आती. ण पतली, ण मोती, नहीं श्याम. उसकी दीप्त आँखे जैसे इस दुनिया कि किसी भी चीज पर ठहर ही नहीं पातीं ऐसा लगता था. उसका अर्धवृत्ताकार चेहरा, विशाल ललाट और कम होते जाते घुंघराले काले काले बल. उस कि उम्र भी कुछ कम ण थी. शायद डॉक्टर अंकल के बराबर कि होगी. डॉक्टर अंकल के बरसों के एक से एकाकी जीवन के बाद अचानक आये इस बदलाव से उनके घर में काम करनेवालों से ले कर के कृष्ण राव, उसकी पत्नी एवं शेफाली भी डर एवं जिज्ञासा का अनुभव करने लगे. डर इसलिए कि इस बदलाव के कारण डॉक्टर बिलकुल बदल तो नहीं जाएँगे! जिज्ञासा इस प्रकार कि डॉक्टर इस औरत के संपर्क में किस तरह आये होंगे? उनको उससे प्रेम होगा या फिर किसी व्यावसायिक आयोजन में दोनों शरीक हैं? यह औरत डॉक्टर तो बिलकुल नहीं लगती थी. उसके कंधे पर ज्यादातर कैमरा लटकता रहता था. हाथ में किताबें हमेशा पाई जातीं थीं.

एकबार शेफाली कॉलेज से लौट रही थी तब डॉक्टर अंकल उस औरत के साथ बैठे हुए थे. ‘शेफाली,’ अंकल ने कह. शेफाली को आश्चर्य हुआ. आम तौर पर जब इस अनजान औरत के साथ डॉक्टर बैठे हों तब वे शायद ही किसी को मिलते थे. शेफाली गई. ‘ आ इधर बैठ,’ डॉक्टर ने कहा. ‘इसका नाम है मोहिनी चटवाल. और मोहिनी, यह है शेफाली. हम ने कई बार इस के बारे में बातें की हैं. दूर से उसे आते-जाते देखा है.’

मिहिनी ने सस्मित शेफाली के सिर पर हाथ पसारते हुए कहा: ‘कितनी प्यारी है!’ शेफाली को बहुत ही अच्छा लगा. कम शब्दों में मोहिनी ने उसके बारे में बहुत कुछ कह दिया था, मोहिनी के बारे में उसका सारा डर निकल गया.

‘मैं चलूँ?’ वह उठने को थी.

‘नहीं बेटी, कॉफ़ी ले कर ही जाना, महाराज कॉफ़ी लेकर आता ही होगा,’ मिहिनी ने एक गृहस्वामिनी कि सी अदा के साथ कहा.

शेफाली समाज चुकी थी, फिर भी डॉक्टर अंकल ने कहा: ‘शेफाली, यह आंटी कैसी लगीं?’

‘जिस पर एकदम प्यार आएं ऐसी,’ सहसा शेफाली के मुंह से शब्द निकले. ये शब्द होठों पर कैसे आए इस बात का विस्मय शेफाली को खुद भी हुआ. मोहिनी ने शेफाली का हाथ अपने हाथ में लेकर दबाया.

‘शेफाली, मोहिनी आर्कियोलोजिस्ट है’, डॉक्टर ने कहा.

‘मतलब कि खाक छानते हैं.’ मोहिनी ने हंस कर बात टाल दी.

