सोमवार, 17 सितंबर 2012

मनोज कुमार पाठक की लघुकथाएं - बदलाव तथा खर्चे का पेंच

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बदलाव

शारदा बाबू स्कूल शिक्षक थे। पटमदा , झारखण्ड की सबसे बड़ी पर्वत माला दलमा का तराई क्षेत्र है। कृषि ही एकमात्र जीविका का साधन है। शारदा बाबू भी पटमदा के कृषक-पुत्र थे। किसी तरह बी.ए., एम.ए. पास किया। ट्रेनिंग के बाद पटमदा से दूर जमशेदपुर में नौकरी लगी। अक्सर वे शनिवार को गाँव जाया करते थे। अमूमन साइकिल से ही वे आवाजाही करते थे। बात अस्सी के दशक की है।

माघ महीना था। गाँव में 'माघेर बारह' (माघ महीने की बारह तारीख ) पर्व था। शारदा बाबू शाम को साइकिल से गाँव के लिए निकले। मन में उल्लास कि गाँव जाकर मेले का आनंद लेना है।

डिमना पार करते ही 'सात नाला' का रास्ते से वे आगे बढ़ते रहे। चारों तरफ घना जंगल-- बन्दर,भालू,खरगोश,हाथी आदि के अनायास दर्शन। सूरज ढलने को था। शारदा बाबू के मन में भय संचारित होने लगा। वे किसी तरह घनी झाड़ों में से निकलती रास्ते पर साइकिल से चलते रहे। अचानक 'बड़ तल' (एक स्थान जहाँ वट वृक्ष के नीचे कुछ दुकानें थीं ) के पास कुछ युवकों ने शारदा बाबू को रोका। उन लोगों ने चेहरे को ढंक रखा था। एक ने कहा-- ''कहाँ जायेंगे इस अँधेरे में? यहाँ हाजरी तो मार जाईये।''

शारदा बाबू अपने पेशे में ईमानदार और उनको सिर्फ अपने विद्यालय में हाजरी मारने की बात पता थी, पर यहाँ वो हाजरी की बात सुनकर दंग रह गए। उनको चाणक्य की एक नीति याद आयी की कोई विपत्ति आये तो चार गुनी शक्ति से उसका सामना करना चाहिए। उन्होंने झट जवाब दिया -- ''गाँव जायेंगे''|

उन युवकों ने शारदा बाबू से साइकिल और पैसे छीनने की कोशिश की और इसी क्रम में शारदा बाबू की टोपी सर से गिर गयी। उन्ही लोगों में से एक ने शारदा बाबू को पहचाना और पैर पकड़ कर रोने लगा। उन लोगों ने सवाल-जवाब शुरू किया तो पता चला कि वे एक शिक्षक हैं और उसी इलाके के हैं।

रोते हुए युवक से शारदा बाबू ने रोने का कारण पूछा तो स्पष्ट हुआ कि वह उनसे बोडाम हाई स्कूल में पढ़ चूका है। अपने शिक्षक को लूटने की कोशिश करने पर उसे बहुत अफ़सोस हुआ। शारदा बाबू ने उन युवकों से पूछा -- ''बाबू, तुम लोग ऐसा क्यों करते हो?'' उन लोगों ने सहम कर जवाब दिया-- '' पैसे के लिए|'' शारदा बाबू ने उन्हें समझाया और कहा --'' तुम लोग क्यों नहीं अपने माँ-बाप को खेती में हाथ बँटाते ? अपनी जमीन से जुड़े रहने का सौभाग्य सभी को नहीं मिलता।'' उन्होंने उन युवकों को पैसा कमाने के लिए जल्द-बाजी न करने की नसीहत भी दी। सारे युवकों ने अपने पुराने शिक्षक का पैर पकड़ कर माफ़ी मांगी और अपने पैत्रिक वृत्ति के साथ जुड़े रहने का शपथ ली। उन लोगों ने शारदा बाबू को उनके गाँव तक छोड़ा। शारदा बाबू ने आशीर्वाद स्वरुप पचास रुपये दिए।

