एस. के. पाण्डेय के दोहे

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

image

दोहे(९)

धीरे-धीरे पर बहुत बदल गया संसार ।
यसकेपी सब ओर अब दिखता हाहाकार ।।

इज्जत की होने लगी देखो इज्जत तार ।
शांति जहाँ थी सर्वदा वहाँ मची है रार ।।

यसकेपी देखा पियत अमरित को विष घूट ।
काँटों की किसमत जगी फूलों की गय फूट ।।

मछली अब करने लगी पानी से टकराव ।
बगुला आये बीच में कहता करूँ बचाव ।।


यसकेपी नाते सकल चले सहज ही टूट ।
नेह नाम की चीज नहि घर घर में है फूट ।।

अपनों को भी अब नहीं अपनों से भी आस ।
यसकेपी दिन-दिन घटे अपनों बीच मिठास ।।

जाको सब अपना कहे समुझे खासमखास ।
यसकेपी वे ही करैं सबसे अधिक निरास ।।

बुधि कलुषित कलि ने कियो लोग बिबस छल झूठ ।
सदाचार लोगन तजे ज्यों पाती तरु ठूठ ।।

नयन नीर देखा नहीं लोग रहे बहु रोय ।
यसकेपी जब उर नहीं नीर कहाँ से होय ।।

भाव बहुत ही बढ़ गए लोग भये बिनु भाव ।
यसकेपी उपचार नहि देन लगे सो घाव ।।

यसकेपी देखा सही बदल गए बरताव ।
गैर हितैषी देखते अपना-अपना दाँव ।।

यसकेपी लूटे बिना लोगन दियो लुटाय ।
याते ही चहु ओर अब लूटै लूट दिखाय ।।

मानव बनिये एक है दूजा नहीं उपाय ।
यसकेपी याते सही सब अवरेब नसाय।।

माने से मानव मनुज सुखी होय संसार ।
यसकेपी माने बिना जाय न पापाचार ।।

यसकेपी गुनि देखिए पाप निसा गहरात ।
नियम नीति माने मनुज होय पुण्य परभात ।।
---------

डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.) ।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो
   
              *********

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

1 टिप्पणी "एस. के. पाण्डेय के दोहे"

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.