बुधवार, 26 सितंबर 2012

मनोहर चमोली ‘मनु' की कविता - ‘आधा अधनंगा देश शर्मिन्‍दा है'

आधा अधनंगा देश शर्मिन्‍दा है'

अहा! मेरा देश!

कबीर के करघे का देश

गांधी के चरखे का देश

ये अगुवा थे मेरे देश के तब

हाय ! मेरा देश

तीन-चौथाई अधनंगा था जब!

कबीर-गांधी शर्मिन्‍दा थे

यकीनन तभी वे भी अधनंगे थे

ओह ! आज मेरा देश !

नेताओं का देश

ठेकेदारों का देश

कमीशन का देश

रिश्‍वत का देश

बन्‍दरबाँटों का देश

छि ! देश अब भी आधा अधनंगा है

और अन्‍य आधों के अगुवा

बेशकीमती कपड़े ऐसे उतारते हैं

जैसे भूखा बार-बार थूक घूँटता है

इन अगड़ों की आँखों में

बँधी है पट्‌टी बेशर्मी की

लेकिन आधा अधनंगा देश

इन्‍हें देख कर शर्मिन्‍दा है।

मैं भी।

-मनोहर चमोली मनु'

3 blogger-facebook:

  1. Sundar chitran Chamili jee ... sachai ujagar ki hai ...umda rachna ke liye badhai

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत खुब कही
    और अन्‍य आधों के अगुवा

    बेशकीमती कपड़े ऐसे उतारते हैं

    जैसे भूखा बार-बार थूक घूँटता है

    सच्चाई बयां करती कविता

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खुब कही............
    और अन्‍य आधों के अगुवा

    बेशकीमती कपड़े ऐसे उतारते हैं

    जैसे भूखा बार-बार थूक घूँटता है
    सच्चाई कहती कविता.......




    उत्तर देंहटाएं

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