गुरुवार, 27 सितंबर 2012

रमाशंकर शुक्ल का कविता संग्रह - एक प्रेतयात्रा

एक प्रेतयात्रा

(कविता संग्रह)

डॉ. रमाशंकर शुक्ल

 

परंपराएं लौह-शृंखला हैं/इक्कीसवीं सदी में भी/नहीं टूटी हैं/

गांवों में नहीं/शहरों में नहीं/महानगरों में भी नहीं।

टूटता है धर्म/कच्चे धागे-सा/अदना, कमजोर।

हल्का सा खिंचाव भी/बर्दाश्त नहीं।

धर्म, धर्मग्रंथ/यानि प्रेम के आख्यान/बल्कि अधिकांशतः सेक्स गाथा।

लेकिन आदमी को/किसी 'अपने' या 'गैर' से/प्रेम की इजाजत नहीं देते ये।

यह केवल देवताओं का भोग है/आदमी के लिए यह क्षेत्र

पूर्णतः प्रतिबंधित है।/घुसे कि चीख पड़ती हैं बस्तियां

मस्जिद, मंदिर, चर्च, गुरुद्वारे/चट् चटाक् तड़् तड़

लगते हैं एक एक कर दरकने/चट्टी-चौपाल

दिल्ली-भोपाल/सबके सब कैसे तो/बोल पड़ते हैं हमला।

फिर आदमी के पास/असमय मौत के बाद

प्रेत होने के अलावा/बचता ही क्या है!

   
1
तुम्हें पता है
मुझे केवल तुम्हारे देह के
फुंफकारते उन्माद से
प्रेम नहीं
और न ही
तुम्हारी भावी थातियों से।
तुम्हारी शिथिलाती दृढ़ता
धीरे-धीरे मुझे
ऊब से भर रही है।
संदेह से पैदा
यह ऊब का सांप
आदमी के लिए चोर है
हमारे लिए
परंपराई भीड़ का शोर है।

मैं पक्का वाकिफ हूं-
तुम तालाब के कीचड़ से
पैदा हुई हो
जिसे सुविधा में कह सकता हूं
कि तुम कमल हो
एक आवारा आदमी के लिए
शुकून का संबल हो।
मगर, मुझे कोफ्त है कि तुम
अक्सर ही महज एक औरत हो जाया करती हो
जिसे आंसू और मुस्कान की
कीमत का पूरा ज्ञान है।
और शायद यही
हमारे बीच सच बोलने के
इकरारनामे का अपमान है।

मेरे ख्याल से
तुम्हें बुरा नहीं मानना चाहिए
कि मैं इतना कठोर हो जाता हूं
दरअसल, यह वैसा ही स्वाभाविक है
जैसे परंपरा के कारण तुम्हारा स्त्री होना
या दोस्त का चेहरा खोकर
निरी मेहरारुई पत्नी हो जाना।
फिर भी यह सच है कि तुम
बिना खाद वाली पालक की तरह साक हो
और बिना मठ वाले
गुफाई संत की आत्मा-सी पाक हो।

उस समय
जब पहली पहल
मैं तुमसे मिला था
एक करिश्माई रोशनी ने
मेरे अंतर को
रगड़-रगड़ नहलाया
और सारे अंधकार को
गांव के गटर में
फेंक डाला
मेरे मन का कचराघर
साफ-सुथरा हो चमकने लगा।
मगर तब और अब के फासले में
तुम्हारा औरत होना ज्यादा
और सहचरी होना कम हो गया।

जिंदगी के इस
उबड़-खाबड़ नाप-जोख में
चाहती हो कि
दोनों पलड़े बराबर रहें
तो तुम एक सही अभिव्यक्ति
और एक पक्की अनुभूति का
पावर हाउस बन जाओ
ताकि तुम्हारे प्रेम की रोशनी में
तुम्हें ठीक-ठीक आंक सकूं
अपना भी कद नाप सकूं।

यह तय है कि 'तुम'
की तुलना 'उस' से करना
ईश्वर के इरादे के साथ बेमानी होगी
मगर 'तुम' केवल तुम रहो
तो मेरी जिन्दगी
एक छलकती हुई रवानी होगी।

संशय खत्म होने के बाद
विश्वास के सिलसिले में
मैं जो अपना नाखून
तुम्हारी खोपड़ी में
धंसाता हूं तो
इसलिए नहीं कि
तुम्हारी हत्या की
कोशिश कर रहा हूं
बल्कि यह एक आपरेशन है
जहां मवाद होने की आशंका
अचानक घर कर गयी थी
और अब
मैं महसूस करता हूं कि
यह मेरा एक खतरनाक निर्णय था
जिससे मवाद की बजाय
खून निकलने की संभावना ज्यादा थी।

लेकिन तुम्हें
मेरे कुछ फुटनोट
याद कर लेने चाहिए
जिसे मैंने बड़ी मशक्कत से लिखा है-
कि पहले आदमी बनो
बाद में आदमी का दोस्त।
कि अपनी दिव्यता बरकरार रखो
ताकि दूसरा अपनी नीचता पर शरमा सके।
कि अपने पवित्र इरादे पर अटल रहो
और एक योद्धा के सारे जवाबी गुण
तुम्हें सुरक्षित रखें
इसलिए भीतर प्रतिशोध की आग जलाती रहो।
यह भी कि तुम्हें अलग राह जानी है
इसलिए शेष आडंबर
तुम्हारे लिए पानी हैं।

 

 


2
तुमसे मिलना
रात भर पढ़कर
उठते विद्यार्थी का संतोष
तपस्वी की साधना का फल
चिर वात्सल्य वियोगी
मां को बेटे का मिलन
प्रिय की यादों में विलख
थकी हुई प्रेयसी की पीड़ा
धूप में चलकर थके पंथी की छांव।
तुम केवल तुम ही रहो
तुममे तुम्हारा ही रूप रहे।
तुम्हारा मिलना
चमकहीन घिसा बरतन न बने
खिलती रहे भोर के सूरज की अरुणिमा
चहकाए
मेरे सोतेपन को जगाये
और
रोते-रोते सोये विरही के सूखे होठों पर
एक मीठा चुंबन खोल दे आंखें
तुममें एक नवीनता
आत्मा की दिव्यता
जन्म दर जन्म मिलती रहे।

