सोमवार, 17 सितंबर 2012

डाक्टर चंद जैन 'अंकुर' की कविता - ईश्वर के नैनों से नीर बह रहा है


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ईश्वर के नैनों से नीर बह रहा है

ईश्वर के नैनों से नीर बह रहा
नारायण ग़मगीन देखो क्षीर बह रहा है,
मातृभू पुकारती है अपने शिव धाम को,
प्राण का प्रसार दे सच्चों   में राम को,
दानवों से मातृ  भू मानव भयक्रांत है,
सत्ता बीमार है देश जल रहा है,

ईश्वर के नैनों से नीर बह रहा है ,
नारायण ग़मगीन देखो क्षीर बह रहा है,

सत्ता के मंच में आज कौन सच्चा है,
दिल्ली के कुर्सी पे बैठा क्या बच्चा है,
कौरव कानून का चीर ह़र रहा है,
संसद के  अस्त्रों से नीति मर रहा है,

ईश्वर के नैनों से नीर बह रहा
नारायण ग़मगीन देखो क्षीर बह रहा है,

गाँधी की टोपी में किसका ये चेहरा है,
खादी के वस्त्रों में दानव का पहरा है,
लोकपाल दर्पण में साफ़ दिख रहा है,
नेताओं का चरित्र रोज़ बिक रहा है,

ईश्वर के नैनों से नीर बह रहा
नारायण ग़मगीन देखो क्षीर बह रहा है,

तेरे स्विस बैंक दौलत का घड़ा भर गया है,
रक्तबीज याद कर अपने इतिहास को,
माँ का  भी रूप विकराल हो गया  है,
अब तेरे मौत का द्वार खुल रहा   है,

ईश्वर के नैनों से नीर बह रहा
नारायण ग़मगीन देखो क्षीर बह रहा है,

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