शनिवार, 8 सितंबर 2012

प्रमोद कुमार सतीश की कविता - हकीकत-ए-जिन्दगी

हकीकत--जिन्दगी

बेरंग जिन्दगी बेनूर जिन्दगी

कैसे बनती है कोहिनूर जिन्दगी

 

अकड़कर चलती है, ठोकर मारती है

कमबख्त बेरहम, मगरूर जिन्दगी

 

तन्हाइयों से दामन भरती है जिन्दगी

बर्बाद-ए-गुलस्तां करती है जिन्दगी

 

न मंजिल ही बताती है, न रास्ता यारों

घुट-घुटकर मारती, मरती है जिन्दगी

 

तमाम उलझनों में फंसाती है जिन्दगी

रिश्तों की डोर से नचाती है जिन्दगी

 

बिछड़ जाते हैं जब सारे हमसफर

तब राज-ए-हकीकत बताती है जिन्दगी

-

प्रमोद कुमार सतीश

.नं. 109/1 तालपुरा झांसी

ईमेल-- kumar.pramod547@gmail.com

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