            (21 फरवरी, 1997)

 


3

जीवन का पुण्य प्रभात
शायद आज ही होना था।
तभी तो ममतामयी ने
सारे उपकरण पहले ही जुटा लिए
ऋषिगण भी थे
और, जन भी
ध्वनि भी नीरवता के साथ।
गूंज रहा था अंतर्वेद
चुपके-चुपके
देव चंद्र खुद चल कर आये थे
बड़े प्यार से
कर-किरणों को
पूरे तन पर फेरे थे।
देखे थे तुम
माता क्या कहती थीं
उनकी आंखों में था
वत्सलता का दान
बड़े धीरे से उसने
उतार दिया था हममें
कैसा था संयोग न!
सब कुछ नैसर्गिक
सब कुछ स्वर्गिक
दो हाथों के बंधन
जैसे सफल हो गये
बिना दिखाए
बिना जुटाए।

 

 

    4
राहों में हंसते-खिलते गीत
अचानक जब रुक जायें
भीतर चुपके से कोई तब
कहता है- 'वे रोये हैं।'

भीने-भीने सपनों में जब
घना अंधेरा घिर जाये
मन के कोने से कहता कोई
'तुम सोये हो, वे खोये हैं।'

सेती-सोती पलकों पर जब
भार अचानक लग जाये
भीतर हौले से कोई तब
कहता है-'वे आये हैं।'

सूखे-सूखे नयनों में जब
नीर का झोंका आ जाये
छूकर होठों से कोई तब
कहता है- 'हम आये हैं।'

 

    5
जब तुमको रोना आये
अपनों की कर्कश भाषा से
मन रह-रह छिल जाये
अतीत की सुधियों से
कंठ-दिल भर जाये
तब इतना ही करना प्रिय
मन के भीतर मुझे पुकार
कहना- 'जल्दी आ जाओ।'


    6
जिस दिन
मेरे लिए
लोगों के मोर्चे
तुम खुद संभालने लगो
समझ लेना तब
हम दूर होने वाले हैं।

    7
तुम्हारा रूठना
मुझे घने अपनेपन से भर देता है
तुम्हारी झिड़कनों में
बेगानेपन का अनुभव
निःशेष हो जाता है।
ये रूठना
झिड़कना
मुझे उतना आकुल नहीं करता
जितना कि तुम्हारा खामोश हो जाना।
तब मैं
एक अपराधी सा
अपनी ही काल कोठरी में
कैद हो जाता हूं।
    8
कई दिनों की नोंक-झोंक
तूं-तूं, मैं-मैं के बाद
जब तुम्हारी
खिसियाई-लजाई आंखें देखी
प्यार उमड़ आया
दिल ने डांट समझाया
तुम्हें छूने को जी किया
हाथ आगे बढ़ाया
पर, ऐसा कर न पाया।

उस दिन जब तुम
वहां बैठी
अकेलेपन को बुन रही थी
तब मेरी बाहें
तुम्हारे संपूर्ण अस्तित्व को
समेटने खातिर मचल उठीं
पर किसी ने धकिया दिया
शायद वे तुम्हारे शब्द थे।


    9
पहले तुम्हारी
फैली बेबाक आंखों में
तैरते हुए प्रश्न
मुझसे उत्तर मांगते
और, मैं झेंप जाता।
मन ही मन
उसकी चुभन महसूसता
तुम रोज-ब-रोज
कुछ न कुछ
एक नया प्रश्न
मुझ पर ठोंक देती।

तब नहीं समझ पाता था
यह तुम्हारा पढ़ना है
या निमंत्रण।
मैं उत्तर तलाशता
कहने की कोशिश करता
पर, बेशरम शब्द शरमा जाते।
अब मैं महसूसता हूं-
वे आंखें प्रश्न नहीं
मुझमें छिपी संभावनाओं को
तलाशती थीं।


    10
जब-जब मैं
'उनके' गीत गाते हुए
भीतर से रो पड़ता
व्यथाओं को संभालने
नीरव आश्रय लौटता
तुम्हारी खामोश आंखें
बांहें फैलाए
आलंबन बनने की हौंस लिए
दूर तक मेरा पीछा करतीं।
तब भी नहीं
समझ पाया तुम्हें
तुम्हारी मनगढंत कहानियों को भी
मैंने समझने की कोशिश न की
लेकिन जब तुम्हारे
सब्र का बांध
आंखों की सीमाएं तोड़ दिया
मैंने महसूस किया कि
एक मंजिल मेरे लिए
लगातार पीछा कर रही है।

 

 

    11
माझी मेरे
कब तक तुम
मुझ लक्ष्यहीन को
खेते रहोगे ?
मुझे मालूम है
हर शाम
सागर के भयावह
अंधेरे कोलाहल में
जब मैं कांप उठता हूं
तब तुम
बिना मुझे आभास कराये
अपने खेने की गति
तेज कर देते हो।
पर क्या सोचा है कभी
कि मेरा किनारा क्या होगा ?

   

12

अक्सर ही तो मैं
तुम्हें चांद कहता हूं
इसलिए कि
तुम वैसी ही शीतल और
वैसी ही सुंदर हो।
चंाद क्रमशः बड़ा होता है
और छोटा भी
मगर चांद होता है
पर क्या
तुम चांद की तरह
छोटी-बड़ी होती
रह पाओगी मेरे आकाश में ?
यदि रह भी पायी
तो क्या तुम्हारा
छोटा-बड़ा होना
ऐसे ही जारी रहेगा ?
   


