शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

हिन्‍दी दिवस पर विशेषः- भारत की सम्‍पर्क लिपि : देवनागरी शशांक मिश्र भारती

किसी राष्‍ट्रभाषा व संस्‍कृति परिवेश को अक्षुण्‍ण बनाये रखने के लिए आवश्‍यक है कि वहां की एक लिपि हो और जिस पर उस देश व वहां के निवासियों को गर्व हो, स्‍वाभिमान की भावना हो। जिसे अपने देश ,भाषा, साहित्‍य व संस्‍कृति का गर्व नहीं वह सभ्‍य नहीं ; असभ्‍य, गंवार और असमृद्ध ही कहा जायेगा। इसीलिए दुनिया का प्रत्‍येक स्‍वाभिमानी देश चाहे वह छोटा हो या बड़ा। सर्वप्रथम अपनी लिपि सम्‍बन्‍धी समस्‍या सुलझाता है तत्‍पश्‍चात कोई अन्‍य कदम उठाता है। उदाहरणार्थ- चान, जापान, रूस, जर्मनी का नाम लिया जा सकता है। जहां तक अपनी भाषा व लिपि का प्रश्‍न है अपने देश में तो भाषा पर भी सरकार व जनमानस दोनों मौन हैं। मात्र चिल्‍लाना जानते हैं। राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी के सम्‍बन्‍ध में मैं स्‍वतंत्रता के बाद की एक घटना का उल्‍लेख करना चाहूंगां जबकि तत्‍कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहय ने अपनी बहिन विजयलक्ष्‍मी पंडित को भारतीय राजदूत के रूप में सोवियत संघ में नियुक्‍त किया , किन्‍तु परिचय पत्र स्‍टालिन को सौंपने के लगभग एक माह बाद तक अनुमति नहीं मिली। जो कि भारत और रूस के मधुर सम्‍बन्‍धों को देखते हुए बड़ी विचित्र बात थी। भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा जब रूस के विदेश मंत्रालय पर दबाव डाला गया तो वहां से जो उत्तर मिला उससे सभी के होश उड़ गये। रूसी विदेश मंत्रालय ने जानना चाहा कि क्‍या भारत की अपनी कोई भाषा और लिपि नहीं है। जो उसके राजदूत ने अंग्रेजी में अपना परिचय प्रस्‍तुत किया है।

स्‍टालिन ने विजयलक्ष्‍मी पंडित से राजदूत नियुक्‍ति के राष्‍ट्रपति डां. राजेन्‍द्र प्रसाद के आदेश को तभी स्‍वीकार किया।जब वह देवनागरी लिपि और हिन्‍दी भाषा में प्रस्‍तुत किया गया। किन्‍तु हम कोई सन्‍देश न ले सके, बल्‍कि आज एक भी राजनीतिक दल सच्‍चे हृदय से राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी व देवनागरी लिपि की बात कहने को तैयार नहीं है। भले ही बाहर से कितना भी ढोल पीट रहा हो।

भारतीय लिपि देवनागरी सर्वाधिक लोगों द्वारा लिखी जाने वाली सरल व वैज्ञानिक लिपि है। देश की अधिकांष भाषाओं व लिपियों की जननी संस्‍कृत भाषा होने से उनका देवनागरी से साम्‍य है। इसलिए इसे एक लिपि का स्‍वरूप देने में कोई भी कठिनाई नहीं होगी। फिर देश की समस्‍त लिपियों में से देवनागरी लिपि ही ऐसी है जो सम्‍पर्क लिपि हो सकती है। भाषा व लिपि के अजायबघर भारतभूमि में राजस्‍थान से लेकर मिथिला तक देवनागरी प्रयुक्‍त होती है। बंगला, उड़िया, गुजराती, गुरूमुखी, मराठी आदि लिपियां भी इसके समतुल्‍य हैं। इसीलिए भारतीय भाषाओं के हित में देवनागरी का प्रयोग देश की एकता, समानता व सामंजस्‍य को पूर्ण बनाने में सहयोग देगा। यही एक ऐसी लिपि है जिसमें वर्णों का वर्गीकरण, उच्‍चारण स्‍थान के अनुसार होता है तथा वर्णमाला में अक्षरों का वैज्ञानिक वर्गीकरण उपलब्‍ध है जो कि अन्‍यत्र दुर्लभ है।

देवनागरी में सरलता, बोधगम्‍यता एवं वैज्ञानिक के साथ-साथ भारतीय भाषाओं को लेकर अपने द्वारा देश की सांस्‍कृतिक एकता बनाने की असाधारण क्षमता है। जिससे राष्‍ट्रीय एकता के प्रयासों को बल मिलेगा। यदि कभी देश की एकता लिपि देवनागरी पर किसी प्रकार का आघात पड़ता है तो उसका प्रभाव प्रत्‍येक भाषा व लिपि पर पड़ेगा। चाहे वह प्रादेशिक या क्षेत्रीय स्‍तर की ही क्‍यों न हो। यह सभी भाषा लिपियों की प्राण है। आज से सैंकड़ों वर्ष पहले देवनागरी की महत्‍वता समझकर ही अमीर खुसरों ने‘‘ न आप आए न भेजी बतियां '' लिखकर सम्‍पर्क भाषा के रूप में देवनागरी की नींव सुदृढ़ की थी। वहीं शेरशाह सूरी (1504-1545) ने हिन्‍दी और देवनागरी में सिक्‍के ढलवाये थे। जोकि इस बात के प्रमाण हैं कि आज से ही नहीं अपितु बहुत पहले से ही देवनागरी लिपि राष्‍ट्र की एकता के लिए सम्‍पर्क लिपि का कार्य कर रही है।

एक सम्‍पर्क लिपि के अभाव ने हमें व हमारे देशवासियों को अपने ही देश में परस्‍पर अजनबी सा बना दिया है। हम एक दूसरे को समझ ही नहीं पा रहे हैं, बल्‍कि भाषा व लिपियों केमहादेश इस पावन देश में भावनात्‍मक एकता को हानि पहुंचा रहे हैं। इसलिये आवश्‍यकता इस बात की है कि जब भाषात्‍मक , सामीप्‍य, सद्‌भाव तथा एकता का प्रबलस्रोत लिपि का साम्‍य ही होता है तो हम भारत की सम्‍पर्क लिपि के रूप में केवल देवनागरी को ही क्‍यों न अपनाएं। जिसे कि भारतीय लिपि संस्‍था ने हमारी सभी भारतीय लिपियों के समन्‍वय पूर्वक पठनपाठन, मुद्रण, टंकण, टेलीप्रिटिंग, संगणक आदि के लिए अपेक्षाकृत सरलभाषा सम्‍मत, रोमन लिपि तुल्‍य, यन्‍त्रोपयोगी तथा अत्‍यन्‍त अल्‍पव्‍यय साध्‍य के रूप में प्रस्‍तुत किया है।

निष्‍कर्षतः कहा जा सकता है कि भारत की एकता, अखण्‍डता की अक्षुण्‍यता व संस्‍कृति साहित्‍य की समृद्धि के लिये यदि किसी लिपि का नाम लिया जा सकता है तो वह देवनागरी ही है और जिसे उसका गौरव, सम्‍मान अविलम्‍ब मिलना ही चाहिए।

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