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October 2012
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वक्‍त के साथ गुम होते बहुरूपिया

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(दूसरों को हंसाने वाला खुद गमगीन)

किसी ने सही लिखा है कि इंसान को यदि जिंदगी में कामयाब होना है तो आम जिंदगी में एक कलाकार की तरह अभिनय करें। बचपन में तो हमने उन्‍हें अकसर देखा है पर अब वो कहीं नजर नहीं आते। गांव हो या शहर कभी कभार ही उनके चेहरे दिख जो है जिन्‍हें लोग प्‍यार से बहुरूपिया कहा करते हैं। बहुरूपिये कभी लैला-मजनूं, कभी सन्‍यासी, कभी पागल, कभी शैतान, कभी भगवान शंकर, कभी डाकू, कभी नारद जैसे कई किरदारों को बखूबी निभाते हैं। कहा जाता है कि नायक और खलनायक का रोल कभी एक व्‍यक्‍ति द्वारा नहीं निभाया जा सकता है। यह सब फिल्‍मों में कभी कभार ही नजर आते हैं पर बहुरूपिये इस मिथक को पूरी तरह झुठला देते हैं यह कई किरदारों को इस तरह प्रस्‍तुत करते हैं कि कुछ क्षणों के लिये लोग उसे सही समझ बैठते हैं। कई तरह के किरदारों का स्‍वांग रचने वाले आज के आधुनिक और तेजतर्रार युग में गुम से होते जा रहे हैं। दूसरों को हंसाने वाले ये किरदार दो जून की रोटी की खातिर लोगों के दिल को तो बहला देते हैं, स्‍वयं भीतर से कितने टूटे हुए है इसको यह व्‍यक्‍त नहीं कर पाते। लगी मोहल्‍लों में नारायण नारायण की रट लगा कर नारद के किरदार को निभाने वाले ये लोग दो जून की रोटी के लिये खुद की खुशियों की बली दे देते हैं। घर घर में चैनलों की मार और समाज में आधुनिकता का मिश्रण ने इस कला को वक्‍त की परतों में गुम होने के लिये मजबूर कर दिया। बहुरूपिया भले ही वास्‍तविक किरदार न हो पर एक दौर था जब भारत में इन कलाकारों की बड़ी अहमियत हुआ करती थी। फिल्‍म मेरा नाम जोकर का गीत जीना यहां मरना इसके सिवा जाना कहां गीत के बोल में एक जगह पर बहुरूपियों पर भी प्रकाश डाला गया है।

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बहुरूपिया, भांड और नक्‍काल लोकजीवन में मनोरंजन के मुख्‍य अंग है। कई प्रकार के स्‍वांग बनाकर अपने हाव भाव, वाकपटुता और कला कौशल में से लोगों का मनोरंजन करते रहे हैं। राजाओं, नवाबों, जागीरदारों, सेठ साहूकारों के अलावा, जनसाधारण का भी इन्‍हें संरक्षण प्राप्‍त होता था। बड़ी से बड़ी बातों को यह साधारण मनोरंजक ढंग से प्रकट कर वास्‍तविकता उजागर कर लोगों का ध्‍यान आकर्षित करते थे। टी.वी. सिनेमा और मनोरंजन के अन्‍य आधुनिक साधन होने के कारण अब ये लोक कलाकार कम ही दिखाई देते हैं।

बहुरूपिये प्रायः घुमक्‍कड़ होते हैं। इनके जीवन पर अनेक लेख लिख चुके लेखक देवी सिंह नरूका का कहना है कि-एक स्‍थान पर कुछ दिन रहकर फिर दूसरे नगर व कस्‍बे में चले जाते हैं। राजा रईसों व नेताओं की बदसलूकी, विलासिता और फिजूलखर्ची आदि पर ऐसा तीखा व्‍यंग करते हैं कि लोगों को वास्‍तविकता से साक्षात्‍कार करने को विवश होना पड़ता है। इन भांडों के कई किस्‍से मशहूर है। एक बार कुछ सिपाही किसी नक्‍काल को पकड़ कर बादशाह के सामने ले गए। उसकी शक्‍ल देखकर बादशाह ने कहा किस मनहूस को पकड़ कर ले आए मालूम नहीं खाना भी मिलेगा या नहीं, ले जाओ यहां से और कल सुबह इसे फांसी पर लटका देना। नक्‍काल ने यह हुक्‍म सुनकर बादशाह से कुछ अर्ज करने की इजाजत मांगी। बादशाह से इजाजत मिलने पर नक्‍काल ने कहा हुजूर मेरी शक्‍ल देखने से आपको केवल खाने की फ्रिक्र हुई किंतु आपकी शक्‍ल देखने से मुझे तो फांसी की सजा का हुक्‍म हो गया। नक्‍काल की बात सुनकर बादशाह को हंसी आ गई और उसे माफ कर दिया। किसी ठाकुर के यहां जलसा था, उसमें नक्‍कालों को भी बुलाया गया था। अन्‍य मेहमानों के लिए तो कई प्रकार के पकवान बनाए गए किंतु नक्‍कालों को रोजाना ही रोटी और कढ़ी दी गई। दो दिन तक तो उन्‍होंने कढी-रोटी खाई किंतु तीसरे दिन कढी न खाकर एक बर्तन में भरकर रख ली। जब उन्‍हें अन्‍य मेहमानों के सामने बुलाया गया तो वहां जाने से पहले उनने अपने बदन पर कढ़ी का लेप कर लिया। सबके सामने जब पूछा गया तो यह क्‍या हुआ ? तब नक्‍कालों ने जवाब दिया कि तीन से समारोह में लगातार कढ़ी खा रहे है वह अब बदन से फूट फूट कर निकल रही है। यह सुनकर ठाकुर झेंप गए और उनके लिए भोजन की व्‍यवस्‍था की।

चिराग अली किसी थाने के बड़े अफसर थे। भांडों के तमाशे में वह भी बैठे थे। भांडों ने क्रम से वहां बैठे लोगों का नाम पूछना शुरू किया। जब एक भांड ने चिराग साहब का नाम लिया तो दूसरा भांड बोला, उस उल्‍लू के पट्‌ठे चिराग को लगाओ सौ जूते, हुजूर का नाम तो आफताब (सूर्य) होना चाहिए। सब मौजूद लोग खिलखिलाकर हंस पड़े। एक शहर में कुछ नक्‍काल बैठे हुए थे उनसे एक बादशाह की पोशाक में और दूसरे दरबारियों के रूप में बैठे हुए उनकी खिल्‍ली उड़ा रहे थे। शहर में गश्‍त लगाते हुए सिपाहियों ने जब ये देखा तो उन्‍हें सहन नहीं हुआ। इन सब को गिरफ्‍तार कर बादशाह के सामने ले गए और कहा कि हुजूर यह सब बाजार के बीच में आपकी और दरबारियों का मजाक उड़ा रहे थे  इस गुस्‍ताखी के लिए इन्‍हें सख्‍त सजा दी जाए।

बादशाह ने कहा मामला गंभीर है किंतु जिस तरह ही मजाक वे बाजार में कर रहे थे, वह यहां भी करके दिखाएं। नक्‍काल कांप गए कि अब खैर नहीं न जाने बादशाह कितनी कडी सजा देंगे। यह सब करने को हिचकिचा रहे थे किंतु बादशाह का हुक्‍म टालने की हिम्‍मत किसमें थी।

आखिरकार उन्‍हें उसी तरह का मजाक उड़ाने का नाटक बादशाह के सामने भी करना पड़ा। बादशाह उनकी कला से प्रभावित हुआ और सजा देने के बजाय इनाम देकर बिदा किया।

विवाह आदि अवसरों पर मनोरंजन के लिए इन्‍हें बुलाया जाता था। कुछ भांड व नक्‍काल सभी वेशभूषा में नाच गाकर भी मनोरंजन करते थे। इस तरह की हाजिर जवाबी और स्‍पष्‍टवादिता इन कलाकारों की विशेषता है।

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रहीम खान

पत्रकार

गुजरी चौक, भरवेली

बालाघाट (म.प्र.)

मो. 09301210541

कंडे का कंडा

जानवर मनुष्य

ब्रह्मा जी ने आदेश दिया कि एक महीने के बाद मनुष्य बनाने का काम बंद कर दिया जाए। देवता जल्दी-जल्दी जानवर बनाए जा रहे थे। ब्रह्मा जी उनके पास बैठे थे। जानवरों के अंगों के ढेर लगे पड़े थे। देवताओं ने पूछा, ‘‘ब्रह्मा जी, हम मनुष्य बनाना क्यों बंद कर रहे हैं?’’

ब्रह्मा जी बोले, ‘‘एक मनुष्य को बनाने के लिए एक हजार जानवरों जितना समय लग जाता है। ये मनुष्य नीचे जाकर जानवरों को खाने लगते हैं। हमारा नरक वाला हिस्सा पूरी तरह भरने वाला है। कुछ देर तक यह मनुष्यों से भर जाएगा। इससे पहले कि यह भर जाए मैं दुनिया का नए सिरे से सृजन करूंगा।’’ अब देवता चुप थे

 

ड्यूटी

‘‘रीना आज फिर तुम 2 घंटे लेट आई हो। मेहता साहब बहुत गुस्से में हैं। तुझे कैबिन में बुलाया है। जल्दी जा कहीं नौकरी से हाथ न धो बैठना।’’ भानू प्रसाद ने कहा।

‘‘मे आई कम इन सर?’’

‘‘कम इन। तुम 2 दिन दफ्तर क्यों नहीं आई?’’

‘‘सर, मेरी मां बहुत बीमार है, मैं इसलिए नहीं आ सकी।’’

‘‘बहुत बढ़िया बहाना है, आज 2 घंटे लेट होने का बहाना। तुम कोई और नौकरी तलाश करो। तुम ड्यूटी को ड्यूटी नहीं समझती।’’ मेहता साहब गुस्से में सामने खड़ी रीना को कह रहे थे।

‘‘सर, मेरी 2 छोटी-छोटी बहनों तथा बूढ़े मां-बाप का क्या होगा? मुझे नौकरी से मत निकालिए। यदि मुझे नौकरी से निकाल दिया तो हम सब किस के सहारे जीएंगे?’’

‘‘मेरे सहारे।’’ मेहता साहब ने शैतानी हंसी हंसते हुए कहा।

रीना दिन की बजाय अब रात की ड्यूटी पर आने लगी थी। उसे अब ड्यूटी का वास्तविक अर्थ पता चल गया था। अब मेहता साहब को रीना से कोई?शिकायत नहीं थी।

शक्‍ति या रोग

झारखंड़ के बोकारो जिला में एक गांव है बालीडीह जहां हर साल दशहरा के नौंवी पूजा के दिन जितनी भीड़ माँ दुर्गा के मूर्ति के पंडाल के पास होती है उतनी ही भीड़ बालीडीह गांव के कुर्मीडीह मोहल्‍ले में मालती देवी के घर के सामने भी होती है क्‍योंकि स्‍थानीय लोग मालती देवी को माँ दुर्गा के अनन्‍य भक्‍त के रूप में देखते हैं और उसके द्वारा दुर्गा माँ से मनौती पूरी कराने की आकांक्षा रखते है। पचास वर्षीय मालती देवी को स्‍थानीय लोग सैकड़ों बकरों का खून झूम-झूम कर पीने वाली दुर्गा माँ की भक्‍तिन के नाम से पुकारते हैं और हर साल की तरह इस साल भी नवमी पूजा के रोज मालती देवी एक के बाद एक बलि चढ़ाये गए लगभग सौ बकरों का खून झूम-झूम कर पीती रही जिससे उसका चेहरा और शरीर भी लाल हो गया था और उसके घर के सामने मेला जैसी भीड़ लग गयी थी। पूछे जाने पर स्‍थानीय लोगों ने बताया कि मालती देवी ऐसा प्रत्‍येक साल करती है। मालती देवी को लोग भूत-पिशाच मारने वाली या बुरी आत्‍माओं से लोगों को मुक्‍ति देने वाली दुर्गा माँ की भक्तिन के नाम से पुकारते हैं। मालती देवी के समर्थन में बोलने वालों का कहना है कि सप्तमी के दिन से ही मालती देवी पर माँ दुर्गा सवार होने लगती है और मालती देवी अचानक बांस के बल्‍लियों पर चढ़ना, झूम-झूम कर नाचना, बालों को खोल कर तरह-तरह की शक्‍ल बनाना, कुछ मंत्रों जैसा उच्‍चारण करना आदि हरकतें शुरू करती है। मालती देवी के घर पर माँ दुर्गा का मंदिर स्‍थापित है। न सिर्फ स्‍थानीय लोग वरन्‌ आसपास के इलाकों से आए लोग मालती देवी के घर पर स्‍थापित मंदिर में मनौती मांगते हैं और मनौती पूरी हो जाने पर नवमी पूजा के दिन बकरे की बलि यहां चढ़ाते हैं। प्रत्‍येक वर्ष यहां लगभग सौ बकरों की बलि होती है। बकरे की बलि मालती देवी का पुत्र राजेश खुद ही अपने हाथो से देता है और मालती देवी के पति गिरधारी ठाकुर सहित परिवार के सभी सदस्‍यों के अलावा उसके पास-पड़ोस के लोग भी समर्थन देते हैं।

