देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम' की एक कविता : घास !

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मानकर घास को बिस्तर 
मस्त नीँद मेँ                    
सो सकते हैँ थककर       

मान सकते हैँ       
ममतामयी माँ की         
नर्म-गर्म गोद  या                
लहू सनसनाती देह पत्नी-प्रेमिका की                           

सही है यह भी कि
खुशहाली समृद्धता का प्रतीक है
घास का रंग तिरंगे मेँ  
दुही जाती है घास       
दुधारू पालतू पशुओँ के थनोँ से वैसे ही                     
जैसे दुहाई के लिए    
तयशुदा है   प्रजा          

बोझे की शक्ल मेँ चढ़कर
घसियारिन के सिर पर     
बाज़ार मेँ बिककर       
उसके परिवार की          
एक वक्त की भूख           
बुझा सकती है                

पर यह क्योँ 
भूल गए दुहय्ये सूखी 
घास भड़क सकती है             
बदल सकती है     
सब कुछ राख मेँ सुलगकर    

उसे चाहिए किसी विक्षुब्ध
ज़ेह्न ग़मगीन दिल      
पीड़ित देहवाले मेहनतकश    
के पपड़ाए होँठोँ मेँ दबी
जलती बीड़ी का साथ     
पल भर उसे चाहिए         

हाँ अब होना चाहिए यही
कविता सुलगती बीड़ी सी 
होँठोँ पर होनी चाहिए
मुक्तिबोध की चाह लिए
कविता मेँ आग लिखनी चाहिए
कविता से आग लेकर
घास को सुलगना जलना धधकना चाहिए                

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1 टिप्पणी "देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम' की एक कविता : घास !"

  1. हाँ अब होना चाहिए यही
    कविता सुलगती बीड़ी सी
    होँठोँ पर होनी चाहिए
    मुक्तिबोध की चाह लिए
    कविता मेँ आग लिखनी चाहिए

    ज़रूर.... यह आग लगनी ही चाहिए

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