13
गंगा की तरह
तुम्हारी आंखें
मुझे रोज
डुबकियां लेने को
विवश करती हैं।

डूबते-तिरते
थके लौट आता हूं-
अर्चना गृह
मगर, फर्क नहीं कर पाता
कि मेरी अर्चना में
तुम होती हो
या तुम्हारी देवी !
संभव है कि तुम दोनों रहती हो
लेकिन यकीन नहीं होता
कि फूल का सम्मान
शायद कभी तुम्हारी
देवी को मिला हो।

 
14

कभी मैं किरण था
वह कमलिनी
आकुल प्रतीक्षारत
जब वह आंखें
बंद कर लेती
मैं दबे पांव दाखिल हो
अधरों पर टिका देता
कोमल प्रकाश
वह नहा उठती।
मैं अब भी वही हूं
किन्तु किरण नहीं
मेरी छुवन से
अब उसे ताजगी
नहीं मिलती
वह अब
छुई मुई है
और मैं एक स्पर्श।

   15

मलयानिल
पहले की ही तरह
चुपके से आया
अपनी सरसराहट
उसके इर्द-गिर्द बिखेर दिया
कलिका को वैसे ही दुलराया
गाया गीत
उझक-उझक नाचा
उंकड़ूं बैठा कान पकड़कर
कलिका कुछ न बोली
हिली न डुली
फूली-सी फैली रही
जैसे वह मलयानिल नहीं
समंदर का तूफान हो।
मलयानिल खौला
टूटा-तड़पा
उसकी चीत्कार
जंगल के आर-पार
गूंजी और खामोश हो गयी।

   

16
कुछ कहे
कुछ अनकहे
कितने बोझ
ढोते हो तुम !
आश्चर्य से देखती हूं मैं
जब एक ही सांस में
फट पड़ते है तुम्हारे
बारूदों के शब्द
बिना मेरे किसी प्रश्न के
या कि उन्हीं में से
जो मैं पूछना चाहती हूं उत्तर
या यूं कहें कि
संभावना लिए
कुछ भी तो नहीं छोडते
मेरे कहने के लिए।
तब केवल देखती रहती हूं तुम्हें
या कि तुममे कुछ भरना चाहती हूं।

शायद शब्द नहीं
खामोशी ही सही हो
पता ही नहीं लगता-
समझ रहे हैं
या समझा रहे हैं।

    17

जिस मंजिल को
पाने के लिए
तुम
बार-बार समझाती हो
उसकी राह
तुम्हारे सपनों से
ऊपर होकर गुजरती है।
कम से कम मैं
यह जानते हुए भी
उस पथ
नहीं चल सकता।

तुम्हारे बहुत से तर्क
यह भी कि
शायद मैं तुम्हारे लिए
एक पड़ाव ही होऊं
तलाश का एक विश्राम
जिस पर रुकना नहीं
पार करते रहना ही
यात्रा और यात्री का धर्म है
तो भी सोचना चाहिए था
एक बार कि
वही पड़ाव मेरे जीवन का
सबसे बड़ा मर्म है।

    18

तुम जानती हो
मेरा अनकहा
संभावना या कि संदेह!
अच्छा होता कि
फटते हुए
मेरे बारूदी शब्दों पर
तुम्हारे खामोशी का
आतंक न होता
बल्कि एक मुखर संवाद
रहता कायम
प्रत्युत्तर, प्रतिघात
प्रतिरोध, प्रत्याक्रमण ही सही
कुछ भी।
जिंदगी बहने के लिए
जरूरी है
संवादों का कायम रहना।
क्या तुम्हें पता है ?
प्रतिरोध आदमी को
जिन्दा रखते हैं।


    19

फिर घिर आयी शाम
भीतर भी।
लगा कि कोई दबे पांव
आया और मेरे कंधे पर
रख दिया अपनी बांह।
न, कोई तो नहीं।
मुड़कर देखा
फूलों के दो पौधे
डांट खाए बच्चे की तरह
खड़े हैं निश्चल
कुम्हलाए पत्तों में।
उमड़ आया स्नेह
पानी दिया
इतना कि वे तर हो गये
पाया कि डाल दिया है
इनकी जड़ों में
अपना अस्तित्व
अब मैं खुद
हरा हो रहा हूं।

शाम गाती रही
अस्फुट स्वरों में
निष्कर्षहीन यात्रा के गीत
नियति राह परिवर्तन का
परामर्श दे रही है।
मैं जूझ रहा हूं
दूसरे हृदय की भी
पीड़ा बूझ रहा हूं।
खटका हुआ कि
समने वाला पहाड़
इतना बड़ा होगा
कि उसके बाद
केवल एक खाईं होगी
जहां मौत से डर कर
लौटने पर
केवल जगहंसाई होगी।

तब मेरी शाम का हाथ
मेरे कंधों पर नहीं
और अधिक क्रूरता से
दिल और दिमाग को
तोड़ेगी और
निष्कर्षहीन यात्रा में
शून्यता बटोरने और
गला फाड़-फाड़
चिल्लाने की क्रिया
तो करता रहूंगा
किन्तु न कंधे पर हाथ होगा
न बालों में उंगलियां।
तब न पीछे पौधे होंगे
न ही उनका पानी मांगना।
क्योंकि
तब न हरियाली होगी
न ही उनके
कुम्हलाने के
बाद वाली प्यास।


20

ओ री
अनव्याही सुहागन
सज-धज
देख
प्रीतम परदेशी
झंझावातों को सहकर
कितनी हौंस लिए
हर राग, हर भाग
तुम्हें सौंपने आया है।

फैला दे आंचल
भर ले भर ले
हिय में, मन में, तन में
अंतर-बाहर में
वर्षों का संचित उपहार।

छलका दे
अपनी हर पुलकन
    हर चितवन
झनन-झनन झनका
पांवों के पायल

ओ री
वासंती कलिका की
मृदुल पराग
झर-झर कर बिखर
अपने सिंदूरी रंग-गंध
प्रिय के अंतरमन में।

 

    21

हां, मुझे लगता है
तूं वह परी है
जिसके पास
एक मोहक
जादू की छड़ी है
जिसे तब घुमा देती हो
जब किसी सचाई पर
अमल कर
दुनिया से दूर
जीवन के उस पार जाने को
कदम उठाना चाहता हूं।