उल्‍लेखनीय है कि बंगाल से सटे होने के साथ-साथ झारखंड़ राज्‍य में माँ दुर्गा के रौद्र रूप की भी पूजा होती है। नवरात्रा में माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है जिसमें माँ कालरात्रि की पूजा तंत्र-मंत्र, श्‍मशान पूजा, आदि से भी जुड़ा होता है। माँ दुर्गा की पूजा में बकरे की बलि भी दी जाती है और मान्‍यता है कि बलि के दौरान बकरे का सर धड़ से एक बार में अलग हो जाना चाहिए अन्‍यथा माँ रूष्‍ट हो जाती है। बलि देने के तरह-तरह के रूप यहां प्रचलित है जैसे संथाल परगना में बुढ़ई एक गांव है जहां बकरे को गोद में उठाया जाता है और तलवार के एक वार में बकरे का सर धड़ से अलग हो जाता है और सर कटा धड़ व्‍यक्‍ति के गोद में रह जाता है। यहां भी सैकड़ों बकरे की बलि दी जाती है। रामगढ़ जिला में स्‍थित रजरप्‍पा में माँ छिन्‍नमस्‍तिष्‍का का मंदिर है जहां सैकड़ों बकरे की बलि दी जाती है और यहां की विशेषता यह है कि बलिवेदी के इर्द-गिर्द फैले खून पर एक भी मक्‍खी नहीं भिनभिनाती है। संथाल परगरना प्रमंडल में स्‍थित पथरौढ़ में माँ काली का मंदिर है जहां बकरों की बलि दी जाती है और यह मान्‍यता है कि माँ के मूर्ति पर चढ़ाए गए किसी व्‍यक्‍ति द्वारा फूल अगर उसके सामने गिर आता है तो उसकी माँ से मांगी मुराद पूरी हो जाती है। पौराणिक मान्‍यताओं से भरा पड़ा है झारखंड़ की धरती।

कहते है कि धर्म अफीम की तरह होता है जिसका इस्‍तेमाल चालाक अपने-अपने फायदे के लिए करते हैं। जहां तक मालती देवी का प्रश्‍न है तो इसमें कोई दो मत नहीं उसके इस ऊल-जुलूल हरकत करने के पीछे उसके परिवार के समस्‍त लोगों के साथ-साथ स्‍थानीय लोगों का उसे भरपूर साथ प्राप्‍त रहता है लेकिन माँ दुर्गा मालती देवी पर सप्‍तमी से सवार हो जाती है यह मानना पागलपन है जो यहां के स्‍थानीय और आसपास के लोगों द्वारा माना जाता है। इस संदर्भ में मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसी हरकत करने वाले लोग एक तरह के मनोवैज्ञानिक बीमारी साइकोशिस एवं सिकोमेरिया से ग्रसीत रहते हैं। रांची के प्रसिद्ध मनोचिकित्‍सक डा. नीरज राय से मालती देवी के अजीबोगरीब स्‍थिति की चर्चा करने पर डा. राय का कहना था कि व्‍यक्‍तित्‍व विकृति की एक सामान्‍य विशेषता कुसमायोजी शीलगुण है जिसमें शीलगुणों जैसे सामाजिकता, अहमशक्‍ति, अधिपत्‍य, लज्‍जा आदि की अभिव्‍यक्‍ति समायोजित ढ़ंग से करने में रोगी समर्थ नहीं होता है। एक उदाहरण देते हुए उन्‍होंने कहा कि यदि व्‍यक्‍तित्‍व विकृति से ग्रसित रोगी में कपटी होने का शीलगुण हो तो वह हर परिस्‍थिति में अपने इस शीलगुण को उपयोग में लाने का प्रयास करता है चाहे उसके इस व्‍यवहार से उसको जितनी भी हानि हो। इस विकृति से पीड़ित व्‍यक्‍ति विषय पर सामान्‍य मार्ग से हट कर चिन्‍तन करता है तथा उसके चिन्‍तन प्रतिरूप में दृढ़ता देखी जाती है। अपने व्‍यवहार को उसी रूप में दुहराता रहता है। ऐसे व्‍यवहार करने से हानि पहुंचाने पर भी वह इसको बार-बार दुहराना नहीं छोड़ता है। इसका अर्थ यह है कि इस विकृति से पीड़ित व्‍यक्‍ति अपने व्‍यवहार, चिन्‍तन एवं प्रत्‍यक्षण-प्रतिरूप, अपने व्‍यक्‍तिगत मूल्‍यों में परिवर्तन लाने के पक्ष में नहीं रहता है परिणामस्‍वरूप उसके व्‍यवहार एवं विचार दृढ़ बने रहते हैं। इस बीमारी से ग्रसित लोग में विभिन्‍न व्‍यक्‍तित्‍व पाये जाते है जिसके कारण उनमें किसी प्रकार की समानता का अभाव रहता है।

ज्ञात हो कि बहु-व्‍यक्‍तित्‍व के संबंध में जो राय डा. राय ने दिया वह मालती देवी पर अक्षरशः लागू होता है। दुर्गा पूजा के दौरान मालती देवी में एक दुसरे व्‍यक्‍तित्‍व का विकास सप्‍तमी पूजा से ही हो जाता है जो यह समझता है कि माँ दुर्गा उसपर सवार हो जाती है। सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह है कि ऐसी मनोवैज्ञानिक बीमारी से ग्रसित है मालती देवी यह उसके परिवार के साथ-साथ स्‍थानीय लोग मानने के लिए कतिपय तैयार नहीं है। सामान्‍य मार्ग से हटकर मालती देवी बकरों का खून पीने की अभ्‍यस्‍त हो चुकी है। बांसों के बल्‍लियों पर चढ़ना, झूम-झूम कर गाना, नाचना आदि मालती देवी ने उस वातावरण और परिस्‍थितियों से सीख लिया जो अंधविश्‍वास से वशीभूत होकर ओझा-तांत्रिक माँ दुर्गा के नाम पर कभी सुनसान में स्‍थित मंदिरों में, कभी श्‍मशानों में, कभी किसी सुनसान जगहों पर स्‍थित हवेलियों या खंडहरों में करते रहे हैं। मालती देवी जो कर रही है उसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तो किया जा सकता है परंतु अशिक्षा इसके जड़ में व्‍याप्‍त है। अगर मालती देवी का परिवार और उसके आसपास रहने वाले लोग शिक्षित होते तो मालती देवी का इलाज किसी अच्‍छे मनोवैज्ञानिक चिकित्‍सक से हो रहा होता और मात्र एक दिन में लगभग सौ बकरों का खून पीने के लिए विवश नहीं होती मालती देवी। पूजा के उन्‍माद में मालती देवी सौ बकरों का खून पी तो लेती है पर उसपर पूजा समाप्‍त होने के बाद क्‍या गुजरती होगी ये सोच कर ही मितली आने लगती है परंतु आश्‍चर्य की बात यह है कि बीमारी को माँ दुर्गा द्वारा प्रदत्‍त शक्‍ति समझ बैठे है मालती देवी का परिवार और स्‍थानीय लोग।

व्‍यक्‍तित्‍व विकृति के रोग में बहु व्‍यक्‍तित्‍व का शिकार रोगी हो जाता है इस विषय पर प्रसिद्ध अमेरिकी उपन्‍यासकार सिडनी सेल्‍डन ने कुछ साल पहले एक उपन्‍यास ‘टेल मी योर डिरीमस' लिखा था जिसकी नायिका बहु व्‍यक्‍तित्‍व रोग से ग्रसित थी और किस-किस मुसीबत में वो नहीं फंसी थी। जगह कम रहने के कारण वर्णन करना तो यहां संभव नहीं है परंतु इतना कहना अतिशयोक्‍ति नहीं होगी कि इस रोग से पीड़ित रोगी खून भी कर सकता है और आत्‍महत्‍या भी। एक ही व्‍यक्‍ति में दूसरा व्‍यक्‍ति अगर खून करता है तो पहले को मालूम भी नहीं होता कि खून किया गया है। अजय देवगन और सेफ अली खान स्‍टारर एक हिन्‍दी फिल्‍म भी इस रोग को स्‍पर्श करती हुयी बनी थी। फिल्‍म का नाम भूल चुका हूँ।

बहरहाल व्‍यक्‍तित्‍व विकृति एवं बहु व्‍यक्‍तित्‍व नामक रोग से ग्रसित मालती देवी अशिक्षा और अनभिज्ञता के कारण बांसों के बल्‍लियों पर चढ़ने, बकरों का खून पी कर झूमने, नाचने, गाने के लिए अभिशप्‍त है और विडम्‍बना यह है कि सत्‍य बताने वाले को नास्‍तिक कहकर जान से मान डालने तक के लिए आमादा है मालती देवी के आसपास रहने वाले लोग।

राजीव

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जसपाल भट्टी को समर्पित एक नज़्म......

ज़रुरत

ज़मीं के बदतर हालात देख

कभी – कभी उपरवाला भी

हो जाता है ग़मज़दा..

उसे भी लगता है

कोई उसे हँसाए

कोई उसे गुदगुदाए

और हँसने की फ़िक्र में

वो झांकता है

आसमां से ज़मीं पर

उसकी तलाश ख़त्म हो जाती है

उस शख्स पे जाकर

जो मुसलसल कहकहे बाँट रहा है

बुझे हुए चेहरों को नुस्खे बता रहा है

खिलखिलाने के, ज़िंदगी जीने के

यकबयक ...

एक आवाज़ आती है

चलो , हमे तुम्हारी ज़रुरत है

बहुत ठहाके हो गए यहाँ

और फिर ..

बिना सोचे वो मसखरा

सबको हँसाते-हँसाते

रुलाकर चल देता है

उसको हँसाने

जिसके पास निज़ाम है

सबको रुलाने का ...

सबको हँसाने का ...

अब इस तसल्ली के सिवा

कोई चारा भी तो नहीं है

कि

उस मसखरे की ज़रूरत

हमे नहीं

आसमानों को ज़ियादा है .....

--

विजेंद्र शर्मा

Vijendra.vijen@gmail.com

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  उँ


ब्रह्मांड का प्रतीक है उँ
प्रणव मंत्र
एक ध्‍वनि
शरीर के भीतर भी
शरीर के बाहर भी
    सून हर कोई सकता नहीं
    सुनने लगता है जो इसे
    जुड़ने लगता है परमात्‍मा से
ब्रह्मांड की अनाहत ध्‍वनि
ध्‍वनि के उत्‍पत्‍ति का अपवाद
ब्रह्मांड की समस्‍त ध्‍वनियों में
सबसे शक्‍तिशाली ध्‍वनि
    प्रारंभ तो है इसका अंत नहीं !

सबसे बड़ा लोकतंत्र


क्‍या बचा है मेरे पास
बाहर आकर जेल से
दशकों बाद
न बाप
न माँ
न बहन
न भाई
न किए जुर्म की सजा काट
पुलिस साबित न कर पायी एक भी बात
गुम हो गयी लंबी अंधेरी रातों में हयात
मां, बाप, बहन, भाई ने छोड़ दिया साथ
    कैसा है ये न्‍याय का तंत्र ?
    फंसाकर पुलिस निर्दोष को
    रचती है षडयंत्र
    जज साहब एक दशक तक
    फैसला सुनाते है
    जाओ अब जेल से बाहर
    तुम हो स्‍वतंत्र
    क्‍या गरीब को ऐसी ही
    जिंदगी मिलती है भारत में ?
    सूना है देश आजाद है
    और है
    सबसे बड़ा लोकतंत्र !
   

      कारखाना


इंसानियत का कारखाना
अब हो गया है पुराना
नहीं बना पा रहा
ममता, त्‍याग, प्रेम व करूणा का
औजार
जो जीवित कर सके इंसानों में
मरती हुई इन संवेदनाओं को
औजार घिस गए लगते है
मन-मस्‍तिष्‍क के आनंदित उत्‍पाद
नहीं बना पा रहा है कारखाना
टाटा, बिड़ला और अंबानी से कहो
लगाए वो दूसरा इंसानियत का कारखाना !

भगत सिंह आए पर.......
भगत सिंह फिर पैदा हो, चाहते है प्राय सभी
पर भगत सिंह पैदा न हो उनके घर कभी
     देश को आज जरूरत है भगत सिंह की
     ऐसा शिद्द‌त से चाहते है लोग सभी
        ब-शर्त्‍त
           बेटा या भाई बनकर न आए कभी
           आए तो पड़ोसी बनकर ही आए कभी

     

बाजारवाद


पैसे की हवस इतनी बढ़ गयी
छाती का दूध दुकानों पर चढ़ गयी
मांओं को समझना होगा
बाजार की जद से बचना होगा
    जैसे ही छाती का दूध
    बोतलों में बंद होगा
    जीवन बच्‍चों को देने से
    ऐसा दूध स्‍वच्‍छंद होगा
छाती का दूध है अनमोल
मत करो इसका नाप-तोल


                          राजीव आनंद
                         मो. 9471765417

खुशखबरी

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मधुमेह से जीवन बढ़ जाता है, ये कहना था रविन्‍द्र बाबू का। रविन्‍द्र बाबू बड़े ही मस्‍तमौला किस्‍म के व्‍यक्‍ति थे। बाइपास सर्जरी भी करवा लिया था और जीवन के 70वें पड़ाव पर मस्‍त थे। लक्ष्‍मणपुर गांव के मुखिया रह चुके रविन्‍द्र बाबू को गांव में सभी मुखिया जी कहता था। विनय उनका पड़ोसी था और अपने पिता के हाल में हुए मधुमेह के कारण रविन्‍द्र बाबू से मिलता रहता था।

विनय रविन्‍द्र बाबू से एक दिन चौपाल में बैठा देखकर पूछा अच्‍छा चाचा आपको मधुमेह कब हुआ, रविन्‍द्र बाबू ने तपाक से कहा कि मधुमेह मेरे साथ चालीस वर्षों से मेरा साथी बनकर है। तुम्‍हें जानकर आश्‍चर्य होगा विनय मधुमेह मेरे जीवन को बढ़ा दिया है।

वो कैसे चाचा, विनय ने उत्‍सुकता से जानना चाहा, वो ऐसे भतीजे जब हम जाने रहे कि हमका मधुमेह हो चुका है तो थोड़ा आश्‍चर्य हुआ था काहे कि हम सोचते रहे कि यह बीमारी हमका हो ही नहीं सकती इसलिए कि मीठा हम नहीं के बराबर ही खाते रहे और बर्जिश भी करते रहे पर बाद में चिंतन-मनन करे से पता चला कि यह हमका तनाव के कारण हुआ था। हम तो कहूंगा विनय आज तनाव से मधुमेह ज्‍यादा हो रहा है मीठा खाने से कम।

