अमरीक सिंह कंडा की लघुकथाएँ - सोच का गतिरोध व जुड़वाँ

कंडे का कंडा

 

सोच का गतिरोध

‘‘पांच नम्बर वाली के साथ कौन है?’’ नर्स ने पूछा।
‘‘मैं हूं पांच नम्बर वाली के साथ, क्या हुआ बहू को?’’ एक 50-55 वर्ष की औरत ने पूछा।
‘‘लड़की हुई है मां जी।’’ नर्स ने कहा
इतनी बात सुनते ही सास बेहोश होकर फर्श पर गिर पड़ी। जल्दी-जल्दी नर्सों ने उसे उठाया और लेडी डाक्टर को आवाज लगाई। लेडी डाक्टर ने पूछा,‘‘ यह महिला कौन है? यह किसके साथ आई है?’’
‘‘मैडम यह पांच नम्बर वाली पेशेंट के साथ है।’’ नर्स ने कहा।
‘‘अच्छा जिसके लड़का हुआ है?’’ लेडी डाक्टर ने पूछा।
इतना कहने की देर थी कि सास उठ कर खड़ी हो गई। नर्सें मन ही मन हंस रही थीं।
‘‘मां जी पोते की बधाई हो।’’ लेडी डाक्टर ने कहा।
‘‘बधाई जी, बधाई। आपकी नर्सें तो कहती थीं लड़की हुई है। पागलों ने मेरी तो जान ही निकाल दी थी। इस तरह के मजाक नहीं करते।’’ सास बोली थी।
 

जुड़़वाँ

‘‘पहले ही दो लड़कियाँ हो चुकी हैं, फिर उलटी कर रही हो। चलो मेरे साथ अस्पताल डाक्टर को दिखा कर आते हैं। यदि लड़की हुई तो कोई जरूरत नहीं, समझी कि नहीं?’’ सास ने डराते तथा समझाते हुए अपनी बहू से कहा।
‘‘बधाई हो जी, दो बच्चे हैं एक लड़का तथा एक लड़की। थोड़ा ध्यान रखना पड़ेगा।’’ डाक्टर ने स्कैन करने के बाद बताया।
‘‘आपको भी बधाई डाक्टर साहब। चल बेटी घर चलें। सीढ़ियाँ ध्यान से उतरना। भगवान का लाख-लाख शुक्र है।’’ सास ने एक ही सांस में कहा।
बहू भी मन ही मन आने वाले लड़के का धन्यवाद कर रही थी कि उसने उसकी बेटी तथा अपनी बहन की जान बचा ली थी।















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