मैं जिंदगी से
चाहे जितना ऊब गया होऊं
और चाहूं कि
हमेशा के लिए जी भर कर सोऊं
कि तुम संसार का
समूचा सम्मोहन-जल
मेरे रेगिस्तान में उड़ेल देती हो
और मैं
सब कुछ भूल
मुग्ध भाव
तुम्हारी छड़ी के इशारे पर
पीछे-पीछे चल पड़ता हूं।

 

    22
तुम स्नेह का आंचल फैलाओ
मैं जीवन अर्पण कर दूंगा।

जग दुःख की बदली बरसायेगा
हरियाली जीवन की गल जायेगी
छिपी निगाहें करती होंगी पीछा
सूनी ही उम्र तुम्हारी ढल जायेगी।
        प्रिय! हिचक-झिझक सब छोड़ो
        मैं बहार बसंती बन जाऊंगा।

सूना ही है संगीत हमारा
कोकिल बन तुम तान सुनाओ
मरुथल के जीवन कण में
मधुरस की एक लहर बहाओ
        प्राण! प्रेम का दीप जलाओ
        मैं आग तुम्हारा बन जाऊंगा।

काली आंधी आये जब-जब
छोड़ चले जायें अपने सब
स्मृतियों से खींच स्नेह-शक्ति
मुझे बुलाना अंतर से तब
        टंकार धनुष का करना तुम
        मैं तरकश तेरा बन जाऊंगा।

 

    23

रात उनींदी
सपनों का घेरा
घेरे में जीवन
जीवन का फेरा।

वह
तारिकाओं संग
बादलों के बीच
चांद-सी
लुकाछिपी करती
क्रोध के आवरण में
प्यार के फुहारे बरसाती
अक्सर दुलराती है मुझे।
मैं अतृप्त भूमि सा
सराबोर होने की प्रतीक्षा में
लगातार जेठ की दुपहरी में
तपता हूं
रोज सूखती हरियाली में
एक सावन नाम जपता हूं।

 


    24
कविते
प्राण
सखि
संगिनी।
वासंती चंद्रिका-सी
धीरे-धीरे तुम
जीवन में आयी थी।
दिव्य, मधुर
वर्जन-अनुरंजन के
रागों में दुलरायी थी।
तुम हिम थी
मैं समतल पठार
मिलकर हैं अब
सरस, रसधार।
तुमने
पिघल-पिघल
मेरे अंतस्थल को सींचा
सतत प्रवाह।
बहो, बहो, पूत सरिता!
युग-युग
आगे प्रतीक्षातुर सागर
करने को स्वागत
बहो, बढ़ो, गुजरो
चाहे जहां, जिस राह
बढ़ेगी तू कलकल, छलछल
वह तो होगा
मेरा ही अंतस्थल।
तू अनंत की मधु आभा
चिंत्य हृदय की चेतन
सहस्रपर्णी शीतल बन
चल उस विराट
मैं रहूंगा बन स्पंदन।
    25

यह जग
मिट्टी का
मिट्टी ही विलयस्थली।
यह इठलाती देह
गृह, उपवन, वस्तुएं
वस्तुओं के सुख
लालसाएं, उपलब्धियां
हर कुछ हो जाएंगी निःशेष।
तुम और मैं भी
गल जाएंगे
ढह जाएंगे- मिट्टी में।
नहीं मरेगा-
मेरे-तेरे
इनके-उनके, सबके
अंतर्मन में प्रतीक्षित प्यार
प्यार की तड़प
तड़प का प्रतिफल।
यह शाश्वत स्तूप
जन का, तन का
मन का, जीवन का
धरती-नभ का
कीट-कीट, कण-कण का।
मिट्टी का हर कोना
मिट्टी होने वालों से भरा पड़ा है
मगर
तिनका-तिनका
प्यार की बाट जोहता खड़ा है।

 

26

बहुत दिनों बाद
तुम्हें लिख रहा हूं
क्योंकि लिखना जरूरी है
जिन्दा आदमी की
यही तो मजबूरी है।

मैं तुम्हारे लिए
गीत नहीं गाऊंगा
आंसू नहीं बहाऊंगा
रात भर करवटें नहीं बदलूंगा
अपने प्यार का विज्ञापन नहीं करूंगा।
क्योंकि-
गाना, आंसू, करवट, प्रचार
यह मेरा नितांत भीतरी हिस्सा है
मां की लोरी है
दादी का तिलस्मी किस्सा है।

यह भी नहीं कहूंगा कि
तुमसे प्रभावित हुआ
कि तुम्हारे दुःखों पर
मेहरबान हुआ
या अपनी गलती से परेशान हुआ
सचाई यह है
    कि तुम्हें देखते ही दोस्ती का हाथ आगे बढ़ा
    गलतफहमी या यूं कहो कि भयभीत था
    और उसी दम तुम्हें हमसफर न कह सका।

रूढ़ि ही समझो
तो भी मेरी कुण्डली बताती है
कि मैं औरत के वियोग में
पिछले जन्म में मर गया था
शायद वह तुम्ही हो।

बगैर किसी शिकायत के कहूं
    तो तुमने भी मेरी मृत्यु के बाद
    वह अदनी काया छोड़ दी
    मेरे द्वारा वीजारोपित को जनने तक
    तमाम हमलों को सहती रही
    इसलिए इस जन्म में नौ माह छोटी हो
    तुमने मुझसे मिलने के पहले
    कइयों में मुझे तलाशा
    और मैंने भी कोई कसर न छोड़ी।
कोई वादा नहीं, कोई संकल्प नहीं
कि मैं तुम्हारे लिए कितना क्या करूंगा
हमारे तुम्हारे बीच
पुरुष और प्रकृति-सी सहजता है
इसीलिए प्यार का यह बाग
हरदम महकता है।