जीवन आपकी मधुमेह से कैसे बढ़ गयी चाचा, विनय ने उन्‍हें याद दिलाया, अरे हां विनय वे कहने लगे, अरे तू जानता है न उ मोहन का एक लंगोटिया यार रहा रूद्रा, जो अमरिका में अभी रहता है, हाँ-हाँ चाचा, विनय ने कहा, रूद्रा चाचा तो एक-दो बार गांव में भी आए हैं। हां तो वही रूद्रा इत्‍तफाक से गांव आया हुआ था जब पता चला कि ये ससुरी मधुमेह हमका हो गया है, तो हम रूद्रा को बताये रहे। रूद्रा हमको बताया रहा कि सुबह एक घंटा जल्‍दी-जल्‍दी टहलना और शाम को एक घंटा और खाने का कोटा बांध लेना, रविन्‍द्र बाबू कह रहे थे, कोटा मतलब समझा विनय, नहीं चाचा, जरा समझाओ न चाचा, रविन्‍द्र बाबू बोले कि जैसे एक पउवा आटा खाते हो न तो एक ही पउवा आटा रोज खाना है, न जरा कम और न जरा ज्‍यादा। इसी तरह खाने का सभी चीज में कोटा सिस्‍टम लागू करना है। रूद्रा यह भी बताया रहा कि अनुशासन से रहना होगा बस मधुमेह तुम्‍हरा दोस्‍त बन जाएगा।

इसका मतलब तो यह हुआ न चाचा, विनय आगे बोलने लगा कि मधुमेह फौजी की तरह अनुशासन में रहने वाला बीमारी है। रविन्‍द्र चाचा हंसने लगे और विनय के उदाहरण पर खुश होते हुए बोले तुम ठीक कहा विनय।

विनय अभी मधुमेह बीमारी से अनभिज्ञ था उसने रविन्‍द्र बाबू से पूछा कि इस बीमारी को डायबिटीज कहते है यह फौरेन का बीमारी लगता है चाचा। रविन्‍द्र चाचा बोले अरे नहीं भतीजे यह बीमारी जब हमका हो गया न तब हम भी इसका खोजबीन करना शुरू किए और तब अपना रामखेलावन है न अरे वही जिसका शहर मा किताब का अहढ़त है वही एक किताब ला कर दिया था इस बीमारी का,

नाम क्‍या था, चाचा, विनय ने पूछा, नाम तो अभी याद नहीं पर घर मा कितबवा पड़ी होगी, देगें भतीजे तुमको पढ़ने, विनय के किताब मांगने से पहले रविन्‍द्र बाबू ने उसे किताब देने का वादा भी कर दिया था।

विनय पूछा कि आप क्‍या पढ़े चाचा उस किताब में, अरे हम तो बहुत कुछ पढ़ा विनय, सबसे पहले भारत के ही डाक्‍टर, नाम याद करते हुए कहा कि हां नाम याद आया सुश्रुत, ईसा मसीह के जन्‍में के बहुतते दिन पहले इ बीमारी को खोज लिहिन थे और पेशाब में चीनी जाने के कारण जोन बीमारी होता है न, उसका नाम रखे मधुमेह। तो डायबिटीज इस बीमारी का नाम कौन रखा चाचा, विनय ने मुखिया जी से पूछा, उ तो ठीक से मालूम नहीं पर सुनने में आया कि अफलातून बाबा के देश में ही कोई इस बीमारी का नाम डायबिटीज रखा था।

मुखियाजी थोडा रूके और पूछा विनय तुम इ सब काहे जानना चाहता है रे, क्‍या तुमको......बीच में ही टोकते हुए विनय बोला मुझे नहीं चाचा, मेरे बाबूजी को पिछले सप्‍ताह ही डाक्‍टर ने कहा कि मधुमेह हो गया है। रविन्‍द्र बाबू बोले तब तो तुम्‍हारे बाबूजी राम लखन का उम्र बढ़ गया। विनय रविन्‍द्र बाबू से मिलने के पहले बहुत डर गया था कि इस असाध्‍य रोग से ग्रसित उसके बाबूजी का अब क्‍या होगा। रविन्‍द्र बाबू की बात सुनने के बाद उसे जान में जान आयी।

रविन्‍द्र बाबू विनय को गुमसुम देखकर बोले, चिंता का कोनो बात नहीं है विनय, जाकर अपने बाबूजी को बोल देव कि चाचा सुबह घूमने के लिए बुलाइन है, बाकी हम सब समझा देंगे। विनय को अब कुछ अच्‍छा लग रहा था और चालीस वर्षों से रविन्‍द्र बाबू को मधुमेह है यह जानकर अपने पिता की लंबी आयु की कामना करता हुआ अपने बाबूजी को खुशखबरी देने विनय घर की ओर चल पड़ा था।

राजीव आनंद

गौरैया की मांग

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छत पर बैठी गौरैया

फुदक-फुदक कर करती मांग।

दे दो मुझका दाना पानी,

दिखता है बस अब मकान।

नहीं मिले अब वो बाग बगीचे,

नहीं रहे अब वो उपवन।

मेरा मन भी अब उचट गया है,

सोच रही हूं छोड़ दू तन।

पर काल चक्र के आगे,

कौन यहां टिकता है।

चाहे जो मन,

वो सब कर्म कहां होता है।

लेकिन बच्‍चों के खातिर,

मुझको आना जाना है।

रोज भोर में आकर छत पर,

चूं-चूं कर तुम्‍हें जगाना है।

बदले में मिल जायेगा मुझको,

थोड़ा दाना थेाड़ा पानी।

कट जायेगा जीवन मेरा,

कर देना बस इतना एहसान।

छत पर बैठी गौरैया,

फुदक-फुदक कर करती मांग।

 

---अजय कुमार मिश्र ‘अजय श्री‘

नौसिखुआ न कहो.....

जवां हैं हम

जवां हैं उमंगें

हर ताल पर झूम

सजगता की अभिव्यक्ति

रंगो से बुना यथार्थ

बाजीगरों के नए ठिकाने

रोशनी की नई किरण

महलों में गूंजता ककहरा

परंपरा की डोर थामे

उदारता हो प्‍यार का आधार

लय की समझ के लिए

लिख रही तकदीर परदे पर

रग-रग में उतरता राग

सुनाई दे रही

भविष्‍य की दस्‍तक

हरफन मौला हो

तो मुश्‍किल नहीं चुनौती

एक सपना उंची उड़ान का

अनुभव असल जिन्‍दगी के

अब यहां से कहां जाए हम

सपने कभी नहीं मरते

कभी न कभी सच होते हैं

कभी अंधेरे में जन्‍मते हैं

तो उजाले में पूरे होते हैं

000

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

ए-305, ओ.सी.आर.

विधान सभा मार्ग;लखनऊ

पुस्‍तक समीक्षा

समीक्षक - दिलीप भाटिया

रावतभाटा

---

डोर

(लघु कथा संग्रह)

लेखक-पंकज शर्मा,

19 सैनिक विहार, जण्‍डली, अम्‍बाला शहर

प्रकाशक-शुभ तारिका प्रकाशन, ।-47, शास्‍त्री कॉलोनी, अम्‍बाला छावनी-133001,

पृष्‍ठ-116, मूल्‍य रू150 (पेपर बेक), रू. 200 (सजिल्‍द)

यत्र तत्र सर्वत्र प्रकाशित होते रहने वाले पंकज की दूसरी कृति 80 लघुकथाओं के संकलन रूप में साहित्‍य जगत में आई है। सामयिक ज्‍वलंत हर विषय पर गागर में सागर सदृश ये लघुकथाएं एक सकारात्‍मक समाधानात्‍मक एवं विचारणीय संदेश देती हैं। वर्त्तमान रचनाओं से हटकर ये लघुकथाएं पाठक के मन को संतोष, तृप्‍ति एवं आशा की किरण देती हैं।

धार्मिक उत्‍सव पर कटाक्ष ‘मजाक‘ में है, ऊर्जा संरक्षण का संदेश ‘संस्‍कार‘ में है, ममता का गुण ‘समानता‘ में है, लॉटरी पर कटाक्ष ‘लाटरी‘ में है, पापा की कमी ‘मेरे पापा‘ में है, अंधेरे की हार ‘रोशनी‘ में है, संवेदनशीलता ‘काश‘ में है, रिश्‍तों की निरर्थक तुलना ‘तुलना‘ में है, रिश्‍वत पर प्रश्‍न चिन्‍ह ‘प्रतिपूर्त्ति‘ में है, घर का महत्त्व ‘ईनाम‘ में है, जीवनसंगिनी का महत्त्व ‘डोर‘ में है, शालीनता एवं मर्यादा का महत्त्व ‘कसूरवार‘ में है, मोहल्‍ले की एकता का महत्त्व ‘सुख‘ में है, इत्‍यादि।

साहित्‍यिक प्रदूषण के कीचड़ में अपने नाम को सार्थक करते हुए कमल सदृश पंकज की रचनाएं कभी ऑखें छलकाती हैं, कभी दर्पण दिखलाती हैं, कभी कटघरे में खडा करती हैं, वर्त्तमान व्‍यवस्‍था पर प्रश्‍न चिन्‍ह भी लगाती हैं, काली अमावस्‍या पर संकेत देते हुए भी पूर्णिमा का आश्‍वासन दे जाती हैं।

जन्‍मजात बायें हाथ की कमी के कारण पंकज दया, सहानुभूति की अपेक्षा नहीं करते, उनका दायां हाथ इतना सक्षम समर्थ है कि आत्‍म स्‍वाभिमानी, ऊर्जावान, कर्त्तव्‍यशील पंकज स्‍वतः ही कर्म एवं रचनाओं के माध्‍यम से शिक्षा दे जाते हैं। अल्‍पकाल में ही साहित्‍य की कई मंजिलें चढ़ने वाले पंकज कई सम्‍मानीय सम्‍मान पुरस्‍कार अर्जित कर चुके हैं, पंकज एक अच्‍छे साहित्‍यकार हैं, पर साथ ही पंकज एक उत्‍कृष्‍ट इन्‍सान हैं, पाठक उन्‍हें सम्‍मान देते हैं, पत्रिकाओं के सम्‍पादक रचनाओं के लिए अनुरोध करते हैं, यही पंकज के लेखन की सार्थकता है।

पंकज की यह कृति प्रत्‍येक सत्‍साहित्‍य प्रेमी को अवश्‍य पढ़नी चाहिए। पंकज की तीसरी कृति के लिए प्रतीक्षा अधिक नहीं करनी पड़े, यही मंगल शुभकामना है

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1.बन्दा ए दिल ए नाज़ुक का मक़ान है
रात भर छत को नज़र पे उठाये रहता है


2. शर -गफ्त बहक-आदाब और बे-नू सा दिखा
अदना गली का हर शख्स भूखा और मय-बू सा दिखा

( शर गफ्त - बुरा बोलने वाला या गालीबाज़ , बहक आदाब - बहके से आचरण वाला , बे-नू - पुराना
मय -बू   - जिस से शराब की महक आती हो )


3. ख़ुर्शीद मग़रिब के इधर आया न कभी
सहरी की दहलीज़ पे मेरे साये ना गए


( खुर्शीद - सूरज , मग़रिब - पश्चिम , सहरी - सुबह या इस शेर में पूर्व दिशा के लिए कहा है )
 
4परस्तिश के लिए हर दीवार से लटकाया गया
पाबन्द ए दीन ए ईमाँ का बेहतर क्या अंजाम होता

(परस्तिश - पूजन , पाबंद ए दीन ए ईमान - ईमानदारी के धर्म का पालक )

5कोई किस्मती इबारत सोने आ जाये कभी
पेशानी के बिस्तर से ये सिलवटें हटाइए
( इबारत - लेख , पेशानी - माथा )

6 लकीरों का राहगीर सहरा की दौड़ में
छोड़ेगा कोई नज़ीर तो भटकों के वास्ते
( सहरा - रेगिस्तान , नजीर - उदाहरण )

7 सिफ़्ल पयामी तेरा न मक़बूल तब्सरा होता
वज़्न शाना तेरे भी और ख़ुश्क गर पैमां होता

( सिफ्ल पयामी - जादुई या सफल  वर्णन कार , मकबूल - प्रसिद्द , तब्सरा - चर्चा , वज़न शाना - बोझिल कंधे ,यहाँ ज़िम्मेवारियों के लिए प्रयुक्त , खुश्क - सूखा , पैमां - मदिरा का पात्र )

8. हर रहबर के साये में सिमटने की क़वायद थी
कई  फ़लसफ़े रद्द हुए और कई ख़ुदा बदल गए
( रहबर - सहयात्री यहाँ साथी , कवायद - प्रक्रिया , फ़लसफ़े - दर्शन /दार्शनिक विचार )

9.  हुक़ूक़ ए जवांदिल  बे तर बे तरीन न हुए
पयामे ख़ाबीदा यूं नहीं के नाज़रीन न हुए
( हुकूक - अधिकार /यहाँ कर्तव्य , बेतर-बेतरीन  - छिन्न भिन्न , पयामे ख़ाबीदा - सपने में दिए सन्देश अथवा सपने में आने वाली के सन्देश , नाज़रीन - दर्शक /यहाँ घटित )

10. ठहर न सकेगी दीद ए महफ़िल नूर ए हुस्न पे आज
ज़िक्र ए रुसवा सर ए महफ़िल लब बदला करेगा
( दीद ए महफ़िल - महफ़िल की नज़र , नूर ए हुस्न - सौन्दर्य की आभा , जिक्र ए रुस्वा - बदनाम की चर्चा ,सर ए महफ़िल - भरी महफ़िल )

