रमाशंकर शुक्‍ल लिखित - ॐ भ्रष्‍टाचार चालीसा

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

जय-जय भ्रष्‍ट शिरोमणि, करत रहो अतिचार

तुममें है सब नीचता, दास सदा संसार॥

सज्‍जनता में पैसा कहां, नेकी से क्‍या लाभ।

झोंक सभी को भाड़ में, बैठ मलाई चाभ॥

भ्रष्‍ट नहीं कोई गैर हैं, सभी आपने खास

आंत कुटी छवाइ के, खून पियें खाएं मास॥

 

जय जय भ्रष्‍ट महासुख रासी। कुक्‍कुर तुम सब खेलत सांसी॥

जाके घर तुम बैठहु भाई। आइ गयउं तहं दूध मलाई॥

बकरा, मुर्गा खाय खियावै। सात्‍विक जन इन देखि परावैं॥

तुम कनफुंकवा काम बनावन। तुमही राम अवर सब रावन॥

तुम्‍हरी ऐसी माया स्‍वामी। पांव पखारत नामि-गिरामी॥

तुमहि सोवाओ, तुमहि जगाओ। संतन कौ तुम गले लगाओ॥

फूट निधान, सदा बकवासी। एहि जग के तुम सत्‍यानासी।

अगनित रूप अरु नाम तुम्‍हारा। मानव तन धरि खावहु चारा॥

 

तुमहि देखि सब गोरू पराने। अरबन के सब भूस चबाने॥

कोलतार पी कोलकंठ बने हो। चैनल ढहे बस तुमहि तने हो॥

जूता खाकर ताज बिराजै। अंग-अंग चहुं झूठ समाजै॥

कतहु लबार, कतहु बकवासहि। मंजिल जन कर तुम्‍हरे पासहि॥

पेट तुम्‍हार भवा जब बंजर। युरिया हजम करि मचै बवंडर॥

क्षुधा तृषित जो कोइ दिख्‍ौ, आर्त क्षुधित बिमार॥

ताहि पकरि लै जाइए, भ्रष्‍ट जहां सरदार॥

 

फितरत सुवन अरु दोगले नंदन। लज्‍जाहीन सदा जगवंदन॥

सत्‍तावान नीच अति चातुर। दाम काज करिबे को आतुर॥

दुष्‍ट चरित्र सुनिबे को रसिया। सुरा सुन्‍दरी सदा मन बसिया॥

कौन सो काज कठिन जग माही। जो नहि होइ भ्रष्‍ट तुम्‍ह पाहीं॥

फोर्स बफोर्स दलाल कहावो। कहिबे पर हड़ताल करावो।

तुम न्‍यायालय न्‍याय सुनावो। दशकन तक बस बहस करावो

 

तुम्‍हरी कृपा घुमैं सब लंपट। घर घर लूट होंइ सब चंपत॥

दुष्‍टन मंशा पुरवहु भाई। देहु जमानत मोह बिहाई॥

तब तक मरि जइहैं सब नेता। खाइ पदाइ लीन होइ जेता॥

होइ निशंक चुनाव करावौं। पांच विधायक अवसि जितावौ॥

तेहि तिकड़ी सरकार बनाई। सूत्र नसाई के पार लगाई॥

जो विरोध कर सोचन चाहत। तेकर बिटिया-बेटवा आहत॥

लेइ सकल जग घूमहु ताता। पीठि पड़ै शत लातन घाता॥

जोगी जती सब सीस नवावै। नदी-नार महं मठ बनवावैं॥

 

सीमा पर सैनिक लड़ैं, उजड़ैं सकल सुहाग।

तुम्‍ह नहिं बाज आइयो, सदा लगावत आग॥

 

तुम अनंत हैं रूप तुम्‍हारे। कबहु भूमिगत कबहुं दुवारे॥

राष्‍ट्र शत्रु हैं मित्र तुम्‍हारे। जनमत ही सिर कर्ज हमारे॥

मोर कोष लइ गयउं विदेशू। सब जनता कर भयउं कलेशू॥

सब पूछइं को चोर डकैता। तुम ताकहु जस आंधर-बैता॥

बहिर बने जस सूनत नाही। हाथ मीजि सब जन पछिताही॥

जेतना चोर रहे यहि देसा। तुमहि बनायो सकल नरेशा॥

 

लतियावन कौ जोर नही है। आपन अहहि जो चोर वही है।

सब चोरन कर जाननिहारा। घर आंवइ सब बारहि बारा॥

हमरे चोकर चूनी महंगा। तुम्‍हरी कुतिया पहिरइ लहंगा॥

जय संप्रग जय राजग मंत्री। बहुजन सपा सकल कर जंत्री॥

टूजी, कामन, बैण्‍ड बजाओ। इसरो कौ सोना बरसाओ॥
खुफिया सब रण हारि पचारे। दांत चियारि खड़े पिछवारे॥

भ्रष्‍ट अजेय अवर सब हारा। रक्‍तबीज जस तुम महिभारा॥

 

नोट काज सब करिहहु, तुम्‍ह बल बुद्धि निधान

सब शासन रक्षा करैं, मिलै सदा सनमान॥

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "रमाशंकर शुक्‍ल लिखित - ॐ भ्रष्‍टाचार चालीसा"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.