रामवृक्ष सिंह की हिंदी दिवस विशेष कवित्त-सवैया : राजभाषा हिंदी

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राजभाषा हिंदी


(1)

प्राकृतों से पाए प्राण, देह अपभ्रंश से।
शब्दन की निधि संस्कीरत से पाई है।।
अरबी औ तुरकी औ फारसी के संग रही।
उरदू कहीं तो कहीं हिन्दी कहलाई है।।
रूसी औ ईरानी अंगरेजी की सहोदरा है।
इंडो-यूरो वंश की परंपरा निभाई है।।
स्वर अरु व्यंजन निबद्ध भली भाँति जहाँ।
ब्राहमी से नागरी की लिपि अपनाई है।।

(2)
सिद्ध-नाथ-संतन से पाए दोहे-सोरठे हैं।
भगत जनों से ब्रज बोली पद पाए है।।
इसमें ही रचे गए रासो-से महान ग्रंथ।
इसमें ही सूर ने कान्हा के गुण गाए हैं।।
खुसरो-कबीर, दादू, मंझन अरु जायसी ने।
इसी के मधुर बन्द छन्द अपनाए हैं।।
राम की कथाएं कहीं श्याम की लीलाएँ कहीं।
इसमें ही रचे-बसे, इसी में समाए हैं।।


(3)
इसी में रहीम, मीरा, देव, रसखान हुए।
तुलसी से भक्त कवि, भूषण महान हुए।।
यहीं भारतेन्दु ने किया था कभी सिंहनाद।
यहीं महावीर, प्रेमचंद-से सुजान हुए।।
इसी एक हिन्दी में बसी स्वातंत्र्य चेतना थी।
इसी में मधुर देश-प्रेम के बखान हुए।।
इसी को लगाया माथे गाँधी और नेहरू ने।
इसी के स्वरों पे देश-प्रेमी कुरबान हुए।।
(4)

 

देश को सदा जो एक सूत्र में पिरोय रही।
जनता भुलाए उसे आज लौं है सोय रही।।
डोलते फिरंगिनी के आगे-पीछे बावरे से।
देश की बहुरिया हैं जार-जार रोय रही।।
राज पद पाए वर्ष केतक व्यतीत हुए।
मुकुट से मुँह ढाँपे टुक-टुक जोय रही।।
छलना ही छलना के जाल हैं बिछाए गए।
आँकड़ों की बानगी में भाषा कहीं खोय रही।।

(5)
आँकड़े बनाए गए, आँकड़े दिखाए गए।
आँकड़े सजाए गए, आँकड़े ही गाए गए।।
यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ बैठकों निरीक्षणों में।
आँकड़ों से भाषणों के सुर हैं मिलाए गए।।
हारी हुई जंग है ये हिन्दी की सभी ये जानें।
हिन्दी अधिकारियों के मोहरे बिठाए गए।।
पेट पालते हैं लोग, भाषा-प्रेमी कोऊ नहीं।
पेट के ही वास्ते ये जाल हैं रचाए गए।।

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1 टिप्पणी "रामवृक्ष सिंह की हिंदी दिवस विशेष कवित्त-सवैया : राजभाषा हिंदी"

  1. wah ji, wah! hindi ki sristi se avi tak ka aapne byora kavita ke madhyam se diya ha, aap sadhuvad ke patra hain.

    manoj 'aajiz'

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