11. परवाज़ ए बयाँ अपने के पर ज़रा गिन लूं
सुना हद तेरे क़िरदार की आसमाँ से बात करती है
( परवाज़ - उड़ान )
12.एक दोस्ती आपकी फिर तल्खियाँ निज़ाम से
हो जाएगा मशहूर बेशक  'मामूली ' भी एक दिन
( तल्खियां - कटुता , निज़ाम - प्रशासन/व्यवस्था )

पुणे की मेयर के साथ समानित होते हुए

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पिछली रात

पिछली रात मोहल्ले में हो गया हल्ला

हल्ला ओ हल्ला

किसी ने कहा चोर था

किसी ने कहा डाकू

मुझ को मालूम  था 

रात को आया

मेरा चित चोर था

हला ओ हल्ला

पिछली रात ---------------------------

 

सारी रात जगाया

क्या गजब ढाया

लेने ना दी अंगडाई भी

मेरे तनमन में हो गया

हल्ला ओ हल्ला

पिछली रात----------------------------

 

जाने लगा तो

ठोकर लगी और गिर पड़ा वो

घर के सब जागा उठे

अंगना मे फिर खूब हुआ

हल्ला ओ हल्ला

पिछली रात------------------------------

 

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जीवन आधार

देखो फिर बरस रही है बूंदे

जीवन का आधार लिए

तपती हुई धरती पर

शीतल फुहार लिए

आसमान आज फिर खड़ा है

अमृत कलश लिए

कुछ बूंदों को बांधे हुए

कुछ बूंदों को खोले हुए

हंसती हुई सुबह के सारे उल्लास लिए

मुरझाये खेतों को आधार  दिए

मुंडेर-मुंडेर बहती धारा

फूलों की सौगात लिए

गीत गाती, गोरियों

चेहरे की मुस्कान बने

बैलों के गले की रुनझुन के

सांझ की आवाज लिए

देखो फिर बरस रही है बूंदें

जीवन का आधार लिए

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माँ शारदे

माँ शारदे है सरस्वती

रागेश्वरी , भागेश्वरी

माँ-----------------------

वर दे वर दे वर दे

वीण के तारों सा मुझ को

स्वर दे स्वर दे स्वर दे

माँ-----------------------

वर दे वर दे वर दे

सात सुरों की

इस महिमा से

मन मोरा भर दे

भर दे भर दे भर  दे

माँ-----------------------

वर दे वर दे वर दे

जिसके गले में

तू बस  जाए

जीवन उस का तू त्र दे

तर दे तर दे तर दे

माँ-----------------------

 

 

हौसलों के साथ

चल कदम बढ़ाये जा

अपने हौसलों के साथ चल

मंजिलें कठिन  हैं तो क्या

मूड कर ना तू पीछे देख

आ रही हों चाहे कितनी सदा

रास्ते न तू बदल

मुश्किलों की घड़ी बीत जायेगी

चल  कदम बढ़ाये चल

अपने सपनों के साथ चल

पहाड़ों पर चढना है तो

अपनी रफ्तार और तेज कर

पर्वतों को पार कर

नदियों कस संग चल

चल कदम बढ़ाये चल

आसमान के द्वार भी

खुल जायेंगे तेरे वास्ते

आँधियों से ना डर

तूफानों से ना घबरा

चल कदम बढ़ाये चल

अपने कारवाँ के साथ चल

तेरी मशाल के साथ-साथ

हजारों मशालें और जले

चलना है तो ऐसा कल

वरना चलना बेकार है

चल कदम बढ़ाये चल

कल फिर आना....

: तेजेन्द्र शर्मा

Tej - July 2012 (Mobile)

“देखो रीमा, मैं अब पचास का हो चला हूं। मेरे लिये अब औरत के जिस्म का कोई मतलब नहीं रह गया।.... अब तुम मुझसे कोई उम्मीद न रखना।”

कबीर के ये शब्द रीमा के दिल की धड़कन को गड़बड़ा देने के लिये काफ़ी थे। कुछ पल की चुप्पी के बाद उसने मुंह खोला, “कबीर आप पचास के हो गये तो इसमें मेरा क्या कुसूर है? मैं तो अभी सैंतीस की ही हूं।.... आप कहना चाहते हैं कि हमारी शादीशुदा ज़िन्दगी बस आपके एक वाक्य से ख़त्म हो गई?.... जिस तरह पेट को भूख लगती है, कबीर, जिस्म को भी वैसे ही भूख महसूस होती है। वैसे पेट की भूख शांत करने के तो कई तरीके हैं। मगर जिस्म........ ” ।

रीमा को अपनी बात बीच में ही बन्द करनी पड़ गई। कबीर के बेसुरे ख़र्राटे कमरे में गूंजने लगे।

रीमा को वहम है कि 13 की संख्या उसके लिये दुर्भाग्य लेकर आती है। यदि 13 तारीख़ को शुक्रवार हो तो वह घर से बाहर ही नहीं निकलती। और आज तो उसके विवाह को 13 वर्ष पूरे हुए हैं और 13 तारीख़ वाला शुक्रवार भी है। आज कबीर ने यह वाक्य बोल कर रीमा के दिल में 13 के आंकड़े के प्रति भावनाओं को जैसे आधार दे दिया है। क्या अब उसके बाकी जीवन का हर दिन 13 तारीख़ वाला शुक्रवार बनने वाला है?

शिमला के रिट्ज़ होटल की वो रात! हनीमून के बारे में बस सुन रखा था। उस रात की यादें सच में ब्लो हॉट ब्लो कोल्ड वाली यादें हैं। कबीर ने ज़बरदस्ती उसे संतरे के रस में वोदका डाल कर पिलाई थी। रात दस बजे से तीन बजे तक कबीर ने अपने आपको पांच बार सुख दिया था। और वहम की मारी रीमा हर बार अपना शरीर धोने के लिये बाथरूम में जाती थी। होटल में पावर की समस्या चल रही थी इसलिये रात को गरम पानी उपलब्ध नहीं था। पहली बार तो किसी तरह ठण्डे पानी से हिना नहा ली। बाक़ी के चार बार तो उसने केवल अपने गुप्तांग धोये और बग़लों को गीले तौलिये से पौंछ लिया। एक रात में पांच बार करने वाला कबीर अचानक संत कैसे हो गया?

क्या दो बच्चे पैदा करने के बाद उसके शरीर में नमक नहीं बचा? अपने देश में बिताए तीन साल कबीर की बाहों में बीते थे। मगर यहां लन्दन में आकर बसने के बाद से दोनों के बीच एक अजीब से ठण्डी से दूरी बढ़ती जाने लगी। लन्दन का ठण्डा मौसम शायद उनके रिश्तों में गहरा पैठने लगा था।

अपने मां बाप की तेरहवीं संतान रीमा; अपने पति से तेरह वर्ष छोटी रीमा; अपने विवाह के तेरह वर्ष बाद सोचने को मजबूर है कि आख़िर उसका अपने पति के साथ रिश्ता क्या है। उसका अपना जीवन क्या है। अब बच्चे इतने छोटे भी नहीं कि उन्हें हर काम के लिये मां की ज़रूरत पड़े और इतने बड़े भी नहीं हैं कि पूरी तरह से आत्मनिर्भर हों।

फिर भी रीमा के कुछ काम तो तय हैं कि वह अपने बच्चों को सुबह तैयार करती है, नाश्ता बनाती है, खिलाती है, फिर उन्हें कार पर बैठा कर स्कूल छोड़ने जाती है। दोनों बच्चे पार्क हाई में पढ़ते हैं। रीमा को प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना पसन्द नहीं। इसलिये बच्चे स्टेट स्कूल में ही जाते हैं। कबीर के अहंकार को बुरा लगता है कि इतनी बड़ी एअरलाईन के अधिकारी के बच्चे स्टेट स्कूल में पढ़ें। मगर रीमा की सोच अलग है।

रीमा ने सोचते सोचते दो साल और बिता दिये हैं। अब उसने रातों को रोना बन्द कर दिया है। कितनी रातें वह सज-धज कर डाइनिंग टेबल पर कबीर का इंतज़ार करती। वह ग्यारह बजे रात आता और आसानी से कह देता कि उसने तो खाना दफ़्तर में ही खा लिया है। और रीमा बिना खाना खाये और बिना टेबल साफ़ किये वहां से उठकर कबीर के साथ बेडरूम की तरफ़ चल देती। कबीर वहीं लाउंज में बैठ जाता, और टीवी के सामने ऊंधने लगता और वहीं सो रहता। उसके मुंह से व्हिस्की की महक आती रहती। बेडरूम में वह अकेली तड़पती रहती और उन हसीन रातों को याद करती जब कबीर को उसके शरीर में रुचि थी।

“आप आज रात फिर बेडरूम में नहीं आए?”

“ दफ़्तर के कामों में इतना थक जाता हूं कि बस यहीं टीवी के सामने ही नींद आ जाती है।”

“कबीर मेरा भी तो जी चाहता है कि कभी आप मुझ से भी प्यार की दो बातें करें।... भला मेरा क्या कुसूर है कि मैं अकेली बिस्तर पर करवटें बदलती रहूं?”

“भई देखो रीमा, अब मैंने तुम्हारे आराम के लिये सब इन्तज़ाम कर दिये हैं। घर में तमाम सहूलियत मौजूद हैं। और तुम्हें क्या चाहिये?”

हां, रीमा को और कुछ चाहने का हक़ कहां है। शरीर की भूख की मांग भला औरत कैसे रख सकती है। अपने जीवन के ऐसे मोड़ पर खड़ी है रीमा जब शरीर और अधिक मांगता है। तभी उसे पता चलता है कि बस उसका साथी थक गया है। मगर यह सब हुआ कैसे। सच्ची बात है कि अचानक तो नहीं ही हुआ है। लन्दन आने के बाद आहिस्ता आहिस्ता ही आया है यह बदलाव।

जब कबीर की पहली सेक्रेटरी ऐनेट आई थी तो कबीर ने घर देर से आना शुरू कर दिया था। ऐनेट स्कॉटलेण्ड से आई थी। उसकी भाषा कभी भी रीमा को समझ नहीं आती थी। मगर उसके शरीर की भाषा शायद कबीर को पूरी तरह समझ आ गई थी। कबीर जब घर आता तो चेहरा निचुड़ा हुआ सा लगता। बस किसी तरह खाना खाता और सो जाता।

रीमा को अच्छी तरह याद है कि जब उसका और कबीर का शारीरिक रिश्ता सक्रिय था तो संभोग के बाद वह कितनी गहरी नींद सोती थी। अब... गहरी नींद कबीर सोता है और संभोग के लिये तड़पने का काम करती है रीमा । रीमा को महसूस होने लगा कि कबीर के कपड़ों से दूसरी औरत के शरीर की गन्ध आने लगी है।

“क्या बकती हो तुम? इस तरह का गन्दा इल्ज़ाम लगाती हो मुझ पर? इतनी बेहूदा बात तुम कह कैसे गईं ?.... ” और कबीर के ग़ुस्से ने रीमा को दहला दिया था। मगर रीमा अपने पति को खोना नहीं चाहती थी। सिर नीचा किये सब सुनती रही। शायद कहीं यह डर भी था कि उसे घर से निकाल ही न दें। आर्थिक स्तर पर कबीर पर ही आश्रित थी। यदि महिला आर्थिक रूप से स्वतन्त्र न हो तो भला अपने मन की बात कैसे कह सकती है।

एक शाम यह हुआ भी था, कि शाम की तन्हाई से तंग आकर रीमा एअरलाईन की एक मुलाज़िम के घर चली गई थी। सीमा काउण्टर पर यात्रियों को चेक-इन करने की ड्यूटी करती थी। कबीर को बिल्कुल पसन्द नहीं था कि उसकी पत्नी छोटे अधिकारियों के साथ कोई सम्बन्ध रखे। मगर अकेलापन रीमा को इस क़दर परेशान कर रहा था कि उससे घर में बैठना मुश्किल हो रहा था। बच्चों को खाना खिलाया और सीमा को फ़ोन किया। सीमा अभी डिनर करने का सोच ही रही थी। आज उसका पति भी घर पर था। पति विमान परिचारक है। रीमा चली गई।

और कबीर उसी दिन कुछ जल्दी घर लौट आया। उसकी तबीयत कुछ ख़राब हो गई थी। हल्का हल्का बुख़ार महसूस हो रहा था। घर में रीमा को न पा कर उसकी ज़मींदाराना प्रकृति को बहुत तेज़ झटका लगा। परेशान घर में घूमता रहा। फिर घर को भीतर से अच्छी तरह बन्द कर दिया ताकि रीमा बाहर से चाबी लगा कर खोल न सके। टीवी के सामने बैठा और सो गया। रात जब रीमा वापिस आई तो दरवाज़ा खुला ही नहीं क्योंकि बच्चे ऊपर अपने बेडरूम में बेख़बर सो रहे थे और कबीर को तो अपनी पत्नी को कुछ साबित करना था। बाहर अन्धेरी ठण्डी रात में रीमा अकेली अपनी कार स्टार्ट करके, हीटिंग चला कर बिना किसी रज़ाई या कम्बल के पड़ी रही।

सुबह को उसका मोबाइल फ़ोन बजा। बेटे को चिन्ता थी। नाश्ते के लिये मां की ज़रूरत थी ....

घर का दरवाज़ा खुला। नज़रें नीची किये रीमा भीतर दाख़िल हुई।

“आ गईं हिरोइन हमारे घर की ! मैं पूछता हूं कि मुझसे इजाज़त लिये बिना तुम्हारे कदम घर से बाहर निकले तो कैसे निकले ! अब तुम्हारी इतनी मजाल हो गई है कि तुम मुझसे बिना पूछे बाहर घूमने लगी हो ! ... तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ? ”

“जी बस सीमा के घर तक गई थी। मैं घर में अकेले बैठे बैठे बोर हो जाती हूं। ”

“मैं नहीं चाहता कि तुम छोटे लोगों के साथ मेलजोल रखो। आई बात समझ में?”