मैं सूरज और तुम पृथ्वी।
मैं तुम्हारे लिए अडिग
तुम मेरे इर्द-गिर्द घूमती हो
तुम्हें मुझसे गर्माहट मिलती है
और तुम मुझे चूमती हो।
इसलिए समय और
सामर्थ्य की वकालत
हमारे लिए व्यर्थ है
क्योंकि-
    हमारे बीच के रिश्ते का दूसरा अर्थ है।

पहाड़-सा तन
सागर-सा मन
रहो हर क्षण अडिग और तरंगायित
समाजी तूफानों पर क्रोध की बजाय
दो क्षमा का दान
क्योंकि एक बात साफ है
कि वायु अंधा है
उसे सागर-पहाड़, पठार का फर्क नहीं मालूम।
दुनिया भुलक्कड़ है
फिर भी फक्कड़ है
जिसे पहले रोकता-टोकता है
माला पहनाता या पत्थर फेंकता है
बाद में उसी की हिम्मतपरस्ती का
गान करता है
सच्ची आत्माओं का मान करता है।
इसलिए कायिक स्थापना का मोह व्यर्थ है
आत्मा के प्रवाह का ही सच्चा अर्थ है।
कायरों ने किसी युद्ध का
कोई टुकड़ा आज तक जीता है क्या ?
तूफान को रोको
उसके साथ कभी मत उड़ना
गिरना, ढहना
पर पूरी हिम्मत से फिर खड़ी रहना।

 

   

27

दीप वर्तिका
खुद जल
खुद की आत्मा को
दो प्रकाश।
हंसिनी
उड़
प्रतिदिन उड़
फैलाकर पांखें
दिक्-दिगंत के आंगन में-
मुक्त, निर्द्वन्द्व, सोल्लास
उड़, उड़
पर खो मत जाना
मेरे भी आंगन में आना।
मैं चिर प्रतीक्षित
तेरी राह
नजर बिछाये
बाहें फैलाए
आकुल मन
तृषातुर तन
इस तप्त लोक में
यही खड़ा रहूंगा।
ओ री चकवी !
स्वप्न सखी !!
सहस्रपर्णी !!!
प्रज्ञे, उर्मिले, चारुस्मिते !!!!
मेरे सुर में सुर मिला
सूखे कण्ठों को
अपनी प्रिय-दृष्टि पिला।

 

    28

चलो भुलावा दें जी को
बुलावा दें पी को।
नाविक से कह दो
पतवार घुमा दे
धारों की गति में
उलटे चलते जाना है।
क्षण भर का विश्राम
थके तन
विकल मन का
अवलम्बन होगा।
हमें तो भोर के पवन-सा
धीमे-धीमे बहते जाना है।
लोगों का कहना है-
'यह भोर का पवन
जागृति देता है
मन का आलस लेकर
चेतन अमृत देता है'
किन्तु
कभी क्या जग ने सोचा
पवन बहने में
कितना टूटा होगा
सांझ छोड़ बिरहिणी अपनी
कितने प्याले विष घूंटा होगा।

 

    29

हम तो बंदर हो गये भइया
नाच रहे हैं थाथक थइया।

मोटी लड़की बड़ी मदारी
पर हमको है सबसे प्यारी
रह-रह हमको आंख दिखाती
ना मानूं तो गाल फुलाती
    कभी न देती दूध-मलइया
    हम तो बंदर हो गये भइया।

सबकी सहे, सबके संग रहे
पवन रसीली-सी वह बहे
जब मैं घूम के आता हूं
उसको गुस्से में पाता हूं
    कैसे तैरे मेरी नइया
    हम तो बंदर हो गये भइया।

बैठाकर वह अपने आगे
दिन भर का लेखा मांगे
क्या-क्या किया, क्या क्या पिया
कहां गये और क्या-क्या जिया
    हम बन जाते हैं सीधी गइया
    हम तो बंदर हो गये भइया।

बहुत रसीली औ गुस्से वाली
भीतर गोरी बाहर से काली
आज तो वह बस ऐंठी है
घर आंगन कर बैठी है
    ऊपर चिल्लाती उसकी मइया
    हम तो बंदर हो गये भइया।


आज सुबह जब घर से निकला
बीच सड़क मिली कानी विमला
मैंने अपनी आंख चुराई
जल्दी-जल्दी रफ्तार बढ़ाई
    भर दिन दौड़े पत्ती पइया
    हम तो बंदर हो गये भइया।


    30

सब परेशान हैं
जैसे दुरदुराए मेहमान हैं
चट्टी-चौपाल
बभनी से भोपाल
चर्चा-ए-खास है
क्या ?
उसने उससे प्रेम कर लिया।
प्रेम और हत्या में फर्क !
कुछ नहीं, कत्तई नहीं
एक परंपरा की हत्या
दूसरा कानून की।
    बेवजह हैं सारे तर्क।
वह बना रहा है योजना
बताएगा गैर संप्रदायवादियों को-
'हिन्दुत्व को नष्ट करना है तो
गोलियां मत दागो
तोप मत चलाओ
इनका धर्म कच्चा धागा है
झट टूट जाता है।
बस एक काम करो
गैर जाति के लड़के-लड़कियों से
प्रेम करवाओ।
देखना सब तड़प जाएंगे
खोपड़ी ही नहीं
सड़क भी खाएंगे।
मारेंगे, काटेंगे और......
    खुद भी मर जायेंगे।

   
   

31

समस्याओं के जंगल से
दिन भर जूझते हैं वे
शाम की फिजाओं में
जैसे पूरे होने वाले हैं अरमान
कि दिन भर लड़ती तलवार को
मिल जायेगी एक सुरक्षित म्यान।

बहते हैं वे
पानी की रफ्तार के साथ
छिले घुटने, टूटे हुए हाथ
ऊंच-खाल नुकीले
कंकरीले पत्थरों से घायल
उन स्वरों से बिंध
जिसे पुकारी एक समुद्री पायल।
    इसीलिए तो वे लड़ते हैं
    एक प्रतीक्षा में सब सहते हैं।

