सोमवार, 17 सितंबर 2012

कामिनी कामायनी की कविताएं

1 प्रहरी देश के

माँ सीमा का तूफान

खतम कब होगा ।

माँ मिलकर दोनों

एक वतन कब होगा।

क्यों व्यर्थ सजा रखा है

घर हथियारों से

माँ इनके दिल में प्यार

जमा कब होगा

दिन रात खड़े हैं

पत्थर में तूफानों में

माँ इनके संग इन्साफ

कभी क्या होगा

न होली दीवाली

न क्रिसमस न ईद

माँ इनके घर त्योहार कहो कब होगा ।

 

2 अपराधी कौन

छोटी छोटी

मैली हथेलियों को

फैला कर

महानगरों की चौराहों पर

भिन्न भिन्न चीज बेचते

ये बच्चे

बेच रहे हैं सामान

अपना बचपन

या

मांगते हुए भीख

कर रहे हैं अट्टहास

वीभत्स भविष्य का

उड़ाते हुए मजाक

करतब

कलाबाजियाँ

दिखाते

ये जिमनास्ट

कर सकते थे

शायद ओलंपिक में नाम

अगर नजर पड़ती इनपर

किसी कोच का मगर हाय़

पेप्सी और चिप्स के साथ

गुटका का भी लत है इन्हें

यह जनम देने वाली

वह औरत भी जानती हैं

जो जन्म तो देती है

पर माँ नहीं होत़ी

माँ तो पालना होती ह़ै अपने लाल क़ी ।

प्यार उसके हृदय में नहीं होता

ममता नहीं होता

जो पैदा करने के बाद

उन्हें रोटी के लिए

कुत्तों से लड़ने के लिए

खुले में पटक देती है

और वह पुरूष

जो

हक तो जताता ह़ै पर

पिता नहीं होता

पिता तो छतरी होता है बच्चों का।

मारता है बाप

मगर भरता नहीं है

पेट की ज्वाला

और

ये भागते हैं इधर उधर

भरने के लिए

विशाल गह्वर

बचने के लिए सत्य से

मजबूरन

पशुओं की तरह

स्वछंद़

लड़ने और हिंसक होने के लिए ।

 

3

जरा सोचो तो ।

अगर हम अपने देश को

पूरा शिक्षित बना लें

तो कितना महान होगा

वो भारत

जरा सोचो तो ।

यदि हम अपने देश को

बीमारी से मुक्त कर दें

तो कितना महान होगा वो भारत

जरा सोचो तो ।

यदि हम अपने देश को

गरीबी से निकाल लें

वो भारत कितना महान होगा

जरा सोचो तो

यदि हम अपने देश को

सत्य और अहिंसा के

रास्ते चला कर

और भी शक्तिशाली बनायें तो

कितना महान होगा भारत

जरा सोचो त़ो ।

 

4 कर्ण उवाच

अहा

सुहृदय

मीत

वह मेरा एक सखा है

संकट में जिसने जग में

मेरा अभिमान रखा है ।

माना

मेरे बल पर वह फुंफकार रहा है

समर भूमि में लाने को ललकार रहा है

युद्ध सदा अभिशाप रहा है मानवता का

यह तो नंगा नृत्य रहा है दानवता का ।

भड़केगी जब आग दिशाएं सहम सहम कर

त्राहि त्राहि कर जायेगी ब्रह्मा के घर पर ।

इस कलंक का टीका मेरे सिर पर होगा

आने वाला कल मुझपर ऊंगली रखेगा ।

छोड़ दॅू खल का साथ तो

युद्ध भी टल जायेगी

धरती शोणित से लाल

होने से बच जायेगी ।

मगर मैं छोडॅू कैसे

कृष्ण

कहो तुम उसको

दूं कैसे आघात

मैं अपने दुर्योधन को ।

अब जो हो अंजाम

मैं धोखेबाज न हूंगा

तात

दोस्त का साथ

मैं मरते दम तक दूंगा ।।

--

कामिनी कामायनी ।।

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