बुधवार, 26 सितंबर 2012

बच्चन पाठक 'सलिल' की दो कविताएं

मिट्टी का पुत्र

-- डॉ. बच्चन पाठक 'सलिल'

मैं गमले में नहीं उगा हूँ
किसी वाद के
नहीं किसी माली की सेवा मैंने ली है
मैं बबूल हूँ, छोटी पत्ती, काँटों वाला
जीवन क्रम में अपनी राह बनाई मैंने।
मुझे नहीं सौभाग्य मिला कि मेरे आवाहन पर
रजत रश्मियाँ तोड़ कुहासा फूट पड़े
तप्त धरा हो शांत, मरुस्थल शाद्वल हो
शीतल मलय बयार चले।
मैं मिट्टी का पुत्र, सदा साथ दो बाहें अपनी
अपने बल पर अब तक हूँ चलता आया
कुछ हैं ऐसे कलाकार जो सपनों की खेती करते हैं
इस धरती से कटे हुए वे
मुझे न उनसे तनिक द्वेष है
जो अपने से निर्वासित हो
करुणा-पात्र बने फिरते हैं
पर यह मेरी रही मान्यता
जो कुछ है, वह मिट्टी में है
और कल्पना का वह नंदन कानन
चाहे जितना भी सुन्दर हो
पर मुझको यह ऊबड़ खाबड़
धरती ही प्यारी लगती है।

जब चाहो तुम मुझे बजाना

हे जग के सिरजनहार सुनो
मैं अंश, तुम्हीं हो अंशी
मुझे बना ले आप दयामय
केवल अपनी वंशी।
छिद्र युक्त खोखला तना
उस क्षुद्र वंश की जाया
पाकर तेरा स्पर्श बनी
वह भुवन-मोहिनी माया।
जब चाहो तुम मुझे बजाना
हो जाए रस - वृष्टि
मुझे तोष हो कि मैं करता
स्वयं सुधा की सृष्टि


पता- जमशेदपुर
फोन-- ०६५७/२३७0८९२

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