शनिवार, 22 सितंबर 2012

गोवर्धन यादव का व्यंग्य - कौवे की लकड़ी

कौवे की लकड़ी

हावतों का अपना एक ठोस आकार-प्रकार होता है और वे सच्चाई के बहुत ही करीब होती हैं। ऐसी ही एक कहावत है ‘पक्षियों में कौवा और आदमियों में नौंवा।’

इस कहावत का आधा अंश फिलहाल हमारे काम का है जिस पर हमें विस्तार से चर्चा करना है और इसका दूसरा अंश जिस पर और कभी चर्चा की जा सकती है। वैसे दूसरा अंश पहले अंश से इस तरह जुड़ा हुआ है कि उसे उससे अलग कर पाना थोड़ा कठिन कार्य सा प्रतीत हो रहा है। दूसरे अंश पर अपनी बातचीत दो चार पंक्तियों में ही कहकर समाप्त की जा सकती है। मान लें सौ आदमी हैं, आदमियों में नौंवा याने कि एक या फिर नौ आदमियों को हमें अलग करना पड़ेगा। बचे 91-91 में एक आदमी ऐसा होता है जो दस पर अपना प्रभुत्व कायम रखकर शासन का तंत्र चलाता है। इसी एक आदमी का हम अपनी कहानी में लेकर पहले वाक्यांश से जोड़ने का प्रयास करेंगे। तब जाकर पूरी कहावत का अर्थ हम अच्छी तरह पकड़ पाएंगे।

कौवे का अपना चरित्र होता है जिसका वर्गीकरण हम बड़ी आसानी से कर सकते हैं। इसमें उसकी बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, धूर्तता, चालाकी, लम्पटता, कर्कशता एवं साथ ही सेवा-भाव आदि का समावेश कर सकते हैं। आश्चर्य होता है कि इतने सारे दोष-गुण और वे भी एक साथ कौवे को छोड़कर किसी और पक्षी में नहीं पाए जा सकते। अतएव पक्षियों में सिरमौर बने रहने का सौभाग्य यदि किसी को प्राप्त होता है तो वह एकमात्र पक्षी ‘कौवा’ ही है। यदि घड़े में पानी कम है तो वह कंकड़ डालकर पानी पीकर उड़ जाएगा। यदि भूखा है तो निडर होकर रोटी लेकर भाग जाएगा। यदि किसी पेड़ पर उसका घोंसला है तो क्या मजाल आप पेड़ पर चढ़ जाएं। काँव-काँव की कर्कश आवाज निकालकर वह अपनी टोली इकट्ठी कर लेगा और आप पर आक्रमण कर बैठेगा। यदि धोखे से वह सिर पर बैठ जाए तो समझ लो कि आप पर पहाड़ टूट पड़ेगा। मौत को नजदीक जानकर आपको ठंडा पसीना आने लगेगा। यदि आपको अपने पुरखों से मिलना हो तो भी आपको इसी से संपर्क बनाए रखना होता है। कीड़े-मकोड़ों को बड़े चाव से चट कर जाता है। इस तरह वह प्रकृति में संतुलन बनाए रखने में भी अपना योगदान देता है। कहीं वह काकभुषुण्डि बनकर कन्हैया के हाथ से रोटी छीनकर खाने का सौभाग्य भी प्राप्त कर लेता है। तो कहीं वह रात के अंधेरे का फायदा उठाकर अपने अण्डों को कोयल के घोंसले में छोड़ आता है। और बदले में उसके अंडे चुराकर अपनी भूख मिटा लेता है। अण्डे सेंतने का काम कोयल करती है और बच्चे पैदा होते हैं कौवे के। इस तरह वह बड़े शान से जीता है।

ऐसी भी एक मान्यता है कि जिस पेड़ पर कौवे का घोंसला हो उसे कृष्ण-पक्ष में काटकर, इसी पक्ष में उसकी कुर्सी बना दी जाए तो उस पर बैठने वाले व्यक्ति के अन्दर कौवे के सारे गुणधर्म प्रकट होने लगते हैं। जैसा कि हमने आदमियों की संख्या में से एक आदमी को अलग छांट लिया था। वह आदमी जो नेतृत्व दे रहा होता है, में उसके गुणधर्म हम स्पष्ट रूप से देख सकते हैं।

एक ऐसा ही पेड़ जिस पर कौवे का घोंसला था, कृष्ण-पक्ष में काटा गया और संयोग से उसकी कुर्सी बनी वह भी कृष्ण-पक्ष में। उस कुर्सी पर एक आदमी बैठा और बैठते ही उसके आदमीयत के गुण लोप होते चले गए और कौवे के गुणधर्म उभर कर सामने आने लगे। और अब यह विशिष्ट व्यक्ति जनप्रिय ‘नेता’ कहलाने लगा।

