हेमंत कुमार शर्मा की कविता - अपनी अपनी कमियाँ

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

image

किस किस में निकालें कमियाँ,
किस किस को हराम कहें |
लालच भरा निगाहों में सबकी
किस मुंह से इन्हें राम राम कहें ||

ना कोई किसी का साथी,
ना पथ-प्रदर्शक है |
स्वार्थ भरा विचारों में सबके,
सब बने मूक-दर्शक हैं ||

जिएगा वही जो गूंगा बहरा है,
सत्यवादी के सिर तो बंधा मौत का सहरा है  |
दो कदम चले नहीं, कि थककर चूर हो गए ,
जिन्दगी का रिश्ता माया से कुछ गहरा है ||

चीत्कार- पुकार सुनो,
लगता है कही कोई  इन्सान रो रहा |
आँख मलो ध्यान से देखो,
शायद अपना ही हिन्दोस्तान रो रहा ||

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "हेमंत कुमार शर्मा की कविता - अपनी अपनी कमियाँ"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.