चांद दिन भर झेलता है धूप
सांझ को सजा कर निखरा रूप
शीतल आंचल फैला वत्सलता
धरती से है चुपके से कहता-
    मैं तपता हूं, तूं सहती है
    दुनिया हमको पागल कहती है।


32

कौन सा पाप
ढो रहा हूं
पीठ पर नहीं
सीने पर लाश
ढो रहा हूं।
किसी कमल की तलाश में
जुटा था तब
लेकिन अब
कीचड़ भी साफ करना पड़ रहा है।
ताकि
कमल ले जाने के बाद
तालाब को
फूल की सुरक्षा के लिए
कीचड़ न पालना पड़े।
तालाब का रुख बताता है-
कीचड़ पालना
कमल की सुरक्षा के लिए नहीं
अपनी सुविधा के लिए है
जिससे उसे
अपने भरे होने का एहसास होता है।
मैं सागर का मोती
बनना नहीं चाहता
जिसे कोई निहायत अकेला समझ
अपना प्यार-परोपकार सौंप दे।
मैं चकवा-चकवी के नाटक
या कि नियति का शिकार हूं
मगर
रात जाने से इनकार कर रही है।
मैं बुझना नहीं चाहता
क्योंकि किसी के सामने
अंधेरा फैल जाने का खतरा है।
मुझे जलने का शौक नहीं
जिस पर पतिंगे
अपनी जान देने लगें
मैं भ्रमर और फूल
पतिंगे और दीपक के
व्यभिचार में भी शामिल नहीं होना चाहता।
गुलाब की खुशबू भी नहीं
कि हर कोई अपनी ऐयास
कामनाओं को अंजाम दे।
यार, तुमने मुझे
कनेल का फूल बनाया है न !
तो सुनो
मैं जा रहा हूं
तुम मुझे
किसी देवता के माथे पर न चढ़ाना
संभव हो तो
अपनी बेड़ी में उलझा लेना
मैं रहूंगा उलझा
तुम्हारे मानस की पहेलियां
सुलझाते हुए
खुशबुओं की व्यर्थता
समझाते हुए।



33   

भविष्य का आईना
आईने में चेहरा मेरा
धुंधलका, बहुत धुंधलका
गड्डमगड्ड तस्वीरें सिरजते हुए।
दिखता है-
एक जलती हुई आग
उस पर पानी उलीचते लोग
जिनकी आंख और पंजे
बिल्लियों-से हैं।
आग पर आरोप है कि
वह सुकरात हो गयी है।
देखता हूं-
हंसों का जोड़ा
बिंधने को है
बहेलिये के तीर से
पर कोई बाल्मीकि
प्रकट नहीं होता।
दो पाटों के बीच
एक बेगवती नदी
जिसे बांध बना
घेर दिया गया है।
जंगल के खामोश आंगन में
शिकारियों के दल ने
घेर लिया है
एक वन्य जोड़ा
कुछ देर बाद
उसी आग में
उन्हें झोंक दिया गया।
जोड़ा और आग
मजबूर हैं
जलने और जलाने के लिए

34

एक शाम न मिला
जिन्दगी निःसार बन
कमर कस खड़ी हो गयी।
क्या है फासले में
कि युग खड़ा हो जाता है !
लोग कहते हैं-
'उसे इस जन्म में भूल जाओ'
समझी जा सकती है
युगों की बारंबारता
सांप और मणि की बेचैनी।

शाम को कह दो
तारों को भूल जाए
तब कैसी होगी
रात की भयावहता !
तारे विहीन रात
बादलों की बिजलियां
सह सकेगी !
नदियों का आलोड़न
शांत कर देगी !
सूरज को कह दो-
रात को गरमाहट देना
बंद कर दे
त्यक्ता धरती
बनी रह पायेगी संयम की मूरत !
सुहाग विहीन धरती
विधवा सी
अलसाई-कुम्हलाई
जब प्रियतम से
खिलखिलाना बंद कर देगी
थिरकनों में लग जाएंगी बेड़ियां
तब
रोक पाएगा कोई विप्लव !
'इस' और 'उस' के
बंधन से बंधे हैं हम
न अधिक और
न ही कम।

 

35

लड़के ने प्यार किया
जिन्दगी उसके नाम किया
दोनों के अपने जानते थे सब।
एक दिन
लड़की ने
प्यार करने से इनकार कर दिया।
फोन, बात-चीत
मिलना-जुलना
सब बंद।
लड़का दरका, टूटा, घुंटा
कई दिन, कई रात
कई पांख, कई माह
वह न मिली।
लड़के ने लौटा दिये
सारे के सारे तोहफे
जन्मदिन का लैंप
त्योहारों के कपड़े
छोटे-छोटे डिब्बों में
सहेजे गये गृहस्थी के सामान
सुनहली घड़ी
सपनीले क्षणों में खींची गयी तस्वीरें
डायरी, कलम
प्रेम की कविताएं
किताबों में छिपा कर भेजे गये
अब सूख चुके गुलाब के फूल
और भी बहुत कुछ
जो वस्तु के रूप में
प्यार लेकर आयी थीं।

लड़का फिर भी परेशान
बेचैन, उखड़ा-सा हरदम
नोंचकर आत्मा की बेचैनी
फेंकने के लिए हब्तुलखवास।
फिर भी
न लौटा पाया
मुस्कानों की महकती यादें
पेड़ की छांव तले
साथ बिताने के वादे
गोंद में सिर टिका
यूं ही मर जाने की कल्पना
सूखी रोटी बांट कर खाने में
अमृत का स्वाद
मंदिर के सात फेरे
जिसे उनने चुपके से घूमे थे।
कैसे तो स्कूटर पर
धार-धार बरसात में
तेज रफ्तार दौड़ती हसरतें
छुअन में तन-मन का हल्कापन
वज्रघाती चिंताओं का
एक अधरस्पर्श से बेनिशान हो जाना
सज-धज रोज बाट जोहती
एक गुड़िया।

