गुरुवार, 27 सितंबर 2012

राजीव आनंद की कविताएं

भगवान

हर आदमी में जो ‘जान' है

वही भगवान है ।

जान आदमी से जब निकलता है

क्‍या पकड़ उसे कोई सकता है ?

विज्ञान चाहे कैसा भी बना ले डब्‍बा

कर सकता नहीं ‘जान' को कैद

भगवान को खोजना व्‍यर्थ है

लैब में

अरे पागल भगवान तो सर्वत्र है !

क्‍या तुम्‍हें अच्‍छे और बुरे की

कराता नहीं है पहचान अन्‍तरात्‍मा

सुनते क्‍यों नहीं तुम अन्‍तरात्‍मा की आवाज ?  

ढूंढते रहते हो लगा-लगा कर आवाज

और कर कर के फरियाद

अरे पागल सुनो अन्‍तरात्‍मा की आवाज

यही है भगवान को पाने का आगाज

बैठ कर भगवान अंदर तुम्‍हारे

खुद से तुम्‍हीं को करता है दूर

नहीं सुनने के लिए अन्‍तरात्‍मा की

आदमी हो जाता है मजबूर

और जाता चला जाता है

अंदर छुपे बैठे भगवान से दूर

अरे पागल सुनो अन्‍तरात्‍मा की आवाज

यही है भगवान को पाने का आगाज !

आदमी कोई भी हो

रहता है सबके अंदर भगवान

जाति, वर्ण, धर्म से इसलिए

गलत है करना आदमी की पहचान

पहचान इसकी सिर्फ है इतनी

आदमी साक्षात्‌ भगवान है !

अरे पागल सुनो अन्‍तरात्‍मा की आवाज

यही है भगवान को पाने का आगाज !

भगवान मन बहलाता है

खेलाता है तुम्‍हें देकर प्रलोभन

और तुम नहीं सुनते

जो कहता है तुम्‍हारा अंतःमन

बस इतना ही तो समझाया

शंकराचार्य और विवेकानंद

अरे पागल सुनो अन्‍तरात्‍मा की आवाज

यही है भगवान को पाने का आगाज !

-

बढ़ता हुआ बच्‍चा

बच्‍चा पापा-पापा कह कर, तलाशता है अपना वजूद

बिता नहीं पाता पापा समय अपने बच्‍चे के साथ

पकड़ा देता है उसे मोबाइल फोन

बच्‍चा खेलते-खेलते हो जाता है बोर

बच्‍चा बड़ा हो गया है थोड़ा, पुकारता रहता है पापा-पापा

पापा खुश नहीं हो पाता चाह कर भी उसे जाना है दूर

देता है बच्‍चे को लैप टॉप, खेलता है बच्‍चा कुछ दिन

फंसता जाता है नेट के जाल में मकड़ियों की तरह

बढ़ता हुआ बच्‍चा, बढ़ता जाता है अर्धनग्‍न तस्‍वीरों को देखते हुए

तरह-तरह की कल्‍पना करते उस कल्‍पना को जीते

जानना चाहता है वो बहुत कुछ पापा-मां से

फुरसत कहां है मां-पापा को

बन जाती है तब एक दुनिया नासमझ के कल्‍पना की

अब टीनऐजर हो चुका है बच्‍चा

व्‍यस्‍त है जाल के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए पर अभिमन्‍यु नहीं है वो

बन नहीं सका पापा कभी अर्जुन

अब अलग कमरे में रहता है बच्‍चा

आंखों से बचाकर पापा के

साथ रख लेता है लैप टॉप

करता है सर्फ रात के अंधेरे में

पापा-मां के कमरे से आती विचित्र आवाज

विचलित करती है बढ़ते बच्‍चे को

चाहता नहीं है देखना

पर रोक भी नहीं पाता खुद को

भावनाओं को सीखा नहीं है वो प्रतिबंधित करना

बहना जानता है, वो भी आड़े-तिरछे

जो देखता है रात को कमरे में

मनोरंजन है पापा-मां के लिए, देह सुख की प्राप्‍ति

क्‍या है यह विचित्र भाव-भंगिमा, प्रश्‍न बन कर उभरता है

तलाशता है उत्‍तर वो यहां-वहां

आता है संसर्ग में वो चैटिंग के

अधेड़ उम्र की महिलाएं बनकर टीनऐजर

लुभाती है इस टीनऐजर बच्‍चे को

चिपकता जाता है वह लैपटॉप पर

अब परेशान रहने लगा है, गर्दन और रीढ़ के दर्द में

फिर भी नहीं छूटता है लैपटॉप

चिपका रहता है गोद में लैपडाग की तरह

मां ने दूध रख छोड़ा था रात में

फेंक देता है सुबह वो गमले में

तुलसी का पौधा लहलहा उठा है

जड़ पर दूध पाकर कुछ दिनों में

बढ़ते बच्‍चे के गले में लग गया है सर्वायकल कॉलर

आंखों में चढ़ गया है मोटी लेंस का चश्‍मा

नंगी तस्‍वीरों को नेट पर देखता है जब

एडजस्‍ट करता रहता है चश्‍मा, कुछ ज्‍यादा नंगा देखने के लिए

परेशान हो जाता है कुछ और देखने-करने को

टीनऐज अब खत्‍म होने को आया, बीस वर्ष हो चुका है

अब नहीं करता वो पापा-पापा

देखना ही नहीं चाहता अब वो पापा को

भाया मां कभी कदा बतियाता है, वो भी सब झूठ

पचासवें वर्ष पापा होश में आया है

तब तक दूर जा चुका है बच्‍चा

जीते हुए एक जिंदगी, पापा-मां की दी हुयी

अपने वजूद से जुदा

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क्‍यों छल रही हो

यूं मुस्‍कराकर

अपने चाहने वालों को

रूपए लेकर

कर देती हो मानसून ऑफ़र

वैसे चीजों का

जिसकी नहीं है जरूरत

तुम्‍हारे चाहने वालों को

तुम्‍हारी मुस्‍कुराहट पर फिदा

मासूम लोगों का

अच्‍छा उठाया है

तुमने फायदा

 

आंचल

गिर गया स्‍कूल बस से उतरते हुए

बंटी और बबलू

दौड़ी उनकी मांएं

उठाने उनको

सर से खून रिस रहा था

आँचल का एक कोना फाड़ा

बंटी की मां ने

बांध दी सर पर पट्‌टी

बेबी की मां ने भी

करना चाहा था ऐसा

पर क्‍या करती

जीन्‍स और टॉप में

कहां मिलता आँचल !

 

पिता

पिता बीमार चल रहे है

कई दिनों से

देखते-देखते थक गया है

शिशिर

फुर्सत नहीं है कि बन सके

अपने पिता की लाठी

जो बखूबी बन चुके थ उसके पिता

शिसिर के बचपने में

जब वो चल नहीं पाता था

बिना सहारे के

--

राजीव आनंद

Prof.Colony, New Barganda

Giridih (Jharkhand)

Email-pikkybabu@gmail.com

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