इस समय हवाई जहाज बेंगलूरू के नजदीक पहुँच रहा था. तब सहसा शेफाली को मोहिनी का ख्याल आया. 'आंटी ने क्यों फोन नहीं किया?' पिछले दो साल से पप्पा के रिटायर होने के बाद वे बेंगलूरू के पास के अपने गाँव के घर में ज्यादा रहते थे. एक से अधिक बार कृष्ण राव ने आऊट हाऊस खाली कर देने की बात छेड़ी थी, किन्तु डॉक्टर ने कहा था: 'किरायेदार जगह खाली करता है. घर के लोगों को यहाँ रहना हो तो यहीं रहे, गाँव में रहना चाहे तो गाँव में रहे.' बेंगलूरू से करीब तीस किलोमीटर कि दूरी पर स्थित शेंगांव में कृष्ण राव रहते थे लेकिन साल में दो तीन महीने बेंगलूरूवाले घर में रहते थे. ख़ास करके शेफाली की छुट्टियों में वे ज्यादातर समय वे बेंगलूरू में रहते थे. वह मोहिनी को पहली बार मिली थी उसके बाद फुरसत में तो मुश्किल से दो-तीन बार मुलाकात हुई होगी. दूसरे साल वह मुंबई पढने के लिए आई इस दौरान डॉक्टर अंकल और मोहिनी ने शादी की थी. वेकेशन के दिनों में वह जाती तब देखती कि अंकल किसी मेडिकल कोंफ्रंस के लिए परदेस जा चुके होते, या फिर मोहिनी अपने किसी पुरातत्त्वीय संशोधन से सम्बंधित कार्य में जुट गई होती. एक बार जब अंकल घर पर नहीं थे तब मोहिनी ने शेफाली को दो-तीन दिन अपने साथ रहने के लिए कहा था. मोहिनी देर तक पढ़ती रहती. शेफाली उसके पसंदीदा विषयों से चकित हो जाती थी. कभी उस के हाथ में लोकप्रिय डिटेक्टिव उपन्यास होता तो कभी गुरजिएफ या कृष्णमूर्ति जैसे चिन्तक की किताब होती थी. एक रात मोहिनी बातें करने के मूड में थी. उसने शेफाली को ‘मैं जब तेरी उम्र की थी’ – कर के बहोत साडी बातें सुनाई.

शेफाली ने सोचा कि: 'मुझे डॉ. मिश्र ने क्यों फोन किया? मिहिनी आंटी ने क्यों नहीं किया? सचमुच क्या अंकल बहुत बीमार होंगे? कि फिर...'

वह आगे सोच नहीं पाई. जब वह रो रही थी तब ऐसे रोते हुए छोड़कर अस्पताल चले गए थे, डॉक्टर अंकल का चेहरा उसकी स्मृति में कायम था वो ही चेहरा उसकी आँखों के सामने उभर आया. डॉक्टर अंकल उस प्रकार तो नहीं चले गए होंगे न? डॉ. मिश्र की आवाज में चिंता थी. डॉक्टर मिश्र अब नए सहायक की हैसियत से कार्यभार सम्हाल रहे थे, ऐसा पिछले वेकेशन के दौरान डॉक्टर अंकल ने शेफाली से कहा था. किन्तु उनसे मिलने का मौक़ा आजतक नहीं मिल पाया था. आज हवाई अड्डे पर वह कैसे डॉ. मिश्र को पहचान पाएगी? कि फिर पप्पा शेंगांव से आ चुके होंगे? 

हवाई जहाज में सूचित किया गया: ‘अब कुछ ही देर में हमारा हवाई जहाज बैंगलूरूके हवाई अड्डे पर अवतरण करेगा.’ शेफाली अब होने वाले अनुभव की कल्पना मात्र से काँप उठी थी. डॉक्टर के अध्ययन में मृत्यु के साथ तो नाता हमेशा जुड़ा ही रहता है. परन्तु उसकी कोलेज के एक अध्यापक कहते थे: ‘मृत्यु के साथ जुड़े हैं ऐसा कहकर नकारात्मक रवैया मत अपनाओ. आप मृत्यु के साथ नहीं, जीवन के साथ जुड़े हुए हो.’ बहरहाल जो भी हो, क्या हकीकत कभी बदली जा सकती है? डॉक्टर अंकल है तो है, नहीं है तो –

फिर वह रुक गई. आगे सोचना उसे पसंद न था. हवाई जहाज धीरे धीरे अब टर्मिनल के पास आकर रुका. शेफाली काफी पहले से उठकर दरवाजे के पास पहुँच गई थी. उसके चेहरे पर परेशानी एवं अधैर्य को देखकर एक दो सहयात्रियों ने उसके लिए जाने का रास्ता छोड़ दिया. वह नीचे आई.

अराइवल लाउंज में पाँव रखते ही एक अच्छे से युवक ने उसके सामने आ कर पूछा:

‘आप शेफाली राव?’

‘हां.’

‘मैं डॉक्टर मिश्र हूँ.’

‘कैसे हैं डॉक्टर अंकल?’ शेफाली ने पूछा. इस प्रश्न को सुना अनसुना कर के डॉ. मिश्र ने पूछा, ‘आपके पास केवल इतना ही सामान है कि लगेज के लिए ठहरना होगा?’

