शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

बलबीर राणा की कविताएं

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रूद्र रूप

रूद्र तेरे रूप ने कल के

हंसते खेलते जीवन को

आज !!!!!

शोकसंतप्त बिरानी में बदल दिया।

गिद्धों का अकाट्य जमावड़ा ।

हाहाकार मचाता

क्रूर………… क्रन्दन ।

अपराधी बनी विधाता

निठल्ली मूक खड़ी है ।

अश्रु भरे चेहरों को

आक्रोशित नजरों से घूर रही है ।

प्रकृति तेरे धूर्त अकर्मण्य कर्म ने

चहकते चमन,

महकते आंगन को

रिसता रगड बना बना दिया ।

जहाँ अब जीवन के अवशेष

मिटटी गारों के साथ पुल-पुल करते बह रहे।

रात झींगुरों का सुर,

दुखी दिलों को चीर रहा ।

अरे !

यह सन्ताप !!!!

निर्दोशों को क्यों दे गया?

ऐ प्रकृति तेरे रूद्र रूप से

भ्रष्टाचार रथ के सारथी आने वाले हैं ।

त्रासदी भरे मातम में अपना रथ चलाने वाले है ।

तेरे कर्म पर राज रोटी सेंकने वाले हैं ।

कुछ राहत के छींटे मार ………. मानवता की इतिश्री करने वाले हैं ।

दुखियों के नाम खुद का घर भरने वाले हैं।

तू ही बता

किस रूद्र रूप का सामना करें ?

तेरे या खुद के ......

(रगड = भूस्खलन के बाद की जमीन, पुल-पुल = आहिस्ता खसकती जमीन, गारे = छोटे कंकड़ पत्थर)

--

पिंजरे में कैद

पिंजरे में कैद जीवन

हाँ यहाँ कैद रहती

उसकी दुनिया उसका संसार

यहां उसके

विचार कैद

भावनाएं कैद

कुन्द होता विवेक

कर्मों के इस कारागार में

मन का पंछी

पंख फड़फड़ाता

वो उड़ना चाहता

आजाद विचारों की अभिव्यक्ति के साथ

बखान करना चाहता

मन के उद्गारों को

पूरा करना चाहता

दिल के अरमानों को

लेकिन क्या ??

इसके आदर्श और आदेशों की बेड़ियां

इजाजत देगी ?

आदेश उच्चस्थ के

दंभ के

अहम के

आदर्श संस्था के

मान के

सम्मान के

देश के स्वाभिमान के

लेकिन !!!

कौन समझेगा?

इस मूक पशु की वेदना को

हाँ मूक पशु ही है

जो रक्षित करता

देश की आन को

बान को

शान को

यहां हांकी जाती उसकी इच्छाएं

थोपी जाती बेबाक वर्जनायें

उसके सच्चे जीवन की आजादी

इस खुले कारागार के नियमों का

हर हाल में पालन करना

यही अज्ञाकारी जिजीविषा से वह

अलौलिक मनुष्य योनि के सच्चे

उपभोग से वंचित रखता

--

मेरा परिचय

मेरा जन्म उत्तराखण्ड में जिला चमोली मल्ला दशोली पटटी के ग्राम मटई बैराशकुण्ड क्षेत्र में हुआ। बचपन पहाड़ी सीडी नुमा खेतों में कूदते फांदते गाय बकरियों के पीछे भागते बीता। मन के एक कोने में आंशिक सन्तोष तो है कि देश का प्रहरी होने के नाते किसी एक रूप में ये जीवन देश के लिए समर्पित है फिर भी मेरा “अडिग शब्दों का पहराhttp://balbirrana.blogspot.com/ कागज के पन्नों से बाहर आकर मानव मूल्यों की अडिगता बनाये रखने में जन मानस के काम आ सके तो इसी को जीवन में परमार्थ समझूंगा और पूर्ण उपलब्धि, संचय व सन्तोष।

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