अगले वर्ष 'पोइला वैशाख' (वैशाख महीने की पहली तारीख ) के दिन शारदा बाबू अपने गाँव के तालाब से स्नान कर के लौट रहे थे तो रास्ते में चार युवक नए धोती-कुर्ता लिए खड़े थे। उन लोगों ने प्रणाम करते हुए कहा-- '' मास्टर साहब , ये हमारी पहली कमाई की भेंट है।''

शारदा बाबू पहचान गए और चारों से गले लग गए।

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खर्चे का पेंच

रमाकांत जी अपने ज़माने के पढ़े-लिखे नौजवान थे। विश्वविद्यालय में अध्यापन की नौकरी मिल गयी थी। तीन संतानों के पिता-- दो पुत्र, एक पुत्री। जीवन भर अनुशासित रहे। बच्चों की पढाई-लिखाई पर काफी ध्यान दिया। दोनों पुत्र उच्च शिक्षा प्राप्त कर नौकरी करने लगे।

समय चलता रहा। रमा जी ने नौकरी से अवकाश प्राप्त किया और चैन से अपने लड़कों के साथ रहने लगे। उनकी शादी भी हो गयी थी। कोई उनसे घर-गृहस्थी के सम्बन्ध में पूछे तो वे अपने परिवार का उदाहरण देने से नहीं चूकते थे। पंद्रह वर्ष और बीत गए, घर पर ही बैठे हुए। उम्र तो रूकती नहीं। उसका असर स्वास्थ्य पर भी होता है। घर के खर्च बढ़ने लगे। अस्वस्थता भी घर करने लगी। दोनों पुत्र पेशे में व्यस्त। बहुएं नाक-भौं सिकोड़ने लगी। रमा जी द्विविधा में थे; अतीत की सुखमय स्मृतिओं और वर्तमान के दुखद यथार्थ के बीच हिचकोले खाते रहे।

वे इस परिवर्तन को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। अकुलाहट बढ़ती गयी।

उन्होंने अपने बड़े बेटे से कहा-- ' राजू, रतन की तो आमदनी कम है, तुम ही मेरा ख्याल रखा करो।'

राजू ने जवाब दिया-- ' पापाजी मेरे भी तो खर्च हैं।'

रमा जी सोचने लगे कि कैसे उन्होंने अपनी आमदनी से सारे खर्चों कब बावजूद अपने लड़कों को पढाया-लिखाया, हर जरुरत का ध्यान रखा। कभी भर महसूस नहीं किया। रतन से मिलकर बातें की।

रतन ने कहा -- ' बाबूजी, रत्ना बाहर पढाई कर रही है। खर्च बढ़ रहे हैं। और, रश्मि का भी तो अब स्कूल में दाखिला करवाना होगा।

रमाजी अपनी संतानों के खर्च के हिसाबों के बीच असमंजस की स्थिति में रहे। अपनी ईमानदारी का फल भी ऐसा मिला कि उनकी पेंशन रोक दी गयी थी, किसी विभागीय झमेले के कारण। उन्हीं परेशानियों में उनका आगे का आखिरी वक़्त बीता। फिर एक दिन चल बसे।

अख़बार में खबर छपी -- ' आदर्श अध्यापक श्री रमाकांत जी अब हमारे बीच नहीं रहे। वे अपने पीछे अपने दो कर्मठ पुत्र, एक पुत्री, पुत्र-बधुयें समेत सुखी, समृद्ध, भरा- पूरा परिवार छोड़ गए हैं।'

 

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(कथाकार बहु भाषीय  युवा साहित्यकार हैं )

पता-- इच्छापुर, ग्वालापारा
        पोस्ट- आर.आई.टी.
        आदित्यपुर-२
        जमशेदपुर-१४
फोन--०९९७३६८०१४६
mkp4ujsr@gmail.com

1 blogger-facebook:

  1. TRILOKI NATH TIWARY8:29 pm

    AAPKI YE DONO RACHNAAYEN PRERNA SHROT HAIN.
    BADLAAW se jeevan parivartan ki prerna mili , to wahi KHARCHE KA PENCH ye bataane ki koshish karta hai ki Maanaw ko apne liye khud sochna chahiye,sbkhchh nahi de dena chahiye,chaahe wo Putra hi kyun na ho?

    उत्तर देंहटाएं

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