मंगलवार, 11 सितंबर 2012

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - कोयले का मारा-देश बेचारा

कोयल भी काली, कौवा भी काला, कोयला भी काला। मगर कवि प्रिया को इससे क्‍या ? कवि प्रिया ने सूचना दी कि गैस खतम है। सिलेण्‍डर दस-बीस दिन में आयेगा। तब तक तुम बाजार में जाकर कुछ कोयला ले आओ, पुरानी सिगड़ी रखी है, काम चल जायेगा। कवि ने तुरन्‍त बताया कोयले के कारण तो संसद से सड़क तक आग लगी हुई है, ऐसी स्‍थिति में कोयला खरीदना समझदारी नहीं है, मगर कवि-प्रिया ने कहा मैं खदानों वाले पर मैं पत्‍थर के कोयले की नहीं सामान्‍य लकड़ी के कोयले की चर्चा कर रही हूँ, इस कोयला में कोई ब्‍लाक आवंटन नहीं होता है सीधे-सीधे मिल जाता है।

मगर कवि मन नहीं माना। वो कोयला-चिन्‍तन में व्‍यस्‍त हो गया। कोयले की दलाली में काले हाथ और कोयला,खानों में भ्रष्‍टाचार के नीचे हीरे की सम्‍भावना कवि को भावुक और रोमांटिक बना रही थी। कवि ने कोयले पर चिन्‍तन और संसद ठप्‍प होने पर चिन्‍ता प्रकट की। कवि मन दुखी और उदास था। क्‍या पक्ष क्‍या विपक्ष सब कोयले की गंगा में हाथ धो रहे थे। काले सोने से निकली काली लक्ष्‍मी की पूजा अर्चना कर रहे थे। काजल की कोठरी में सब काला ही काला। सफेद कोयले से काली लक्ष्‍मी तक का सफर हर व्‍यक्‍ति को रास आ रहा था। केवल आम आदमी लकड़ी के कोयले के लिए मारा मारा फिर रहा था।

कोयले को घोटाला या घपलों या भ्रष्‍टाचार कहना कोयले का अपमान है। ये तो घोटालों का महाराजा कहा जायगा। जब सबसे पहले पर्दाफाश हुआ या तो किसी ने ध्‍यान नहीं दिया लेकिन अंग्रेजी में छपा तो सब ने पढा, देखा, सुना और संसद ठप्‍प हो गई। स्‍तीफों की राजनीति शुरु हो गई। तू भी भ्रष्ट मैं भी भ्रष्ट का राग शुरु हो गया। सब कुछ हुआ बस लोकतन्‍त्र मजबूत नहीं हुआ। बहस हो। बहस हो․․․ चलने लगा, मगर बहस किस पर हो। केग की भी नहीं सुनी गई। सरकार ने जीरोलोस का नया सिद्धान्‍त प्रतिपादित किया जिसे शायद अर्थशास्‍त्र की अगली पाठ्‌य पुस्‍तकों में शामिल किया जायेगा जीरोलोस तो फिर डर किस बात का। सर्वत्र ओछी राजनीति का घिनोना सफर। कहीं कोई रोशनी नहीं जलते हुए कोयले की आग जो खदानों में सैकड़ों सालों से लगी हुई थी अब संसद तक पहुँच गई। क्‍या स्‍त्री-क्‍या पुरुष सब के सब काले। संस्‍कृति के नाम पर लूट मचाने वाले। बयानवीर चैनलों पर चर्चा करने को प्रस्‍तुत। अपने अपने आंकड़े-अपने अपने विश्लेषण। अपने अपने कयास। कहीं कोई ईमानदारी का नाटक नहीं। बेईमानी की मोटी परत, मलाईदार, मोटा माल सब कमा रहे है, तू भी कमा मैं भी कमाउं, मगर बेचारे देश का क्‍या ? देश की चिन्‍ता मत कर यह महान देश मेरे या तेरे भरोसे नहीं है।

रोज नये तथ्‍य, रोज नये खुलासे। लोकतन्‍त्र के दोनो पहिए पंचर। टायर बदलने की सख्‍त जरुरत । मगर कौन बदले। हजारों जवाबों से बेहतर मेरी खामोशी या हर सवाल का जवाब खामोशी, चुप्‍पी, मौन, कब दहाड़ेगा मेरा शेर। देश शर्मसार, सस्‍ंथा-शर्मसार, वोटर शर्मसार, मगर संसद मौन। दिशा देने वाले ही दिशाहीन।

कवि और कवि प्रिया दोनों दुखी। ऐसे में क्‍या करे। कवि ने शायर का कलाम पढ़ा-

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो यारों,

ये कमल अब कुम्‍हलाने लगे है।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

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