‘इतना ही सामान है.’ शेफाली ने कहा. तब शेफाली के हाथ से बैग उठा कर डॉ. मिश्र आगे चलने लगे. ‘पार्किंग लोट से गाड़ी लाता हूँ: आप यहीं पर खड़े रहिएगा,’ कहते हुए वे गाड़ी लेने निकल गए.

थोड़ी ही देर में शेफाली के पास डॉक्टर अंकल की गाड़ी आ कर रुकी. यह गाड़ी उसकी काफी जानी पहचानी थी. डॉक्टर अंकल के साथ इस गाड़ी में उसने मिलों तक सफर की थी. मर्सिडीज के यह पुराने मॉडल को डॉक्टर ने चाव से सम्हाल के रखा था. आज पहली बार वह इस गाड़ी में डॉक्टर अंकल के बगैर बैठी.

गाड़ी चली और एअरपोर्ट के बहार निकलते ही डॉ. मिश्र ने कहा,’शेफाली, दि वर्स्ट हेज हेपंड. बहुत ही बुरी खबर है.’

‘मुझे कुछ आशंका तो थी ही, डॉ.मिश्र, लेकिन, अचानक यह कैसे हो गया?’ शेफाली को था कि वह यह खबर सुन ही नहीं पाएगी, किन्तु पिछले कुछ घंटों में समय ने अनजाने में ही इस खबर के लिए उसे आगाह कर दिया था. यह अशुभ खबर सुनकर वह कुछ ज्यादा उदास हो उठी उतना ही, परन्तु वह बिलकुल स्वस्थ थी. उसने पूछा, ‘अभी महिने पहले मैं यहाँ से गई तब तो वे काफी भले चंगे थे.’

‘कल रात ग्यारह बजे तक ठीक ही थे.’ डॉ. मिश्र ने कहा.

शेफाली ने शांति से सुन लिया. डॉ. मिश्र शेफाली के प्रतिभाव जानने के लिए थोड़ी देर रुके. किन्तु शेफाली ने कुछ नहीं कहा इसलिए उन्होंने आगे कहा: ‘पिछले दिन शाम वे बेरिस्टर मोहंती के वहाँ गए हुए थे, वहाँ सत्यजित रे की फिल्म की विडिओ देख रहे थे. रात ग्यारह बजे वे अचानक उठे. ‘कल सवेरे तीन ऑपरेशन हैं, मुझे सो जाना चाहिए,’ कहकर वे निकले. ड्राइवर को तो शाम को ही छुट्टी दे दी थी. वे स्वयं ड्राइव कर के घर पहुंचे. महाराज उनकी राह देख रहे थे. ‘मुझे कुछ खाना नहीं है.’ उन्होंने कहा. दूध के लिए भी मनाही कर दी. मोहंती के वहाँ भोजन किया था. सवेरे सात बजे तक जब वे उठे नहीं तो महाराज जगाने के लिए गए.’

‘मोहिनी आंटी नहीं थीं?’

‘नहीं वे जयपुर से कुछ दूर कोई नए अवशेष मिले थे उनकी खोज – छानबीन के लिए गईं हैं. महाराज ने दरवाजा खटखटाया लेकिन सर जगे नहीं. महाराज चिंता से परेशान हुए. उन्होंने मुझे फोन किया. मैं गया. द्वार खटखटाने पर नहीं खुले, तब हम वेंटिलेशन से अरगल खोलकर अंदर गए. पंडित साहब सो रहे हो ऐसे शांति से पड़े हुए थे. उनकी नब्ज बंद थीं. मैंने दुसरे डॉक्टरों को बुलाया. सब ने एक ही बात कहीं: ‘रात को नींद में ही अटेक आया और वे उठ ही नहीं पाए. शेफाली, अब भी वे ऐसे ही सोये हुए है कि अभी उठ बैठेंगे.’

‘अब भी?’

‘हां, बैरिस्टर मोहंती ने कहा कि उनका विल मोहिनी और शेफाली कि उपस्थिति में ही खोलना है.’

‘विल?’

‘हाँ. उनकी संपत्ति के बारे में उन्होंने क्या प्रबंध किया है, वह आप दोनों की उपस्थिति में और जहाँ तक संभव हो वहाँ तक उनके अंतिम संस्कार से पहले ही पढ़ा जाना चाहिए. मोहिनी को संदेशा भेज दिया है. उस ग्राम्य विस्तार में जाने के लिए वे कल शाम ही जयपुर से निकल गईं हैं. जयपुर से उन्हें प्रत्यक्ष रूप से संदेशा देने के लिए एक आदमी को भेजने की व्यवस्था कर दी है.’

