प्रमोद कुमार सतीश की कविता - हकीकत-ए-जिन्दगी

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

हकीकत--जिन्दगी

बेरंग जिन्दगी बेनूर जिन्दगी

कैसे बनती है कोहिनूर जिन्दगी

अकड़कर चलती है, ठोकर मारती है

कमबख्त बेरहम, मगरुर जिन्दगी

तन्हाइयों से दामन भरती है जिन्दगी

बर्बाद-ए-गुलिस्तां करती है जिन्दगी

न मंजिल ही बताती है, न रास्ता यारों

घुट-घुटकर मारती, मरती है जिन्दगी

तमाम उलझनों में फँसाती है जिन्दगी

रिश्तों की डोर से नचाती है जिन्दगी

बिछड़ जाते हैं जब सारे हमसफर

तब राज-ए-हकीकत बताती है जिन्दगी

प्रमोद कुमार सतीश

.नं. 109/1 तालपुरा झांसी

ईमेल-- kumar.pramod547@gmail.com

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "प्रमोद कुमार सतीश की कविता - हकीकत-ए-जिन्दगी"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.