दीप्‍ति परमार की कविताएँ

निरुत्तर

जिन अपनों को हमने बनाया

अब वही हमें बनाते हैं......

जिन अपनों को शब्‍द-शब्‍द करके,

बोलना, गाना, लिखना सिखाया,

अब वही गिनाते हैं हमें गलतियाँ ।

जिन अपनों को कदम-कदम सँभालकर,

चलना, उठना, दौड़ना सिखाया,

अब वही देते हैं हमें लकुटियाँ ।

जिन अपनों को घर आँगन देकर,

स्‍नेह, वात्‍सल्‍य, ममता से सींचा,

अब वही दिखाते हैं हमें रास्‍ता ।

जिन रिश्तों के लिए हम खुद को,

मिटा देते है, भुला देते है, खपा देते हैं,

वही जब हमें शून्‍य-सा बना देते हैं,

प्रश्न करता है निरुत्तर-सा मन

जमाने से बनते तो अपनों में सँभलते

अपनों से बने हम कहाँ जाते ?

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ख्‍वाहिश

आगे चलने की ख्वाहिश में

पीछे बहुत कुछ छूट जाता है....

कुछ यादें कुछ बातें जिन्‍हें,

सदियों में जिया जा सकता है,

उसे खींच कर तोड़ दिया जाता है,

आगे चलने की ख्‍वाहिश में ।

कुछ रिश्ते कुछ नाते जिन्‍हें,

बरसों में बनाया जाता है,

झटक कर मरोड़ दिया जाता है,

आगे चलने की ख्‍वाहिश में ।

कुछ कसमें कुछ वादे जिन्‍हें,

हृदय से मन से निभाया जाता है,

उसे यूं ही भूला दिया जाता है,

आगे चलने की ख्‍वाहिश में ।

जीवन से जमीन से रिश्ता तोड़कर,

चल रहे है सब आगे ही आगे,

जब देखते है कभी पीछे मुड़कर,

तब पाते है,

छूट गया है बहुत कुछ,

सिर्फ, आगे चलने की ख्‍वाहिश में !

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तपिश के गुलमोहर

तपिश में खिलते है गुलमोहर

खूब फलते फूलते हैं गुलमोहर....

कठिन समय में खूब फलने फूलने की

सीख देते हैं तपिश के गुलमोहर ।

बाहरी तपिश को भीतर सह जाने की

सीख देते हैं तपिश के गुलमोहर ।

दाह सहकर नये फूल खिलाने की

सीख देते हैं तपिश के गुलमोहर ।

जीवन की तपिश में कैसे जिएं?

जी जाने की क्‍या

खूब सीख देते हैं

तपिश के गुलमोहर ।

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डॉ. दीप्‍ति बी. परमार, एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्‍दी विभाग

आर. आर. पटेल महिला महाविद्यालय, राजकोट

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3 टिप्पणियाँ "दीप्‍ति परमार की कविताएँ"

  1. मन को बल्कि अंतर्मन को स्‍पर्श करती हुई दर्द की स्‍याही से लिखी गई बेहतरीन कविताएं । आपकी इन खूबसूरत कविताओं ने दर्द को शब्‍दों में उतारकर दिल में उतार दिया । बहुत बेहतर और दिल हिलाने वाले शब्‍दों से रु ब रु कराया आपने शुक्रिया ।

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  2. दीप्ति जी आपने बिल्‍कुल सही कहा - आगे चलने की ख्‍वाहिश में बहुत कुछ पीछे छूट गया है । हमने बहुत कुछ भूला दिया है । सच आगे चलने की ख्‍वाहिश में छूट गया है बहुत कुछ ।

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  3. चाहे कितने ही 'निरुत्तर' क्युं न हो, नई 'ख्वाहिश' जगाते रहेँगे 'तपिश के गुलमोहर'...

    मन को स्पर्श करतीँ, आह व आशा की सुन्दर कविताएं

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