शनिवार, 8 सितंबर 2012

नन्द लाल भारती की कविताएँ

जी भर रहा है .
फिर आँखे रो उठी
दिल तड़प उठा
उसको देखकर
आँखों में उसकी
के दीदार थे
दिल में दहकते साक्षात्कार थे
आँखे लबालब थी
किनारे मज़बूत थे
पेट से जैसे
अंतड़ियां गायब थी
कमर और घुटने बेबस
लग रहे थे
हाथ एकदम तंग था
संघर्षरत मौन बयान
दे गया था
बूढ़ी सामाजिक कुव्यवस्था से
टूट चुका था
दोयम दर्जे का आदमी
कोई और नहीं
हाशिये का आदमी  मूलनिवासी
शोषित उपेक्षित भूमिहीन खेतिहर मजदूर था
आज भी है ,
अफ़सोस कोई खैरियत
जानने वाला नहीं
दमन, जातीय कुचक्र,भय- भूख
भेद भाव से भयभीत
शोषित आदमी बस जी भर रहा है ...

हाशिये के लोग
करोडों अरबों में खेलने वालों
किलेनुमा महलों में रहने वालों
मेरे गांव चलोगे क्या .................?
जहाँ कुएं का पानी आज भी
अपवित्र है
पसरी है गरीबी,अशिक्षा और
जातीय भेद भी ........
गाँव के मेहनतकश
कमेरी दुनिया के मालिक
हाशिये के लोग
फांका में भी  रात काट लेते हैं
नीम की छांव बेख़ौफ़
भर नींद सो लेते हैं
तरक्की  की बाट जोहते हुए .......
सामाजिक आर्थिक सम्पन्नता
आज तक  नहीं पहुंची है
वंचितों की चौखट तक
क्यों नहीं पहुँच है
धर्म और राजनीति के ठेकेदार
जानते हैं अच्छी तरह
अब तो सुन लो
हाशिये की आवाज़
गूँज रही है हाहाकार
कब तक रहेंगे
हाशिये के लोग
अछूत गरीब तरक्की से दूर
और लाचार....

नन्द लाल भारती .......०३.०९.२०१२

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