शेफाली का दिमाग चकरा रहा था. डॉक्टर अंकल के मृत्यु की बात तो जैसे एक तरफ ही रह गई और उनके वसीयतनामे की बात ही जैसे महत्वपूर्ण हो ऐसे डॉ. मिश्र बात कर रहे थे. पूरे रास्ते में वह कुछ भी नहीं बोली. वह सोच में डूब गईं. डॉक्टर अंकल नहीं रहेंगे ऐसे पल के बारे में उसने कभी सोचा ही न था. अब अचानक यह हकीकत उसके सामने आ कर खड़ी थीं. मोहिनी को इस बात का पता चलेगा तब उसका क्या होगा? मोहिनी को डॉक्टर के वसीयतनामे की नहीं, डॉक्टर की जरूरत थी. वह पंजाब के दौलतमंद जमींदार की इकलौती बेटी थी. उसे चाहिए था डॉक्टर पंडित का साथ. मोहिनी ने अभी कुछ ही समय पहले शेफाली को कहा था: ‘मैं बहुत सनकी हूँ. साल में चार-पांच महिने घूमती फिरती हूँ. तेरे डॉक्टर अंकल के सिवा शायद ही और कोई मुझे समज पाया है. वे यदि न मिले होते तो मैं कभी भी किसी से जुड़ नहीं पाती. मुझे शादी की नहीं, सहजीवन की जरूरत थी. मुझे मेरे शारीर पर स्वामित्व जतानेवाले पुरुष की नहीं, परन्तु मेरे साथ एक ही स्तर पर रहकर, एक ही भूमिका पर रहकर बात करनेवाले मित्र की जरूरत थी. तेरे डॉक्टर अंकल मुझे ऐसे ही साथी के रूप में मिले हैं.’ अब मोहिनी डॉक्टर अंकल के बीना कैसे जी पाएंगी?

शेफाली बंगले पर पहुंची तब तक उसके मम्मी-पप्पा भी शेंगाव से आ चुके थे. मम्मी तो बस लगातार रोये जा रही थी. इन सब में डॉक्टर अंकल के साथ कम से कम सम्बन्ध मम्मी का था. फिर भी आज उसकी आँखों से गंगा-जमुना बह रहीं थीं. शेफाली को देखते ही वह उस से लिपट गईं: ‘बेटी, सिर से छत्र उठ गया!’ माँ के शब्द सुनकर शेफाली गदगद हो गई. पप्पा ने शेफाली को माँ से अलग किया. शेफाली ने पप्पा के कंधे पर सिर रखा: ‘शेफाली, मैं तो तेरे जन्म का निमित्त पिता था. सही माने में तेरे पिता तो डॉ. पंडित ही थे.’ कृष्ण राव शेफाली को अंदर के खंड में ले गए.

बिस्तर पर डॉ. पंडित का निश्चेतन शरीर पड़ा था. उसके ऊपर सफ़ेद चद्दर ढँक दी गई थी. शेफाली ने चद्दर को जरा सा हटाया. डॉक्टर अंकल जैसे अभी ‘शेफाली, तुम कहाँ से?’ ऐसा बोल उठेंगे ऐसा प्रतीत हो रहा था. सचमुच क्या डॉक्टर अंकल नहीं रहे? उसके मन में प्रश्न उठा. उसने नब्ज देखी. दूसरे ही पल मुश्किल से वह अपने आप को रोक रही थी कि बाँध टूट गए. शाली क कण से हृदय विदारक रुदन बह निकला.

‘शेफाली, धीरज धर,’ डॉ. मिश्र कह रहे थे.

इतने में कोई अंदर आया: ‘डॉ.मिश्र, जयपुर से कोल है.’

डॉ. मिश्र जयपुर का कोल देखने के लिए गए. शेफाली, कृष्ण राव सभी अधीरता से सांस रोके हुए थे. सब को यकीन था की सामने से मोहिनी ही बात कर रही होगी.

‘क्या?’ फोन पर बात कर रहे डॉ.मिश्र की आवाज फटी की फटी ही रह गई, क्या कह रहे हैं? मोहिनी की हत्या हो गई है?’

इसी एक प्रश्न से समूचे खंड में सन्नाटा छा गया.

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(क्रमशः अगले प्रकरणों में जारी...)

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