गुरुवार, 27 सितंबर 2012

विनोद कुमार कंवरिया ‘अकेला’ की कविता - अल्फ़ाज

image

अल्फ़ाज़

चंद मर्म हों बयां चंद अल्फ़ाज़ हों

शब्द फूटें नहीं पर सफ़ा साज हो

 

सुर लहरी भी हो ओ’ इक आवाज़ हो

लफ़्ज़ महफ़िल में फ़िर मेरे आज हों

 

फ़िर मुझ पर ही फ़िर मुझे नाज हो

शब्द सूझे नहीं कुछ यूं लाज हो

 

चौखट का सज़्दा ये सर नवाज़ हो

मन को रोकूँ कहाँ जो परवाज़ हो

 

मुड़के देखूँ किसे उम्र जब दराज़ हो

हश्र होगा वही चाहे नाराज़ हों

 

नींद आती नहीं जाने क्या राज हो

बयां करने को काश अल्फ़ाज़ हों

--

विनोद कुमार कंवरिया ‘अकेला’

शिक्षा संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय,

दिल्ली – 110007.

मोबाइल: 9810086033

ई-मेल: vinodpr111@gmail.com

--

(चित्र - दुर्गाबाई की कलाकृति)

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------