सोमवार, 17 सितंबर 2012

विनय कुमार सिंह की कविता - प्यारी चुनियां

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प्यारी चुनियां

डाल-डाल से उसकी दोस्‍ती,

पत्‍त-पत्‍ता उसका आशियाना,

दिन दोपहर थी उसमें फूर्ति,

रात होते ही आयी सुस्‍ती,

हुई भोर तो खो गई मस्‍ती,

आंखों में था अजीब सा डर,

दिल ढूंढ़े कहाँ खो गई कश्ती,

डाल-डाल से उसकी दोस्‍ती,

पत्‍ता-पत्‍ता उसका आशियाना,

निकला सूरज फूटीं किरणें,

धूपमग्‍न हुई सारी धरती,

डाल-डाल पर जायें नजरें ,

दिल पूछे वों क्‍यों नहीं निकली?

 

बार-बार मन ढ़ूंढे़ तुझको,

किससे खैर पूछूं तेरी,

तू ही तो है एक मेरी,

मिलने में फिर क्‍यों देरी?

दोपहर हो गई, सुबह चली गई,

दिखी न तेरी उछला-कूदी,

क्‍या तुझे मिला कोई नया बसेरा?

 

जो तूने यहां पग न फेरा,

राह चलते यही सोच रहा था,

कि पैरों को एक आहट पहुंची,

नजर गई तो रूक कर देखा,

खून से लथपथ चुनियां पड़ी,

चुनियां थी वो प्‍यारी गिलहरी,

फुरसत में इक रोज मिली,

कैसे कहूं क्‍या खोया मैंने,

पाकर जिसे जिन्‍दगी जी ली

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विनय कुमार सिंह

ग्राम- कबिलास पुर

प्रोस्‍ट - कबिलास पुर

जिला - कैमूर भभुआ

बिहार -821105

vinaymedia.pratap11@gmail.com

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