रविवार, 9 सितंबर 2012

मोती लाल की कविता - संबंध

कोलाज अमृतलाल वेगड़
मैं जोड़ दूँ उन रोशनियों को 
जो जुड़ी नहीं है तुम्हारी आँखों में कहीं
तब भी क्या उतर आएगी वे कविताएँ
तुम्हारे आँगन में जो दे सकेगी
चिड़ियों को दाना और जोड़ पाएगी
रिश्तों के गर्माहट को

यदि शब्द और स्तब्धता
डर के धुँधलके में सीढ़ी-दर-सीढ़ी
उतर आता हो अंतर्मन में
जहाँ यह डर नहीं रहता
कि फटा हो बारुद
जला दी गयी हों झोपड़ियाँ
और तान ली गयी हो दीवारें
जहाँ बचाकर नहीं रखा जा सकता
मृत्यु तक को
और अनंत पृष्ठों में फैली
तुम्हारे शब्द के चुभन विलिन होता हो
चंद्रमा वाली रात में

अंधेरी गलियों में
कितना ऊँचा उठ सकता है वे तितलियाँ
जो अनेपक्षित संज्ञा की तरह
कहीं किताब में बंद है
और आँचल के दूध सा झड़ जाते हैं
पतझड़ के वे तमाम पत्ते
जो आस्वस्त तो करते हैं
कि नहीं अभी वसंत नहीं मरा है
और बची हैं कविताएँ
अपने समय को चीरती हुई
इस टेढ़े समय को खारिज करती हुई
कि तस्वीर नहीं बना है
हमारे समय का समय

जोड़ने की तारीख के पीछे जुड़ी रहती है
वे तमाम संज्ञाएं जो धकेल पाती है
हमारे समय के असंगतियों को ।

* मोतीलाल/राउरकेला

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(चित्र - अमृतलाल वेगड़ का कोलॉज)

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