बुधवार, 19 सितंबर 2012

मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ

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दूरी

इस शहर की दूरी

तेरे घर से बहुत दूर है

जब चिरागों में नूर आयेगा

जब सितारों की रौशनी होगी

मैं तेरी याद में आंसू बहाऊंगा

बात जब भी तेरे जलवों की होगी

मेरा दिल बेताब हो जाएगा

सुन कर तेरे जलवों की तारीफ़

मैं और भी तन्हा हो जाऊँगा

इश्क करने की गर यही

सजा है तो यही सही

मैं तुझे याद करता हूँ करता रहूँगा

मैं मरते मरते भी प्यार करता रहूँगा

 

सहमा शहर

सहम कर शहर ने खुद ही

ओढ़ लिया है कफन ,

रात की खामोशी में कहीं

कोई मुर्दा ना जाग जाये !

सन्नाटे भी आवाज करते हैं

जो बोल सकते हैं वो खामोश हैं

क्या तूफ़ान का करेंगे सामना

जो खामोशी से डरते हैं

हम कहाँ कोई जंग लड़ते हैं

हाथो में ताकत है फिर भी

मरने से हर वक्त डरते हैं

जीने से पहले सौ बार मरते हैं

 

आड़ी-टेढ़ी रेखाएँ

कागज की हथेली पर

खिंच कर कुछ आड़ी-टेढ़ी रेखाएँ

भर दो उस के खाली पन को

कुछ ना सही, कुछ तो है

अक्षर ना बन पाये तो क्या

गीत ना लिख पाये तो क्या

जीवन भर साथ निभाएगी

ये आड़ी-टेढ़ी रेखाएँ

आँखें जब धुंधली होंगी

कमर जब झुकी होगी

हाथों में जब कम्पन होगी

तब भी खिंच जाएंगी

ये आडी-टेढ़ी रेखाएँ

जब जीवन की शाम होगी

बिखरे-बिखरे सब पल होगें 

पास ना कोई और रहेगा 

तब भी याद रहेंगी 

ये आडी-टेढ़ी रेखाएँ

कागज की हथेली पर

खेंच कर कुछ रेखाएँ

 

कहाँ खो गये 

जुदा तुम हम से  हो गये हो

खो गये हो तुम

अब लोट आओ

ये शहर बुलाता है

तकती है राहें

बूढ़ी आँखें

सिने से लगा कर

ममता की प्यास

बुझाने को

घर की दीवारें भी

सुनी-सुनी है

तेरे हाथों से सजने को

फिजाओं में भी

तेरी कमी सी है

सहमा-सहमा  सा ये मौसम भी है

जुदा तू हम से हो गया है

खो गये हो तुम  

 

प्यासे

वो सागर पीकर भी प्यासे ही रहे

मैं एक बूंद से गला तर करती गयी

वो गर्म लम्हों को सहलाते रहे

मैं हवा दे दे  कर सुलगाती गयी

वो सर्द रातों में ठिठुरते रहे

मैं जिस्म के शोले भड़काती रही

वो मुद्दत लगाते थे पास आने में

मैं हर पल उन के आगोश में समाती रही

वो बहुत सोचते थे अपनी कहने मैं

मैं हर पल अपनी सुनती रही

वो यूँ दूर चले गये जैसे कभी मिले ही नहीं

मैं फिर भी जाने क्यों उनके पास रही

 

जज्बा

उलझी हुई है जिन्दगी फिर भी

झिलमिलाती सी है

मुहब्बत का जज्बा

सलामत रहे ,

किसी मोड़ पर जाकर 

बिखर जाये तो भी गम नहीं 

इश्क हुआ है 

ये भी कोई कम नहीं 

वो मिल कर बिछड़ जाये 

तो भी गम नहीं 

वो मिले मुहब्बत से 

ये भी तो कम नहीं 

याद वो मुझ को करते रहे 

कुछ भी ना समझ कर 

जेहन में उन के मेरी 

तस्वीर रहे  याद बनकर

यह भी कम नहीं

 

कतरे

कुछ शबनमी कतरे रोज आकर 

यूँ बरसते है मुझ पर

मुझ उन से मिलने की

आदत सी हो गयी

वो रोज ही की बात हो गयी

आदत में शुमार हो गयी

सुबह की किरणों सी

वो जिस्म के आर-पार हो गयी

मैं सहम जाता हूँ कभी

वो बिखर जाए ना कहीं  

उन की ख़ुशी मेरी सौगात हो गयी

वो पाक दामन रहे

जिन्दगी उनकी सलामत रहे

छुड़ा कर दामन मुझ से

दूर जाये ना कभी

उनके साथ की मुझे आदत सी हो गयी

वो यूँ ही मुस्काती रहे

ओस की बूंदों सी

मेरी बाँहों में समाकर

जिन्दगी की नेमत सी

कुछ---------------------------

 

रात

हर रात सो जाती थी मैं

रंगीन चादर ओढ़ कर !

एक रात उठा कर रख दी

सफेद चादर ओढ़ने के लिए !

***************************** 

यूँ तो मेरी झोली खाली थी

अंजुली भर दुआओं से

खुशियों से दामन भर गया

******************************** 

एक किताब पढ़ कर

सिरहाने रख दी

एक शाम यूँ ही

इबादत कर के रख दी

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