रीमा को समझ में आ गया था कि इस वक़्त बात करके बात को बिगाड़ा ही जा सकता है। वह एकदम चुप्पी ओढ़े बच्चों का काम करने लगी।

विवाहित जीवन की यादों में कुछ भी सकारात्मक क्यों याद नहीं आता ? क्यों वह हमेशा किसी अन्धेरी सुरंग के बीच जा कर कहीं खो जाती है ? एक शाम अपने अकेलेपन को दूर करने के प्रयास की सज़ा सारी रात कार में अकेले बिताना ! कबीर अपने आपको दिल्लीवाला कहता है। मगर व्यवहार तो किसी गांव के अनपढ़ ज़मींदार सा है। बेचारी रीमा! अभी तक बरेली की मासूम मानसिकता से नहीं उबर पा रही।

जब लन्दन आई थी तो अंग्रेज़ी भी ठीक से नहीं बोल पाती थी रीमा । कबीर पहले आ गया था नौकरी शुरू करने। क़रीब चार महीने बाद रीमा आ गई थी अपने पुत्र के साथ। अयान क़रीब साल भर का था। कबीर जैसे पगलाया पड़ा था रीमा के लिये। कबीर है बहुत बड़ा प्लैनर। पूरी सूझ बूझ से रीमा को शुक्रवार की फ़्लाइट से लन्दन बुलाया था। शुक्रवार और शनिवार की रातें आज भी रीमा के दिल को गुदगुदा जाती हैं। उसका सारा शरीर लव-बाइट्स के नीले काले निशानों से भर गया था। बस उसके बाद जब कबीर सोमवार को काम पर गया तो आज तक वापिस ही नहीं आया। उसका घिसटता हुआ शरीर घर सोने ज़रूर आता है। किन्तु वह शरीर रीमा के पति का नहीं होता। वह कभी ऐनेट का प्रेमी हो जाता है तो कभी काली शर्ली का।

लन्दन आने के बाद कबीर ने चार सेक्रेटरी बदली हैं। रीमा ने महसूस किया कि शायद उन सेक्रेटेरियों की मुख्य काबिलियत उनके बड़े बड़े वक्ष ही थे। बड़े वक्ष कबीर की कमज़ोरी थे। विवाह के चार दिन बाद ही जब कबीर रीमा के साथ उसके मायके हो कर आया तो रास्ते में ही बेहयाई से कहा था, “भई तुम्हारे भाई के बहुत मज़े हैं।”

“क्या मतलब?” रीमा को कबीर की बात समझ नहीं आई थी।

“तुम्हारी भाभी के ख़ज़ाने देखे कितने बड़े बड़े हैं!” कबीर की आंखों की गन्दगी उसके होठों की लार बन कर टपक रही थी। शर्म की मारी रीमा बस चुप्पी साध कर रह गई थी। रात को नाइटी पहनते समय उसने अपनी छातियों को देखा था। कोई छोटी तो नहीं थी उसकी छातियां। हां भाभी का पांच साल का बेटा है। वो भरी पूरी औरत हैं। ज़ाहिर है कि उनका बदन भी उतना ही गदराया हुआ था। भला कोई भी शरीफ़ आदमी अपने रिश्तेदारों के बारे में इतनी हल्की बात कर सकता है!

और वो शर्ली! वो तो एक बार कबीर और परिवार को हीथ्रो हवाई अड्डे तक छोड़ने भी आई थी। बेशर्म किस तरह कबीर को कस कर गले मिली थी। रीमा को समझ ही नहीं आता था कि कबीर को क्या पसन्द है। क्या वह गोरी अंग्रेज़ औरतों को पसन्द करता है या फिर काली अफ़्रीकनों को। मगर माइ लैन ली तो चीन से थी। ओह! यानि सभी तरह के स्वाद चख रहा है।

इसी लिये तो सीमा के घर जाने पर इतना हंगामा खड़ा कर दिया था और रात बाहर कार में बिताने को मजबूर कर दिया था। क्योंकि सीमा ने कबीर के सम्बन्धों के बारे में खुल कर हिना से बातें की थीं। एक बार तो कबीर ने सीमा पर भी अपने पद का इस्तेमाल करने का प्रयास किया था। मगर सीमा ने किसी भी तरह अपना दामन बचा लिया था। फिर उसका पति भी एअरलाईन में परसर है। शायद उससे डर गया होगा कबीर की बदनामी होगी। एक बार फ़ोन पर किसी से बात करते हुए रीमा ने भी सुन लिया था। किसी महिला के वक्ष और नितम्बों का ज़िक्र हो रहा था। मगर तब भी कबीर बात को टाल गया था। कबीर को हमेशा डर रहता है कि यदि रीमा एअरलाइन के कर्मचारियों से दोस्ती रखेगी तो उसकी अपनी पोल खुल जाने की पूरी संभावना है।

एक बार तो रीमा बेहयाई पर उतर आई, “कबीर चलिये न बिस्तर पर। टी.वी. कल देख लीजियेगा।”

बेबस सा कबीर साथ हो लिया रीमा के। रीमा ने आज कबीर का पसन्दीदा परफ़्यूम पैलोमा पिकासो लगाया था। अपनी नाइटी को हलका सा ऐसा ट्विस्ट दिया कि उसके वक्ष बस जैसे बाहर आने ही वाले थे। मगर कबीर जैसे मुर्दा जिस्म की तरह पड़ा रहा। उसमें कोई हरकत नहीं हुई। रीमा ने हिम्मत की और कबीर के नाइट सूट के पजामें में हाथ डाल दिया। काफ़ी देर तक मेहनत करती रही। मगर कबीर के ख़र्राटों ने रीमा को समझा दिया कि बात उसकी पहुंच से बाहर जी चुकी है।

रीमा उठ कर किचन में गई और वहां दराज़ से बड़ा सा चाकू निकाल लाई। पहले सोचा कि कबीर की हत्या कर दे। बिस्तर तक चल कर आई भी। मगर उस मांस के लिजलिजे लोथड़े को पड़ा देख उसे घिन आने लगी। ऐसी लाश को मार कर क्या हासिल होगा उसे?

रीमा को समझ नहीं आता था कि कबीर बी.बी.सी. या आई.टी.वी. की ख़बरें क्यों नहीं देखता। फिर स्काई न्यूज़ है सी.एन.एन. है, इन चैनलों को क्यों नकार रखा है। भला देसी चैनलों से देस की ख़बर रख कर हासिल क्या होगा। जिस देश में रह रहे हैं, उसके बारे में तो कुछ मालूम नहीं, लालू प्रसाद और मायावती के बारे में पढ़ सुन कर क्या हासिल होगा? उसके घर टी.वी पर बस यह देसी न्यूज़ चैनल चलते या फिर हिन्दी फ़िल्में या सीरियल।

सीरियल की ही तो बात थी। रीमा ने एक बार सोचा था कि चलो रात को कबीर के साथ बैठ कर वीडियो पर पाकिस्तानी ड्रामा ‘धूप किनारे’ देखेगी। भारत में सभी लोग इस नाटक की बहुत तारीफ़ किया करते थे। उसने स्वयं भी एक आध एपिसोड देख रखा था। राहत काज़मी की एक्टिंग उसे बहुत पसन्द आई थी। उसने अपनी पड़ोसन बुशरा से कह कर कराची से ‘धूप किनारे’ के ओरिजनल वीडियो कैसेट मंगवाए। कबीर को मनाया कि कम से कम एक शाम जल्दी घर आ जाए। शुक्रवार की शाम कबीर आठ बजे घर आ गया।

रीमा ने जल्दी से डाइनिंग टेबल पर खाना लगाया। उसने आज खाने में मटन चॉप्स, मशरूम मटर की सूखी सब्ज़ी और मूंग साबुत की दाल बनाई थी। साथ में रायता, सलाद, पापड़ और अचार। खाना खा कर कबीर पहुंच गया टीवी के सामने। कबीर ने आज कपड़े भी नहीं बदले थे। सूट और जूते में ही बन्धा हुआ था अब तक। और रीमा मेज़ की सफ़ाई में जुट गयी। बचा हुआ खाना ठीक से पैक करके फ़्रिज में रखा। बरतन साफ़ किये और हाथ मुंह धोकर, परफ़्यूम लगाया। और कबीर के साथ बैठ गई। याद आने लगा के कैसे भारत में कबीर के साथ सिनेमा देखने जाया करती थी। शादी के बाद जयपुर गये थे और राजमन्दिर में फ़िल्म देखी थी।

“अरे भाई कौन है इस सीरियल में?”

“कोई राहत काज़मी है जो पाकिस्तान का बहुत बड़ा टी.वी. स्टार है। साथ में मरीना ख़ान है। .. बुशरा बता रही थी कि राहत काज़मी में तीन इंडियन स्टारों की झलक है। अमिताभ, मनोज कुमार और राज बब्बर। ”

“ये कैसा मिक्सचर हुआ जी ? अमिताभ और मनोज तो वैसे ही दिलीप कुमार की नक़ल करते हैं। फिर भला यह काज़मी मियां क्या एक्टिंग करेंगे ? ”

“आप देखिये तो सही। ” रीमा को कबीर की निगेटिव बातें परेशान करने लगती हैं। “और हां इस सीरियल में कुछ बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़लें और नज़में भी हैं। ”

“चलिये अभी सामने आ जाती हैं। ”

धूप किनारे की कास्टिंग शुरू होती है। रीमा को आदत ही नहीं है कि एक जगह मिट्टी का माधो बन कर फ़िल्म या टी.वी. सीरियल देखा जाए। वह एक जीवन्त व्यक्तित्व है। उसे बातें करने की इच्छा होती है। आज तो केवल कबीर का साथ पाने के लिये....। कबीर ने आज भोजन से पहले कोई ड्रिंक नहीं लिया शायद इसी लिये अपने लिये ड्राम्बुई का एक लार्ज सा पोरशन बना लिया है। उसने रीमा को भी अपने लिये एक लिक्योर बनाने को कहा है। रीमा माहौल को रंगीन बना देना चाहती है। उसने कबीर की बात मान ली है। हालांकि मन में कहीं इच्छा थी कि कबीर स्वयं उसके लिये ड्रिंक बनाए। आमतौर पर रीमा खाने के बाद लिक्योर ही ले लेती है। क्रेम-दि-मैन्थ पीने से उसे महसूस होता है कि पान खा लिया है। आज भी उसने वही बोतल खोली, हरे रंग का एक पैग अपने लिक्योर गिलास में डाला और बर्फ़ का चूरा करने लगी ताकि क्रेम-दि-मैन्थ का फ़्रापे बना सके।... एकाएक उसको अपनी ग़लती महसूस हुई। उसने दूसरे गिलास में चूरा की हुई बर्फ़ डाली और फिर पहले गिलास में से लिक्योर आहिस्ता आहिस्ता उस पर उंडेलने लगी। चूरा बर्फ़ के साथ मिल कर हरे रंग की क्रेम-दि-मैन्थ माहौल को कहीं अधिक ख़ूबसूरत और रोमांटिक बना रही थी।

रीमा को यह ड्रिंक बनाना कबीर ने ही सिखाया था। कबीर ने रीमा का गिलास देखा और मुस्कुरा दिया। दोनों ने चीयर्स कहा और अपने अपने गिलास में से एक एक घूंट पी लिया।

पहला एपिसोड ख़त्म होते होते लिक्योर अपना असर दिखाने लगती है और रीमा की आंखें बन्द होने लगती हैं, “कबीर, हम आज दिन भर खाना बनाते और सफ़ाई करते थक गये हैं। हमें नींद आ रही है। चलिये आप भी ऊपर चलिये। यह सीरियल कल सुबह आराम से देखेंगे। कल तो आपकी छुट्टी है। ”

“अरे हमारी छुट्टी की भली कही। एअरलाईन तो हफ़्ते में सातों दिन काम करती हैं। हम हर वक़्त ऑन-कॉल होते हैं। ... अच्छा तुम चलो मैं अभी आता हूं। ”

रीमा अपने बेड-रूम में ऊपर चली गई। और धम से बिस्तर पर गिरते ही सो गई। नींद बहुत गहरी थी। थकावट का असर साफ़ दिखाई दे रहा था और क्रेम-दि-मेन्थ ने अपना काम कर ही दिया था। रीमा की नींद खुली जब कमरे की बिजली जली। उसने हड़बड़ा कर आंखें खोलीं। कुछ पलों के लिये समय का अन्दाज़ उसके दिमाग़ से ग़ायब हो गया था। वह कुछ समझ नहीं पा रही थी। सामने कबीर खड़ा था सूट और हैट में हाथ में बैग लिये। उसे लगा जैसे सुबह हो गई और कबीर दफ़्तर जाने के लिये तैयार है, “अरे कबीर, आप रात भर कमरे में आए ही नहीं ! मैं सोती ही रह गई। क्या दफ़्तर निकल रहे हैं ? ”

“अरे नहीं रीमा । मैं बस ‘धूप किनारे’ देखता रहा। मैंने दोनों वीडियो कैसेट देख डाले। अभी सुबह के चार बजे हैं। अब मैं भी सोता हूं। ”

“आपने दोनों वीडियो देख लिये ! मगर मैंने तो कहा था कि सुबह इकट्ठे बैठ कर देखेंगे। फिर इतनी जल्दी क्या थी। मैं तो आपके साथ एन्जॉय करना चाहती थी। ”

“अरे, तो इसमें कौन सा जुर्म हो गया। हम तुम्हारे साथ दोबारा देख लेंगे। कोई मना थो़ड़े ही किया है कि तुम्हारे साथ नहीं देखेंगे। ”

रीमा तड़प कर उठी। उसकी आंखों में एक अलग किस्म का दर्द था जिसे समझने के लिये दिल में सेंसेटिविटी होना बहुत ज़रूरी है। कबीर के लिये इस सूक्ष्म भावना को समझ पाना संभव नहीं था, “अरे अभी कहां जा रही हो। अभी तो सुबह होने में देर है। ”

उस दिन पहली बार रीमा ने कबीर के साथ सोने से इन्कार कर दिया। और वहीं आकर बैठ गई जहां थोड़ी देर पहले कबीर बैठ कर धूप किनारे का आनन्द ले रहा था। उसे ग़ुस्से के मारे उबकाई सी आ रही थी। आज उसने जी भर कर अपने माता-पिता को कोसा जिन्होंने अच्छी नौकरी, अमीर घर और बिरादरी से उसकी शादी कर दी थी। अगर वह ग़रीब होती और पति का प्यार मिलता तो क्या वह अधिक सुखी न होती।

“अरे ये सब चोंचले हैं। राज कपूर ने तो ग़रीबी को इतना ग्लैमोराइज़ कर दिया था कि इन्सान को ग़रीब होना बहुत रोमांटिक लगने लगता था। दो दिन रोटी नसीब न हो तो सारा का सारा रोमांटिसिज़्म उड़न छू हो जाए। दुनियां की एक ही सच्चाई है – पैसा। जिसके पास नहीं है, उससे पूछ कर देखो। पैसा नहीं तो घर में शांति नहीं, दिलों में प्यार नहीं।”

“हमारे घर में तो पैसे की कमी नहीं है। फिर हमारे घर में शांति क्यों नहीं है ? आपके पास तो बच्चों के लिये पांच मिनट का समय नहीं होता। क्या आपको पता है कि अयान कौन सी क्लास में पढ़ता है। हमारी बेटी की ज़रूरतें क्या हैं, आपने कभी सोचा है ?... आपको अपनी सेक्रेटरियों से फ़ुरसत मिले तो बात बने न।.. आप जैसे इन्सान को प्यार और मुहब्बत का अर्थ क्या पता !”

