मंगलवार, 11 सितंबर 2012

श्याम गुप्त के पद

प्रेम है जग जीवन का सार।

कहें श्याम सुन सखा, प्रेम ही संसृत का आधार।

प्रीतिभाव-रत गोप-गोपिका, करें नित्य व्यापार।

मम वियोग विरहानल तन-मन, दीन्हे कर्म बिसार।

अज्ञानी जन ब्रज रज जनमे, डूबे  प्रेम अपार।

सखा जाहु गोकुल नगरी कों, अति आभार तुम्हार।

निर्गुण ब्रह्म ज्ञान कौ ऊधो, दीजो तत्व-विचार।

विरह-वेदना तन-मन छूटे, भूलें  राग, विकार।

निर्गुण-ब्रह्म को भजें त्याग गुन, श्याम’ प्रीति-व्यवहार।।

 


ऊधो ! ब्रह्म ब्रह्म क्या गावै।

जो हम तुम सब एक ब्रह्म को काकौं योग बतावै।

ब्रह्म, ब्रहम को क्या उपदेशे काकौं ज्ञान सिखावै।

ये कान्हा की प्रेम नगरिया प्रेम ही ब्रह्म कहावै।

योग-गठरिया विरह-अगन ते ऊधो खसकि न जावै।

संदेसौ तुम ज्ञान कौ लाये मन कौ भरम न जावै।

निरगुन निरगुन कहत फिरौ पर ज्ञान कौ गुन भावै।

श्याम’ प्रेम ही ब्रह्म,ज्ञान,सत,निरगुन,सगुन कहावै।।

 
ब्रज की भूमि भई है निहाल।

सुर गन्धर्व अप्सरा गावें नाचें दे दे ताल।

जसुमति द्वारे बजे बधायो, ढफ ढफली खडताल।

पुरजन परिजन हर्ष मनावें जनम लियो नंदलाल।

आशिष देंय विष्णु शिव् ब्रह्मा, मुसुकावैं गोपाल।

बाजहिं ढोल मृदंग मंजीरा नाचहिं ब्रज के बाल।

गोप गोपिका करें आरती,  झूमि  बजावैं  थाल।

आनंद-कन्द प्रकट भये ब्रज में विरज भये ब्रज-ग्वाल।

सुर दुर्लभ छवि निरखे लखि-छकि श्याम’ हू भये निहाल।।

 

जनमु लियो वृषभानु लली।

आदि-शक्ति प्रकटी बरसाने, सुरभित सुरभि चली।

जलज-चक्र रवि-तनया विलसति, सुलसित लसति भली।

पंकज-दल सम खिलि-खिलि सोहे, कुसुमित कंज अली।

पलकन पुट-पट मुंदे श्याम’ लखि मैया नेह छली।

विहंसनि लागि गोद कीरति दा, दमकति कुंद कली।

नित नित चंद्रकला सम बाढ़हि, कोमल अंग् ढली।

बरसाने की  लाड  लड़ैती,  लाड़न  लाड़   पली।।

 

 

कन्हैया उझकि उझकि निरखे।

स्वर्ण खचित पलना चित-चितवत केहि विधि प्रिय दरसै।

जहँ पौढ़ी वृषभानु लली, प्रभु दरसन कौं तरसै।

पलक पांवड़े मुंदे सखी के, नैन कमल थरकैं।

कलिका सम्पुट बंध्यो भ्रमर ज्यों, फर फर फर फरके।

तीन  लोक दरसन कौं तरसें,  सो दरसन तरसै।

ये तो नैना बंद किये हैं,  कान्हा  बैननि परखे।

अचरज एक भयो ताही छिन,  बरसानौ सरसे।

खोली दिए दृग भानुलली,मिलि नैन, नैन हरषे।

दृष्टिहीन माया, लखि दृष्टा, दृष्टि खोलि निरखे।

बिन दृष्टा के दर्श श्याम, कब जगत दीठ बरसै।।

 

 

कान्हा तेरी वंसी मन तरसाए।

कण कण ज्ञान का अमृत बरसे, तन मन सरसाये।

ज्योति दीप मन होय प्रकाशित, तन जगमग कर जाए।

तीन लोक में गूंजे यह ध्वनि,  देव दनुज मुसकाये।

पत्ता-पत्ता, कलि-कलि झूमे, पुष्प-पुष्प खिल जाए।

नर-नारी की बात कहूँ क्या, सागर उफना जाए।

बैरन छेड़े तान अजानी , मोहनि  मन्त्र चलाये।

राखहु श्याम’ मोरी मर्यादा, मुरली मन भरमाये।।


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-डॉ. श्याम गुप्त, के-३४८, आशियाना, लखनऊ -२२६०१२

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