लड़का अब
रोज कलपता है
लड़की को वाइब्रेशन
बेचैन नहीं करता।
उसे सांकलों की पुकार
अब सुनाई नहीं देती।
लड़का जानना चाहता है
क्या हुआ, क्यों हुआ का कारण।
एक दिन
किसी ने बताया
लड़की अब
अपने माता-पिता
रिश्तेदारों को वही प्यार
बड़े प्यार से बांट रही है।
   

36

प्रेम आदमी का
विश्वसनीय है ?
और कुत्ते का ?
आदमी के प्रेम में
कहीं न कहीं
एक सूरत और क्षमता का
आकर्षण होता है
इसकी क्षीणता के साथ
मरने-जीने का बर्फ
क्रमशः पिघल कर
पानी हो जाता है।
कुत्ते के प्रेम में
सूरत मायने नहीं रखती
पूंछ कटे कुत्ते भी
पाले जाते हैं
बूढ़े हों
या जवान
कौरे डाले ही जाते हैं।

   

37

साथ जीने मरने के वादे गये
पास रहने से दूर ज्यादे गये।

    खिलौना जो होते तो तोड़ सकते थे तुम
    दिल सीसे का होता तो फोड़ सकते थे तुम
    पिघला कर फिर से आईना बना लेते हम
    मगर अब तो दिल रखने के भी इरादे गये।

सांपों को भी देखा है प्यार करते हुए
निष्ठुरों को भी देखा है दर्द हरते हुए
एक पत्थर से भी प्यार कर लेते हम
इसलिए पीठ मेरे पे पर्वत ही लादे गये।


    मैं हवा था, तुम कली, आमने-सामने
    मैं डिगा ही था कि तुम बढ़ी थामने
    एक छाया-सा था सदा घूमता हुआ
    अब मगर धूप से हम नवाजे गये।


38

तुम यदि पतझड़-सा
करते मजाक तो
मैं रूठता
वृक्षों की तरह।
कम से कम
नई कलियों की संभावना
और बसंत की उम्मीद
तो कायम रहती।
पर नहीं
तुम हवा भी बनना ठीक न समझे।
तूफानों-से आये
शोर, धुआं, कोलाहल फैला
एक अदना छप्पर तक उड़ा ले गये
बिखर गये सब
सिहर गये सब।
बताओ फिर आये ही क्यों ?
चलो ठीक किये
तो दरवाजे तक ही रहते
मेहमानों की तरह।
तुम तो
आंखों के रास्ते
दिल के आंगन में घुसे
देखते ही देखते
पूरा घर हो गये।
और चले गये
इसीलिए न कि
तुम खेलने आये थे
पूरा हुआ और विदा हो गये।
फिर क्यों कहे हमसे
कि तुम सागर बनो
नदियों का आश्रय
धरती का संतुलन
तुममें हो जिंदगी की उत्ताल तरंगें
समता कभी न हो भंग।
भाई मेरे
क्या तुम्हें मालूम ?
समंदर भी
पूनो का चांद देख
खो देता है अपनी मर्यादा।
क्यों नहीं बने तुम मेरी लहर
अचानक बन गये अलग ही शहर ??

 

39

फासलों में भी रहकर हम
मुहब्बत की नजदीकियां नापते हैं रोज
जिस नफरत से अलग हुए थे
उस जहर का पैमाना मापते हैं रोज।

अल्हड़ बचपन में क्या समझता
जवानी किस राह गुजरेगी
सहरा से भरे बाजार पहुंचकर
अतीत के किस्से हम पढ़ते हैं रोज।

दिल दरिया आग का, आंखों में खून
लिए कब तक ढोते रहेंगे मेरे दोस्त
जबकि हमारी मुहब्बत के चर्चे
शहरों में अलग-अलग होते हैं रोज।

गुमशुम हवाएं बता गयीं चुपके से आज
तेवर बदल गये हैं इमारत में जनाब के
उन पखेरुओं को पकड़ेंगे शाम तक जाल
हम भी तिरने के तरीके बदल रहे हैं रोज।

दोपहर की चिलकती धूप होती है कभी
तो कभी शीत लेकर आती है ठंडी तूफान
पर जिगर में जिद ऐसी मची है कि
हर शहर में तुम्हें बेवजह खोजते हैं रोज।

चेहरा-चेहरा ढूंढ रहा तुमको कब से
हवा के बाद तूफान बन लौटे हो जब से
पतझड़-से ही पास रहते जो तुम
बिजलियों से यूंही न कांप उठते रोज।


सोचता हूं क्या होगा उस दिन जब
तुम दिखोगे अचानक मेरे सामने
पहले-सा मुंह फेर चल पड़े राह अपनी
सांस हमेशा को थम जाएगी उस रोज।

चांद भी गर कभी गोद आकर मिले
पूछेंगे सलीके-से उस राज की बात
जिस बूते आ पड़े हो यहां इस तरह
उसकी आंखों के सामने टिक पाये थे उस रोज ?


    44

अंतहीन प्रेतयात्रा-


नहीं, तुम्हारी आंखें
हमें कभी शरबती नहीं लगीं
होठों पर
मदिरालय नहीं पाया
उरोजों से आमंत्रण भी नहीं
गदराए देह से कभी न बौराया।
वह सब हमने नहीं देखा
न ही तुम्हें पहली बार देख
अपना भला चंगा होश गवांया।

सच तो यह था कि
तुम्हें देखने के बाद ही
मुझे होश हुआ।
अब तक की व्यर्थता पर
बेहद अफसोस हुआ।
उस दिन सच में
निर्जन वनस्थली का पावन आश्रम
करोड़ शंखों से पहली बार गूंजा
यज्ञलीन तपस्वी की तंद्रा टूटी
गगनमंडल से देवगण
सुरभित प्रसून बरसाये
भूत भावन ने नर्तन किया
सांसें कीर्तन हो गयीं
घंटा घ्वनि से रोम-रोम पुलकित हुआ।
मधुर दीपित वर्तिका के
प्रकाश में खूब नहाया।
वाह्य संसार के सभी संगी
जल, थल, वायु, नभ, आग
वन, झील, पहाड़, फूल, त्रिशूल
कंकड़-पत्थर, कांटे-फूल
सबने मान सरोवर में डूब
खूब नहाया
जबर्दस्त पतझड़ के बाद
फाग गाया।
वासंती हवाएं दुल्हन-सी आयीं
मंगल गीत गायीं
यज्ञ धूम से
म्ेरी आत्मा नहलायीं।
मैं स्वतः तपःमूर्ति हो गया।
हृदय लोक बज उठा।