यह बहस कभी कभार का शग़ल नहीं थी। ये रोज़ाना का झगड़ा था। बच्चे अक़लमन्द हैं। उन्होंने कभी शिकायत ही नहीं की कि उनका पिता क्यों कभी उनके लिये मौजूद नहीं होता। उनके स्कूल के कामों के लिये मां है ; उनके खाने, पहनने, स्पोर्ट्स और टूर पर जाने के लिये सब कुछ मां करती है। भला उन्हें पिता की कमी खले तो कैसे खले। जब सब कुछ पूरा हो रहा हो, तो किसी की कमी भी क्यों खलेगी ?

स्कूल से पेरिस जाने का प्रोग्राम बना है। दोनों भाई बहनों ने अपना नाम लिखवा दिया है ट्रिप के लिये। पैसे मां से ले लिये हैं। ... इसी बात की तो अकड़ है कबीर की। अरे पैसे कमाता हूं। तुम लोगों पर ख़र्च करता हूं। और क्या करूं ? अबकी बार जब स्कूल से पेरिस जाने का कार्यक्रम बना तो दोनों ही बच्चों ने अपने नाम दे दिये। रीमा भी ख़ुश थी कि चलो दोनों इकट्ठे रहेंगे।

मगर तभी कबीर ने घोषणा कर दी, “रीमा, मैं दो हफ़्तों के लिये दिल्ली जा रहा हूं। वहां से मुंबई जाऊंगा। वो क्या है कि एअरलाईन की एक्सपेन्शन की बातचीत चल रही है मेरा वहां होना ज़रूरी है। ”

“मैं भी आपके साथ चलती हूं न। दो हफ़्ते मैं भी अपने मायके लगा आऊंगी। आजकल मां की तबीयत भी ठीक नहीं रहती है। ”

“सोचा तो मैंने भी पहले यही था। मगर वो क्या है कि इन्श्योरेंस वालों ने रूफ़ रिपेयर के लिये यही टाइम लिखा है। अभी वो लोग फंस रहे हैं, तो हम करवा लें। वर्ना हम कहते रहेंगे और उनके पीछे पीछे भागते रहेंगे। कुल तीन दिन का कह रहे हैं। ”

“तो ठीक है मैं काम करवा कर आ जाऊंगी। ... आप ही सोचिये, न तो आप यहां और न बच्चे। मैं करूंगी क्या?”

कबीर और बच्चे रीमा को अकेला छोड़ अपने अपने कामों पर निकल गये। अगली ही सुबह इन्श्योरेंस कम्पनी की तरफ़ से राजगीर आ पहुंचे। बाहर पाइप जोड़ कर खड़े होकर काम करने के लिये स्कैफ़ोल्डिंग तैयार करने लगे। खटर पटर की आवाज़ें आ रही थीं। काम करने वाले पूर्वी युरोप के लोग लग रहे थे। कुछ अलग सी भाषा में बातें कर रहे थे। रीमा के भीतर का भारतीय अभी भी जीवित था, “आप लोग चाय पियेंगे ? ”

एक ने मना कर दिया और दो ने कॉफ़ी की मांग कर दी। रीमा के लिये और भी आसान हो गया। एक की ब्लैक कॉफ़ी थी एक की व्हाइट। दोनों ही शक्कर नहीं लेते थे। रीमा ने फटाफट कॉफ़ी बना कर उनको पकड़ा दी। छत के ऊपर से अजब अजब आवाज़ें आ रही थीं। रीमा को अकेलापन काट रहा था। आज उसने सोच लिया है कि वह भी कबीर की तरह टीवी लगा कर लाइटें जला कर सोने का प्रयास करेगी। मगर उसे ऐसे माहौल में नींद कहां आती है।

“आप रात को इतनी ज़ोर से टेलिविज़न क्यों चलाते हैं?... सारी लाइटें भी जला कर सोते हैं। आपको नींद कैसे आती है ?... ”

“अपनी अपनी आदत है। ” कबीर की ढिठाई का मुकाबला भला कैसे करे रीमा।

“मैडम, एक बोतल पानी की मिलेगी?” एक बिल्डर की आवाज़ आई।

रीमा अपनी सोच से बाहर आई और पानी लाकर कारीगर को दे दिया। कबीर ने जाते जाते भी निर्देश देना नहीं छोड़ा था, “देखो जब एक बार ऊपर से टाइल्ज़ हट जाती हैं कोई भी चोर ऊपर से घर के भीतर पहुंच सकता है। आजकल चोरियां बहुत हो रही हैं। फिर हमारे घर में तो बहुत सी चीज़ों की इन्श्योरेंस भी नहीं करवाई हुई।”

रीमा को समझ नहीं आ रहा कि रात को क्या करेगी। पहले उसने सोचा कि बुशरा को ही बुला ले। दोनों सहेलियां रात भर बातें करेंगी समय बीतते कुछ पता ही नहीं चलेगा। फिर उसने अपने आपको समझाया कि डरने की क्या बात है। जो होगा देखा जाएगा।

रात को उसने कुछ ताज़ा नहीं बनाया। फ़्रिज में से बचा हुआ भोजन निकाला। एक प्लेट में चावल, आलू की तरकारी, और चिकन करी डाल कर माइक्रोवेव में अढ़ाई मिनट के लिये गरम की। थोड़ा सा खीरा भी काटा। खीरे को देखते हुए उसकी नज़रों के भाव कुछ पलों के लिये बदले। मगर फिर अपने भावों पर काबू पा कर चुपचाप खाना खाने लगी।.. उसने टीवी पर चैनल बदला। कोई रोमाण्टिक फ़िल्म आ रही थी। हीरो हीरोइन को वह पहचानती नहीं थी। चुम्बन का दृश्य देखकर उसे भी कुछ कुछ होने लगा। कुछ सोचा, फिर सिर को झटका दिया, टीवी बन्द किया और ऊपर सोने के लिये चल दी। बिस्तर पर लेटी और अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोचने लगी।

उसे अपनी ज़िन्दगी की सभी खट्टी मीठी यादें उसके साथ छेड़ख़ानी करती महसूस हुईं। बचपन, जवानी, विवाह और कबीर के साथ बिताई ज़िन्दगी। सब उसे गुदगुदाते, तड़पाते, परेशान करते और उसे आंखें बन्द कर लेने को विवश करते। क्या हर आदमी पचास की उम्र तक पहुंचते पहुंचते चुक जाता है? क्या हर औरत उसकी उम्र में आकर अधिक सेक्स चाहने लगती है ? ... उसके साथ की औरतें तो अपनी सेक्स लाईफ़ के किस्से चटख़ारे ले ले कर सुनाती हैं। वह बेचारी हर बार दिल मसोस कर रह जाती है।

अचानक रीमा की नींद टूटी। नीचे कोई बर्तन गिरने की आवाज़ हुई थी। पति की बात याद आई – घर का ख़ास ख़्याल रखना होगा। जब छत की टाइल्स निकली हों तो चोर आसानी से घर में आ सकते हैं। क्या नीचे कोई चोर है। हिम्मत नहीं हो रही कि बिस्तर छोड़ कर नीचे जाए। अगर सच में कोई हुआ तो क्या करेगी अकेली। अब लकड़ी के फ़र्श पर किसी के दबे पांव चलने की आवाज़ भी आने लगी है। कबीर कह भी रहा था कि यह फ़र्श ठीक नहीं बना। बहुत आवाज़ करता है। बिल्डर के साथ चिट्ठी पत्री भी चल रही है। लेकिन कम से कम पता तो चल रहा है कि नीचे कोई चल रहा है। कहीं कोई बिल्ली तो नहीं ? हो सकता है कि कोई लोमड़ी हो। रोज़ाना गार्डन में तो आती ही है। कहीं आज पीछे का दरवाज़ा खुला न छूट गया हो !

आवाज़ फिर आई। अगर एक से ज़्यादा लोग हुए तो क्या करेगी। अपना दरवाज़ा भीतर से बन्द कर लेती हूं, फिर कोई कैसे मुझे देख पाएगा। मगर यह तो शुतुरमुर्ग वाली बात हुई। कि मैं ख़तरे को नहीं देख पा रही तो इसका मतलब है कि ख़तरा भी मुझे नहीं देख पाएगा।

कोई सीढ़ियां चढ़ रहा है। अब क्या करे रीमा? अब तो उठ कर दरवाज़े तक जाने में भी ख़तरा हो सकता है। क्या अब कबीर और बच्चों से कभी मुलाक़ात नहीं हो पाएगी? क्या ज़रूरत थी अभी छत की टाइल्स बदलवाने की ? मुझे अकेला छोड़ गये यहां मरने के लिये ! बच्चों तुम्हारी मां तुमको मरते दम तक याद करेगी। वैसे कबीर के साथ रोज़ रोज़ मरने से कहीं अच्छी है एक बार की मौत।

आने वाला रुक गया है। पहले बेडरूम की तरफ़ बढ़ रहा है। शुक्र है कि बिटिया वहां नहीं है। वर्ना न जाने उसके साथ क्या सुलूक करता। कितनी निडरता से चलता जा रहा है उसके कमरे की तरफ़। क्या मेरे कमरे की तरफ़ भी आएगा ? मुंह से आवाज़ नहीं निकल पा रही। क्या बिल्कुल बेआवाज़ मौत लिखी है मेरी किस्मत में ?

अब कमरे में से कुछ ढूंढने की आवाज़ें आने लगी हैं। बेचारी बिट्टो के कमरे में से उसे भला क्या मिलेगा। उसके पास तो सोने के गहने भी नहीं हैं। मगर वह कुछ सोच कर थोड़े ही उस कमरे में गया है। अभी थोड़ी देर में यहां भी आता ही होगा।

क्या हर्ज है एक बार अपने कमरे का दरवाज़ा अन्दर से बन्द ही कर लूं। उसको पता भी नहीं चलेगा। और जब कमरा अन्दर से बन्द पाएगा तो शायद बाकी घर से माल लेकर मेरी जान बख़्श दे। मेरे कमरे में तो ब्रीफ़ेकेस भर गहने तो पड़े ही हैं। और कुछ हीरे भी तो हैं। अभी पिछले साल इटली से कुछ कोरल के सेट भी बनवाए थे। कहीं मेरी इज़्ज़त ......सिहर गई रीमा ।

हिम्मत की और कमरे के दरवाज़े तक पहुंच गई। हाथ बढ़ाया और दरवाज़े का हैण्डल पकड़ने का प्रयास किया। ... हाथ में एक इन्सानी हाथ आ गया। मुंह से चीख़ निकली। दूसरे हाथ ने मुंह दबा दिया। पल भर में वह चोर की गिरफ़्त में थी। चोर ने अपने जमैका वाले लहजे में कहा, “आवाज़ नहीं, अगर आवाज़ निकाली, जान से मार दूंगा। ”

रीमा के तो होश ही उड़ गये। आवाज़ हलक से बाहर नहीं निकल पा रही थी। अचानक उसके पांव धर्ती से उखड़ गये और वह लड़खड़ा गई। एकाएक बदलती स्थिति में उसका बायां वक्ष चोर के हाथ में था। चोर ने आव देखा न ताव, रीमा की आवाज़ रोकने के लिये अपने होंठों से उसके होंठों को भींच कर दबा दिया। रीमा इस नई स्थिति के लिये बिल्कुल तैयार नहीं थी। वह जितना उस चोर की गिरफ़्त से बाहर निकलने की कोशिश कर रही थी; उसके वक्ष और होंठों पर दबाव उतना ही सख़्त होता जाता। उसे लगा कि उसका दम घुट जाएगा।

अब तक शायद चोर स्थिति को समझ चुका था। वह इस इरादे से कतई नहीं आया था। वह सीधी सादी चोरी करने के लिये आया था मगर क़ुदरत ने उसके भाग्य में कुछ और ही धर दिया था। उसने आहिस्ता से रीमा को बिस्तर पर लिटा दिया। डरी हुई रीमा अधिक प्रतिरोध भी नहीं कर पा रही थी। चोर ने एक बार उसके होंठों को कुछ पलों के लिये छोड़ा। रीमा ने किसी तरह एक लम्बी सांस ली और अपने आपको व्यवस्थित करने का प्रयास किया।

