सोमवार, 17 सितंबर 2012

हेमंत कुमार शर्मा की कविता - अपनी अपनी कमियाँ

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किस किस में निकालें कमियाँ,
किस किस को हराम कहें |
लालच भरा निगाहों में सबकी
किस मुंह से इन्हें राम राम कहें ||

ना कोई किसी का साथी,
ना पथ-प्रदर्शक है |
स्वार्थ भरा विचारों में सबके,
सब बने मूक-दर्शक हैं ||

जिएगा वही जो गूंगा बहरा है,
सत्यवादी के सिर तो बंधा मौत का सहरा है  |
दो कदम चले नहीं, कि थककर चूर हो गए ,
जिन्दगी का रिश्ता माया से कुछ गहरा है ||

चीत्कार- पुकार सुनो,
लगता है कही कोई  इन्सान रो रहा |
आँख मलो ध्यान से देखो,
शायद अपना ही हिन्दोस्तान रो रहा ||

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