अब नेता के चरित्र को लीजिए। यदि उसकी कुर्सी पर कोई और आकर बैठ जाता है तो पहले वाला नेता दूसरे पर सांप्रदायिक, देशद्रोही, चरित्रहीन होने का लांछन लगाने लगता है, और अपना एक ग्रुप बनाकर दूसरे वाले को कुर्सी छोड़ने पर विवश कर देता है, या फिर उसकी पार्टी के कुछ लोगों को साम दाम दण्ड और भेद की नीति से अपनी ओर मिला लेते हैं। पहले वाले की सरकार शक्ति-परीक्षण में अल्पमत में आ जाती है और उसे मजबूरन सीट खाली करनी पड़ती है। ऐसे व्यक्ति को हर समय आशंका बनी रहती है और वह फ़ूंक-फ़ूंक कर अपने पैर बढ़ाता है और जहां भी अवसर मिलता है, वह दूसरे पर तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर लांछन लगाते रहता है. कभी-कभी वह कड़ा रुख पाकर पैंतरा बदल लेता है. इस तरह एक आम आदमी बुद्धिमान होने का खिताब पा लेता है.

वह ऊपर से सेवा भाव की चादर ओढ़कर अपनी दक्षता का प्रमाण भी देता रहता है. यदि कहीं बाढ़ आती है तो वह अपनी आंखों से भी आंसुओं की बाढ़ बहाने लगता है., सूखा पड़ता है तो वह भी सूख जाता है और जब भी बोलता है तो बड़ी चालाकी से देश प्रेम बखानता अपने प्रतिद्वंद्वियों को ललकारता, जनता के दिल और दिमाग में छा जाना चाहता है . जनता उस पर सहज ही विश्वास करने लग जाती है. एक बार उसने जनता का विश्वास प्राप्त कर लिया तो फ़िर वह बड़ी-बड़ी योजनाओं की घोषणाएं करता है, उन्हें साकार रुप देने के लिए विदेशों के दौरे लगाता है, एक्सपर्ट बुलाता है और इस तरह कागजी घोड़े दौड़ा-दौड़ा कर वह करोड़ों की रकम उदरस्थ कर जाता है.

यदि हम कौवे में और नेता में तुलनात्मक अध्ययन करें, तो पाते हैं कि दोनों के गुणधर्म में, एक सी समानता है. फ़र्क बस मामूली सा है कि कौवा शरीर से काला होता है और नेता दिल से...अन्दर से काला होता है.

इतना बड़ा आरोप लगाने की, न तो हममें हिम्मत है और न ही सामर्थ्य. हम इतना जरुर कह सकते हैं कि दोष हमारा नहीं, बल्कि उस व्यक्ति का दोष है, जिसने यह कहावत बनाई. उसकी यह मान्यता है कि जिस पेड़ पर कौवे का घोंसला हो, उसे कृष्ण-पक्ष में काटा जाए और फ़िर इसी पक्ष में उसकी कुर्सी बाई जाए, तो उसमें बैठने वाले व्यक्ति के सदगुण अपने आप बदलने लग जाते हैं.

जैसा कि हमने कहानी में पढ़ा था कि कभी एक राजा हुए थे, जिनका नाम विक्रमादित्य था. उनका अपना एक जादुई सिंहासन था, जिस पर बैठकर वह राज्य चलाते थे और अनोखे निर्णय दिया करते थे. कालान्तर में वह सिंहासन धरती के गर्भ में कहीं समा गया था. उसे खोज निकालने के लिए किसी ने प्रयास न किया हो, ऐसा मैं नहीं समझता. काफ़ी खोजबीन के बाद भी वह सिंहासन आज तक मिल नहीं पाया है. आदमी की शुरु से खोजी प्रवृत्ति रही है. सिंहासन न मिल पाने का गम उसने नहीं पाला और न ही उसकी सिंहासन पर बैठने की उम्मीद ही टूटी.

वह खोज करता रहा. करता रहा. दुर्भाग्य कहें या फ़िर उसका सौभाग्य, मालूम नहीं, लेकिन यह नहीं जानता था की वह कौवे की लकड़ी की कुर्सी बना रहा है. कुर्सी बनने के बाद वह उस पर जा बैठा और राज्य चलाने लगा. बैठते ही उसके गुण-धर्म कब बदल गए, और उसे पता ही नहीं चल पाया.

आज उसे कुर्सी से इतना मोह हो गया है कि कोई भी रम्भा या मेनका, उसका मोहभंग नहीं कर सकती. यदि कोई स्वर्ग से इन्द्र का सिंहासन लेकर आए और उससे कहे कि वह अपनी लकड़ी के कुर्सी से बदल ले, तो वह स्पष्ट रुप से उसे मना कर देगा.

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१०३, कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा

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