मगर अब तक चोर को रीमा के बदन की ख़ुशबू का अहसास हो चुका था। उसने आहिस्ता से रीमा के सिर को ऊपर उठाया और उसके होंठों को चूसने लगा। उसका एक हाथ रीमा के बदन पर रेंग रहा था। डरी हुई रीमा के बदन में भी कसाव महसूस होने लगा था। रीमा की सांसें ज़ोर ज़ोर से चलने लगी थीं। उसके कान गरम हो चले थे। अचानक चोर को रीमा की तरफ़ से भी दबाव महसूस हुआ। रीमा भी चोर के बदन को महसूस करने का प्रयास कर रही थी। वह पल भर के लिये चकराया। मगर फिर उस दबाव का आनन्द लेने लगा। अब आहिस्ता आहिस्ता उसका हाथ नीचे की तरफ़ सरकने लगा। रीमा के बदन में एक विस्फोट सा होने लगा था। उसे चोर के बोलने के अंदाज़ और बदन की महक से अंदाज़ा हो गया था कि वह जमैका का कोई काला नौजवान है। उसने कभी कबीर के साथ ब्लू फ़िल्म में काले मर्द को नंगा देखा था। आज वह स्वयं एक काले मर्द की आग़ोश में थी।

रीमा की गरमाहट अब पिघलने लगी थी। पूरी तरह गीली हो चुकी रीमा अब उस चोर को अपने अन्दर महसूस कर रही थी। कुछ पलों में ही जो कुछ एक ब्लात्कार की तरह शुरू हुआ था, अब आनन्ददायी रतिक्रिया में परिवर्तित हो चला था। लगभग एक दशक के बाद रीमा को सेक्स का सुख मिल रहा था और वह उसका पूरा आनन्द उठा रही थी। रीमा की सुख से परिपूर्ण सिसकियों के अलावा वातावरण में और कोई आवाज़ नहीं सुनाई दे रही थी। चोर अब पूरी शिद्दत से रीमा को सुख दे रहा था। रीमा की सिसकारियां और चोर की मज़दूर जैसी आवाज़ें घर की दीवारों से टकरा कर एक अलग किस्म का संगीत उत्पन्न कर रही थीं।

रीमा ने चार बार आनन्द की अनुभूति महसूस की। हर बार उसने चोर को दबाव दे कर कुछ पलों के लिये रोका। अब चोर ने पहली बार आवाज़ निकाली, “अब मैं नहीं रुक सकता। मैं भी आ रहा हूं।” रीमा पांचवीं बार चोर के साथ साथ आई और ज़ोर से चिल्लाई।

सब कुछ थम गया। चोर उठा और अन्धेरे में रीमा की तरफ़ देखने लगा। उसके शरीर का रंग कमरे के अन्धेरे का हिस्सा ही बन गया था। रीमा ने इशारे से उसे बाथरूम का दरवाज़ा दिखाया।

चोर साफ़ हो कर, हाथ मुंह धोकर, तौलिये से पोंछ कर बाथरूम से बाहर निकला। उसने चोरी का सामान वहीं छोड़ दिया और घर के मुख्य द्वार की तरफ़ बढ़ने लगा।

रीमा ने कुछ पलों के लिये चोर की पीठ को देखा ; कुछ सोचा और कहा, “सुनो, कल फिर आना ! ”

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परिचय - तेजेन्द्र शर्मा

जन्म / बचपन :

21 अक्टूबर 1952 को पंजाब के शहर जगरांव के रेल्वे क्वार्टरों में। पिता वहां के सहायक स्टेशन मास्टर थे। उचाना, रोहतक (अब हरयाणा में) व मौड़ मंडी में बचपन के कुछ वर्ष बिता कर 1960 में पिता का तबादला उन्हें दिल्ली ले आया । पंजाबी भाषी तेजेन्द्र शर्मा की स्कूली पढ़ाई दिल्ली के अंधा मुग़ल क्षेत्र के सरकारी स्कूल में हुई।

शिक्षा:

दिल्ली विश्विद्यालय से बी.ए. (ऑनर्स) अंग्रेज़ी, एवं एम.ए. अंग्रेज़ी, कम्पयूटर कार्य में डिप्लोमा ।

प्रकाशित कृतियां :

काला सागर (1990) ढिबरी टाईट (1994), देह की कीमत (1999) यह क्या हो गया ! (2003), बेघर आंखें (2007), सीधी रेखा की परतें (2009 - तेजेन्द्र शर्मा की समग्र कहानियां भाग-1), क़ब्र का मुनाफ़ा (2010) सभी कहानी संग्रह । ये घर तुम्हारा है... (2007 - कविता एवं ग़ज़ल संग्रह)। दीवार में रास्ता (कहानी संग्रह – 2012).

अनूदित कृतियां :

ढिबरी टाइट, एवं कल फेर आणा नाम से पंजाबी, इँटों का जंगल नाम से उर्दू तथा पासपोर्ट का रंगहरू नाम से नेपाली में भी उनकी अनूदित कहानियों के संग्रह प्रकाशित हुए हैं। तेजेन्द्र शर्मा की कहानियां उड़िया, मराठी, गुजराती, चेक भाषा एवं अंग्रेज़ी में भी अनूदित हो चुकी हैं।

संपादन समुद्र पार रचना संसार (2008) (21 प्रवासी लेखकों की कहानियों का संकलन)। यहां से वहां तक – (2006-ब्रिटेन के कवियों का कविता संग्रह), ब्रिटेन में उर्दू क़लम (2010), समुद्र पार हिन्दी ग़ज़ल (2011), प्रवासी संसार – कथा विशेषांक (2011)। सृजन संदर्भ पत्रिका का प्रवासी साहित्य विशेषांक (2012)।

अंग्रेज़ी में : 1. Black & White (biography of a banker – 2007), 2. Lord Byron - Don Juan (1976), 3. John Keats - The Two Hyperions (1977)

*कहानी अभिशप्त चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के एम.ए. हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल।

तेजेन्द्र शर्मा के लेखन पर उपलब्ध पुस्तकें

  1. तेजेन्द्र शर्मा – वक़्त के आइने में (संपादकः हरि भटनागर), 2. रचना समय – तेजेन्द्र शर्मा विशेषांक (संपादकः हरि भटनागर), 3. बातें (तेजेन्द्र शर्मा के साक्षात्कार) – संपादकः मधु अरोड़ा 4. हिन्दी की वैश्विक कहानी (संदर्भ तेजेन्द्र शर्मा का रचना संसार) – संपादकः नीना पॉल।

अन्य लेखन:

दूरदर्शन के लिये शांति सीरियल का लेखन ।

तिविधियां :

अन्नु कपूर द्वारा निर्देशित फ़िल्म अभय में नाना पाटेकर के साथ अभिनय। बी.बी.सी. लंदन, ऑल इंडिया रेडियो, व दूरदर्शन से कार्यक्रमों की प्रस्तुति, नाटकों में भाग एवं समाचार वाचन।

ऑल इंडिया रेडियो, व सनराईज़ रेडियो लंदन से बहुत सी कहानियों का प्रसार‌ण ।

पुरस्कार/सम्मान:

  1. ढिबरी टाइट के लिये महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार - 1995 प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों ।
  2. सहयोग फ़ाउंडेशन का युवा साहित्यकार पुरस्कार - 1998
  3. सुपथगा सम्मान - 1987
  4. कृति यू.के. द्वारा वर्ष 2002 के लिये बेघर आंखें को सर्वश्रेष्ठ कहानी का पुरस्कार।
  5. प्रथम संकल्प साहित्य सम्मान – दिल्ली (2007)
  6. तितली बाल पत्रिका का साहित्य सम्मान – बरेली (2007)
  7. भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा डॉ. हरिवंशराय बच्चन सम्मान (2008)

विशेष :

वर्ष 1995 से भारत में 40 वर्ष से कम उम्र के कथाकारों के लिये इंदु शर्मा कथा सम्मान की स्थापना। लंदन में प्रवासी हो जाने के पश्चात नई शताब्दी के साथ ही इंदु शर्मा कथा सम्मान को अंतर्राष्ट्रीय स्वरू‏प दिया गया। वर्ष 2000 से ही इंगलैंड में रह कर हिन्दी साहित्य रचने वाले साहित्यकारों को सम्मानित करने हेतु पद्मानंद साहित्य सम्मान की शुरू‏आत की गई। अंर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान एवं पद्मानंद साहित्य सम्मान का आयोजन अब प्रति वर्ष ब्रिटेन के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में आयोजित किया जाता है।

कथा (यू.के.) के माध्यम से लंदन में निरंतर कथा गोष्ठियों, कार्यशालाओं एवं साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन । लंदन में कहानी मंचन की शुरू‏आत वापसी से की। लंदन एवं बेज़िंगस्टोक में, अहिंदीभाषी कलाकारों को लेकर एक हिंदी नाटक हनीमून का सफल निर्देशन एवं मंचन ।

अंर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन :

1999 में लन्दन विश्व हिन्दी सम्मेलन, 2002 में त्रिनिदाद में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में शिरकत की। लंदन, मैनचेस्टर, ब्रैडफ़र्ड व बरमिंघम में आयोजित कवि सम्मेलनों में कविता पाठ ।यॉर्क विश्विद्यालय में कहानी कार्यशाला करने वाले ब्रिटेन के पहले हिन्दी साहित्यकार। बर्मिंघम में रवीन्द्र कालिया एवं ममता कालिया के साथ संयुक्त रूप से हिन्दी कार्यशाला का संचालन।

2010 में डी.ए.वी. गर्ल्ज़ कॉलेज, यमुना नगर के साथ मिल कर कथा यू.के. ने 3-दिवसीय प्रवासी कथा सम्मेलन का आयोजन किया। 2012 में एस.आई.ई.एस. कॉलेज, मुंबई के साथ मिल कर 2-दिवसीय प्रवासी साहित्य सम्मेलन का आयोजन।

संप्रतिः ब्रिटिश रेल (लंदन ओवरग्राउण्ड) में कार्यरत।

संपर्क : 27 Romilly Drive, Carpenders Park, Watford WD19 5EN, United Kingdom.

 

E-mail: kahanikar@gmail.com , kathauk@gmail.com

Website: www.kathauk.connect.to

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लोग मेरे लोग

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दिनकर कुमार

 

 

और मैं सोचा करता था
निहायत सरल शब्द
होंगे पर्याप्त।
जब मैं कहूं, क्या है
हरेक का दिल जरूर चिंथा-चिंथा होगा।
कि तुम डूब जाओगे
अगर तुमने लोहा न लिया
वह तो तुम देख ही रहे हो।
-बेर्टोल्ट ब्रेष्ट

 

 

मां और बाबूजी के लिए

 


अनुक्रम

अपनी आवाज में    1
सारा देश रियल इस्टेट    2
एक एंटेलियो होता है    3
इस विज्ञापन जगत में तुम कहां हो मनुष्य    5
मुझे अभाव से डर नहीं लगता    6
अपनी ही संतानों की    7
अरे ओ अभागे    8
मुझे मत उछालो    9
मैं अन्ना हूं मैं अन्ना नहीं हूं    10
वेनिस का सौदागर    12
कभी-कभी ऐसा भी होता है    14
तुम प्रजा हो तुम क्या जानो    15
आवारा पूंजी के उत्सव में    16
स्विस बैंकों तक बहने वाली खून की नदी में    18
अपनी शामों को बंधक रखकर    19
टुच्ची दुनियादारी से जब फुरसत मिल जाएगी    20
मेरी उदासी को किसी साज पर बजाया जाता    21
ग्वांतानामो    22
रूपट मर्डोक    23
जलबंदी    25
वर्ष का क्रूरतम महीना होगा मई    26
वह जो फेसबुक का साथी है    28
पी. साईंनाथ के साथ    29
शहर में जीना    30
एक दिन बचेगा    31
बारिश उतर रही है    32
दासता की जंजीर    33
जीवन का कोलाज    34
अतिमानव बनने की धुन में    35
रुग्ण समाज क्या देगा किसी को    36
बाढ़ और आंसू में डूबे हुए    37
ज्ञान के साथ बलात्कार करने के बाद    38
मुल्क की सबसे बड़ी पंचायत में    39
बाजार सबको नचाता है    40
रूहुल अली को मैंने देखा था    41
मोमबत्ती जुलूस में जो शामिल हैं    42
वे जो हमें नायक की तरह नजर आते हैं    43
जो भ्रष्ट हैं    44
जश्न मनाने के बाद    45
कवि चुप था    46
प्रिय ऑक्टोपस    47
घृणा के साथ सहवास संभव नहीं    48
मूर्तियों के शहर में    49
नाचघर    50
जीवित रहने का प्रस्ताव    51
तलाश    52
गुवाहाटी की शाम    54
इन दिनों    55
युद्ध    56
टीन की छत    58
डायनासोर    59
यह जो प्रेम है    60
जगजीत सिंह को सुनने के बाद    61
वे दंगाप्रिय ईश्वर के उपासक हैं    62
अपहरण    63
भूख मेरी प्रतीक्षा कर रही होगी    64
भूपेन हजारिका    65
शीतल पेयजल पीता है सूरज    67
भय जब दस्तक देता है    69
खुशी प्रायोजित की जाएगी    71
नृशंसता के जंगल में    73
पोवाल दिहिंगिया    74
एकता कपूर का ककहरा    75
करुणा बचाकर रखो    77
प्रिय भूख, तुम नहीं जीतोगी    78
दुनिया की सबसे हसीन औरत    ७९
आइए हम जनहित याचिका दायर करें    80
सूनी हवेलियां    81
जंगल में अकेले    82
देव प्रसाद चालिहा    84
धरती की तबियत ठीक नहीं है    86
हथेली    87
परिचय    89
मेरे सतरंगे सपने    91
सोमालिया में जेन फोंडा    92
स्कूल में गोलीबारी    93
प्रवासी मजदूर भजन गाते हैं    94
लुभावने वादों का पार्श्वसंगीत    95
बर्बर भी करते हैं शांतिपाठ    96
जिंदा रहते हैं सपने    97
सपनों का शिलान्यास    98

