मोतीलाल की कविता - अपने भर

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अपने हिस्से में लोग 
हिस्सा का गणित करते हैं
और जहाँ नहीं जाना चाहिए
तय नहीं करना चाहिए
उन वर्जित क्षेत्रों को
वे घुस जाते हैँ और बना लेते हैं
अपने लिए पूरा हिसाब

वे जो गंदे से बीनते हैं कचरे
और वे जो धूल उड़ाते हैं मारुति से
अपने हिस्से का धूप रख लेते हैं
अपने पास
फर्क की चादर में
पहला काला-कलूटा होकर
ताकता है अपने हिस्से के आकाश को दूसरा उड़ाता है गुब्बारा
सेंकता है सागर किनारे
अपने नर्म नाजुक देह को

अभी हिसाब के खाते में
चंद्रमा नहीं आया है ना ही सूरज
पेड़ तो निलाम हो चुके हैं
और नदी कसमसाती रहती है दिन-रात अपने जंजीरों से खुलने के लिए

अभी रोटी की बात कुछ देर टल गयी है बात हो रही है मंगल की
और वे अपने हिस्से का मंगल चाहते हैं जहाँ सूखी रोटी की जगह
काकटेल पार्टी की हुड़दंग हो

समय की घड़ी अभी बूढ़ी नहीं हुई है
बूढ़ा गये हैं हम
जिसे अपने हिस्से का
न धूप, न पानी, न रोटी,
न ही फुटपाथ मिल पाता है

उनके खाते में
सबका हिस्सा आ गया है जरुर
पर अभी तक उसने
नहीं पकड़ सका है
हमारे असीम समय को ।

* मोतीलाल/राउरकेला

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