हां, तभी से शुरू हुई
मेरी चेतन यात्रा।
बचपन से हब्तुलखवास
अतृप्त चेतन
चलते-दौड़ते-फांदते
गिरते, ढहते, बहते
सबके कहर सहते
टुकड़े-टुकड़े को सिहकते
पता नहीं कब फुटपाथ हो गया था-
स्याह, रौंदा हुआ, बेजान।
सच, बहुत थक गया था
बल्कि एक नफरत बन गया था
और उसी को तोड़ने में
कितना ज्यादा टूट गया था।
हां, मैंने पढ़ी थी
हर चेहरे पर पलती आत्मीयता
उसके पीछे की असलियत
सब मालिक थे
मैं उनकी इकलौती मिल्कियत।
आखिर कितने चोचलें
सह सकती हैं मिल्कियतें।
सुना है कि वे एक सीमा के बाद
वे भी छोड़ देती हैं घर
अपने, पराए-सभी को।
तब जिन्दगी जिद हो गयी
आवारगी की मुरीद हो गयी।

लेकिन नहीं
उसी दिन
पहली बार जाना कि
मेरे जीने की सार्थकता
और आवश्यकता
चुपके से
पूरी तबियत से
आयी है मेरे पास।
लेकिन तब भी नहीं कह पाया तुमसे
पहले की तरह कुछ भी।
निरर्थकता बोध का पहाड़
अचानक थोड़े ही टूटता है!
पर वक्त के साथ
पहाड़ दरका
झील फूटी
और कूद कर
मंजिल के रूप में
सामने खड़ी हो गयी।

अब कहोगी तुम-
'फिर कैसे शुरू हो गयी देह यात्रा ?'
तो सुनो
देह ही जाती है देवता के पास
ढोते हुए आत्मा की आस
और बिछा देती हैं संपूर्ण स्वत्व।
तभी तो नहा पाती है आत्मा !
सुरति के बाद निरति
फिर एकाकार!
एक अस्तित्व!
एकरूप, एक तत्व!

वरना कितनी ही देहें
घिसे हुए ब्रस-झाड़ू
टूटी कनस्तर
झड़े हुए पलिस्तर
चुघलाए हुए पान की पीक
बल्कि एक कंडोम की तरह
फुटपाथ पर
अपने विसर्जन की
प्रतीक्षा कर रही हैं।

अब जबकि
इत्ते साल बीत गये
देह का फूल
पौधे में ही सूखने लगा हो
फिर भी
आत्मा आज भी निरत है
आईने में एक आकृति
अड़ी हुई है
हर शब्द अनहद बन
नहला जाता है रोज
हर मान में
प्रकृति का परिवर्तन
हास में समंदर की
पूनमी मचलन
कायम है
तब भी!
तब भी नहीं हुआ तुम्हें विश्वास !!
सारी रोशनी समेट चल दिये !!!
इस आत्मा को प्रेतात्मा बना दिये !!!!

देखो फिर भी यह
प्रेतात्मा खोज रहा है तुम्हें
हर सड़क, गलियारा
हर चांद, हर तारा
श्मशान और मंदिर
सेज और दरख्त
हास और रुदन-
        सब में।
रोज मौसम बदल रहे हैं
मौसम के मिजाज भी
शीत-ताप
बर्फ और भाप
प्रेतात्मा खोज रही है
अपना महामिलन
हिकारत और सांसों की गति
ज्वार-भांटे का उत्साह
हिमालय की ऊंचाई
अपने अस्तित्व का परमाणु।

तुम्हीं ने कहा था तब-
    'तुम हो राम की प्रत्यंचा
    भाषा का अनाहत प्रवाह
कलम का सिपाही
सीता की आस्था
श्रद्धा का विश्वास
रुदन का हास'
और भी बहुत कुछ
लगातार शरमाते हुए।
देखो आज वह है
एक प्रेतात्मा
यकीन नहीं है !
तो ढूंढो उसे
पाओगी रोज
वह तुम्हारे दरवाजे पर भी
रात में चुपके से आता है
हृदय की सांकल खटखटाता है
हवा की मानिंद
घर में घुस जाता है
हर सेज
सेज पड़े चेहरों को
बड़ी गौर से झांकता है
लगातार चीखते हुए वह
घर-बाहर
शहर-वन प्रांतर
तन-तन, मन-मन
पृथ्वी-गगन
पंचतत्वों में
लगातार विलीन होते हुए
आकाश की पीड़ा
रोज तुम्हारी धरती को
सुना जाता है।

---

डा0 रमाशंकर शुक्ल
पत्रकारिता, साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में एक परिचित नाम।
चार मई 1971 को मीरजापुर जनपद (उत्तर प्रदेश) के एक समीपस्थ गांव रायपुर पोख्ता में एक सामान्य परिवार में जन्म।
समसामयिक विषयों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगातार बेबाक लेखन।
'ईश्वर खतरनाक है' के बाद दूसरा यह दूसरा काव्य संग्रह। 'ब्रह्म नासिका' और 'नरक में शंकराचार्य' उपन्यास प्रकाशनाधीन। 'प्रेमचंद के उपन्यासों में संवेदना' और 'रसाल व रत्नाकर की ध्वनिमीय तुलना' समीक्षा पुस्तकें प्रस्तावित।
संप्रति : स्वतंत्र पत्रकारिता, साहित्य लेखन के साथ ही ए0एस0 जुबिली इण्टर कालेज, मीरजापुर में हिन्दी अध्यापक।

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