 

 

अपनी आवाज में

अपनी आवाज में चाहता हूं कुछ असर पैदा हो
जो कहूं तुम्हारे दिल को छू जाए
मेरी भर्राई आवाज की अनकही पीड़ा
तुम्हारे कलेजे तक संप्रेषित हो जाए।

चाहता हूं थोड़ी सी करुणा तुलसीदास जैसी
मेरी आवाज में भी घुल जाए
जिसे सुनते ही तुम्हारे भीतर हूक सी उठे
जिसे व्यक्त करने से अधिक
महसूस किया जाए

चाहता हूं थोड़ा सा लहू गालिब की तरह
मेरी आंखों से भी टपके
दुनियादारी की उलझी पहेली को झटक कर
मस्त फकीरी की राह पर मेरे कदम बढ़े

अपनी आवाज में चाहता हूं कुछ असर पैदा हो।

 

सारा देश रियल इस्टेट

सारा देश रियल इस्टेट
मानचित्र पर क्यों रहें
धान के लहलहाते हुए खेत
कल कल बहती हुई नदियां
ताल-तलैया, झील-पोखर
हरियाली का जीवन

सारा देश रियल इस्टेट
उन्हें उजाड़ने की आदत है
वे उजाड़कर दम लेंगे
फसल की जगह फ्लैट उगाएंगे
एक्सप्रेस वे बनाएंगे
रिसॉर्ट और फन सिटी बसाएंगे

सारा देश रियल इस्टेट
कैसी माटी किसकी माटी
कैसी धरती कैसी माता
कैसा देश किसका तंत्र
भूमाफिया का देश
बिल्डर का तंत्र
बाकी प्रजा रहे दीन-हीन
उनके अधीन उनके अधीन।

 

एक एंटेलियो होता है

हर धनपिशाच के सपने में
एक एंटेलियो होता है
वह निचोड़ लेना चाहता है
मजबूर आबादी का खून और दीवारों
की सजावट करना चाहता है
वह चूस लेना चाहता है प्रजा के हिस्से का
सारा भूजल
और अपने बगीचे के आयातित फूलों को
सींचना चाहता है

हर धनपिशाच के सपने में
एक एंटेलियो होता है
वह गरीबों के मानचित्र पर एक समृद्धि का टापू
बसाना चाहता है
समस्त संसाधनों की चाबी अपनी मुट्ठी में बंद कर
फोर्ब्स पत्रिका के मुखपृष्ठ पर
अपनी तस्वीर छपवाना चाहता है

हर धनपिशाच के सपने में
एक एंटेलियो होता है
जिसे वह संसार का आठवां आश्चर्य
बनाना चाहता है
जिसकी अश्लील बनावट पर वह इतराना चाहता है
जिसके अनगिनत कक्षों में वह किसी प्राचीन सम्राट की तरह
अपना हरम सजाना चाहता है
दास-दासियों की फौज रखना चाहता है

हर धनपिशाचा के सपने में
एक एंटेलियो होता है।


इस विज्ञापन जगत में तुम कहां हो मनुष्य

इस विज्ञापन जगत में तुम कहां हो मनुष्य
कहां है अभाव में थरथराती हुई तुम्हारी गृहस्थी
जीवन से जूझते हुए कलेजे से निकलने वाली गाहें
कहां हैं रक्तपान करने वाली व्यवस्था का चेहरा

अगर है तो केवल है सिक्कों की खनखनाहट
अघाई हुई श्रेणी की ऐय्याशियों की सजावट
झूठी घोषणाओं को ढकने के लिए अमूर्त चित्रांकण
कोढ़ियों और भिखारियों की पृष्ठभूमि में पर्यावरण का रेखांकन
एलसीडी स्क्रीन पर झिलमिलाती हुई वस्तुएं
किस्त में कारें किस्त में फ्लैटें किस्त में
उपलब्ध हैं समस्त महंगे सपने सौदागर बन गए हैं बहेलिए
कदम-कदम पर बिछाए गए हैं जाल
चाहे तो इसे हादसा कहो या कहो खुदकुशी
तुम्हारी अहमियत कुछ भी नहीं मरोगे तो मुक्ति मिले या न मिले
आंकड़े में शामिल जरूर हो जाओगे

इस विज्ञापन जगत में तुम कहां हो मनुष्य
हिंसक पशुओं को देख रहा हूं गुर्राते हुए रेंगते हुए
गिड़गिड़ाते हुए यह कैसी क्षुधा है जिसकी भट्ठी में
समाती जा रही है जीवन और प्रकृति की समस्त सहज भावनाएं
नष्ट होती जा रही है सहजता-संवेदना
पसरता जा रहा है अपरिचय का ठंडापन
इस विज्ञापन जगत में तुम कहां हो मनुष्य ।

 

मुझे अभाव से डर नहीं लगता

मुझें अभाव से डर नहीं लगता
न ही घबराता हूं मैं जीवन के झंझावातों से
न ही रौंद सकता है बाजार मुझे अपने नुकीले पहियों से
मुझे तंत्र की चालाकियां समझ में आती हैं
मैं हर आश्वासन में छिपे झूठ को पढ़ सकता हूं
मुझे डर नहीं लगता बेरोजगारी से विस्थापन से
मुझे धनपशुओं की मुस्कराहट से डर लगता है

मैं विपदा की कलाई मरोड़ सकता हूं
ठोकर खाकर गिरकर संभल सकता हूं
वक्त के बेरहम खरोचों से धीरे-धीरे उबर सकता हूं
मैं उदास रातों में भी सबेरे का गीत गुनगुना सकता हूं
सफर की यंत्रणा के बीच भी संभाल कर रख सकता हूं सपनों को
मैं जमाने का तिरस्कार सहकर भी साबूत बचा रह सकता हूं
मैं इस अमानवीय धरती पर
मानवता की पवित्र भावनाओं को कलेजे में सहेजकर रख सकता हूं
फिर भी मुझे धनपशुओं की उदारता से डर लगता है।

 

अपनी ही संतानों की

अपनी ही संतानों की हत्या करेगा लोकतंत्र
क्योंकि शर्म छिपाने के लिए अब उसके पास
संविधान की कोई धारा नहीं बची रह गई है
उसके धूर्त और वाचाल वकीलों के पास
बचे नहीं रह गए हैं असरदार तर्क
बेअसर हो गए हैं उसके सारे प्रलोभन
उसके झूठे वादों पर रह नहीं गया है
किसी को भी ऐतबार

अपनी ही संतानों की हत्या करेगा लोकतंत्र
क्योंकि संतानों के असुविधाजनक सवालों का
कोई संतोषजनक जवाब उसके पास नहीं है
वह पंचतंत्र के न्याय को उचित ठहराने की
कोशिश करते-करते नाकाम हो चुका है
वह ताकतवर वर्ग की बंधक बनकर इस कदर
लाचार हो चुका है कि अपनी ही संतानों के प्रति
उसके मन में रह नहीं गई है दया-ममता

अपनी ही संतानों की हत्या करेगा लोकतंत्र
जिन संतानों के भविष्य को संवारने की
जिम्मेदारी लोकतंत्र की ही थी
जिन संतानों को बराबरी का हक देने का
वादा कभी लोकतंत्र ने ही किया था
जिन संतानों ने उम्मीद भरी नजरों से उसकी तरफ देखा था और
उसकी परिभाषा पर भरोसा किया था।

 

अरे ओ अभागे

अरे ओ अभागे
छोटे-छोटे हाथों से कैसे पकड़ोगे आकाश
कैसे उठाओगे
दुःख की शिला को
फिर कैसे चल पाओगे तनकर

इतने बड़े-बड़े सपने आंखों में लेकर
तुच्छता की धरती पर
कब तक करते रहोगे
छोटी-छोटी बातों के लिए समझौते
कब तक अंधेरे के भार से दबकर
सहन करते रहोगे विवशता की ग्लानि

अरे ओ अभागे
विचलित कर देने वाले परिवेश में
कैसे संभालोगे
संवेदनाओं की गहरी
करुणा की दृष्टि
सीने में धड़कती हुई चाहत।


मुझे मत उछालो

मुझे मत उछालो सराहना के झूले पर
कहीं हो न जाए मुझे झूठा गुमान
कहीं बिगड़ न जाए मेरा संतुलन
कहीं मैं मुग्ध न हो जाऊं अपने आप पर

अगर दे सकते हो तो दो थोड़ा सा अपनापन
मेरे थके हुए वजूद को थोड़ी सी छाया
मेरे नम सपनों को थोड़ी सी धूप
उदासी की घड़ियों में दो मीठे बोल

मुझे मत उछालो सराहना के झूले पर
कहीं मैं भूल न जाऊं अपनी राह
कहीं मैं भ्रमित होकर पड़ाव को ही न मान लूं मंजिल
कहीं ओझल न हो जाएं मेरे आदर्श

मुझे मत उछालो सराहना के झूल पर।


मैं अन्ना हूं मैं अन्ना नहीं हूं

मैं अन्ना हूं मैं अन्ना नहीं हूं
मैं कभी देश भक्ति का अवतार बनना चाहता हूं
कभी देश को कुतर जाना चाहता हूं चूहा बनकर
अवसरवाद की सीढ़ियों पर चढ़कर
अपने समस्त भ्रष्ट आचरण को
तर्क संगत साबित करना चाहता हूं
कभी भीड़ में तख्ती उठाकर
नारे लगाना चाहता हूं कभी बिल में दुबककर
चुपचाप तमाशा देखना चाहता हूं

मैं अन्ना हूं मैं अन्ना नहीं हूं
मैं इसलिए अन्ना हूं क्योंकि
मैं तस्वीर बदलना चाहता हूं
मैं इसलिए अन्ना नहीं हूं
क्योंकि जानता हूं
इस तरह तस्वीर बदल नहीं सकती
टोपी लगाकर तख्ती उछालकर
रातों-रात तमाम शातिर लोग
हृदय परिवर्तन का दावा नहीं कर सकते

मैं अन्ना हूं मैं अन्ना नहीं हूं
मैं इसलिए अन्ना हूं क्योंकि
मैं दशकों की पीड़ा को व्यक्त करना चाहता हूं
मैं झूठ के चेहरे से मुखौटे को
उतार देना चाहता हूं
मैं इसलिए अन्ना नहीं हूं
क्योंकि जानता हूं
लिजलिजी भावुकता से कोई फर्क नहीं पड़ सकता
त नो किसानों की आत्महत्या रुक सकती है
न तो लोकतंत्र अपनी ही संतानों की
हत्या करना रोक सकता है।

 

वेनिस का सौदागर

वेनिस का सौदाकर मेरा पीछा करता है
शायद तुम्हारा भी
उसके होंठोें पर खेलती रहती है हर पल
एक क्रूर मुस्कराहट जिस मुस्कराहट में
लहराता रहता है एक अदृश्य चाबुक
इसी चाबुक से वह मुझे डराना चाहता है
बात-बात पर
छीन लेना चाहता है मेरे शरीर का रक्त और मांस
मेरे सीने का समस्त ऑक्सीजन

वेनिस का सौदागर मेरा पीछा करता है
बहुरुपिए की तरह
मेरी दिनचर्या के हरेक मोड़ पर
वह टकरा जाता है मुझसे
वह मेरी हरेक सांस पर नजर रखता है
मेरी छोटी-छोटी खुशियों की भी
कीमत निर्धारित करता है और फिर
चक्रवृद्धि ब्याज के तराजू पर तौलता है
मेरी वजूद मेरी औकात

वेनिस का सौदागर मेरा पीछा करता है
मैं उम्मीद करता हूं कि एक दिन
उसके भीतर भी करुणा का जन्म होगा
एक दिन संवेदना धो डालेगी उसकी समस्त क्रूरता को
मगर युगों-युगों से वह वेश बदलकर
सीधे-सरल लोगों का रक्त पीते-पीते
इस कदर नृशंस बन चुका है कि
अब उसके सीने में दिल की जगह
धड़कता है सिक्का
वह जब स्वयं मनुष्य नहीं रहा तो
हम सबको कैसे मनुष्य समझ सकता है।

 

कभी-कभी ऐसा भी होता है

कभी-कभी ऐसा भी होता है
धूप की तरह उजली मुस्कराहट
धो देती है हमारे भीतर के जहर को
किसी की आंखों में कौंधने लगते हैं
लाखों सितारे और
हमारे भीतर मिटने लगता है
उदासी का अंधेरा

कभी-कभी ऐसा भी होता है
सभाकक्ष में गूंजती हुई तालियां
किसी अपरिचित की गर्मजोशी में सराबोर
सराहना की बोली सुनकर
भाप की तरह उड़ने लगता है
तुच्छता का बोध

कभी-कभी ऐसा भी होता है
जब पृथ्वी उदारता के साथ
एक टक देखती है हमें
केवल संकेतों से आश्वस्त करती है
कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है
कि तुम बिलकुल अकेले नहीं हो।

 

तुम प्रजा हो तुम क्या जानो

तुम प्रजा हो तुम क्या जानो
क्या होता है संविधान
क्या होता है राजदंड
सता की देवी का चुंबन
राजकोष का सम्मोहन
तुम प्रजा हो तुम क्या जानो
क्या लोकतंत्र क्या लूटतंत्र
केवल राज करेगा ताकतवर
कागज पर रोती आजादी
अंधियारे में छिपते सत्यपुरुष
संसद में केवल खलनायक
तुम पूजा हो तुम क्या जानो
कोई क्यों देगा तुमको हक
देश में इज्जत से जीने का
तुम तो केवल हो ऐसी सीढ़ी
जो सिंहासन तक पहुंचती है
तुम प्रजा हो तुम क्या जानो
तुम सीधी हो तुम भोली हो
ये धूर्त भी हैं चालाक भी हैं
वे क्रूर भी हैं ऐय्याश भी हैं
वे हिंसक पशुओं के वंशज हैं
तुत प्रजा हो तुम क्या जानो।

 

आवारा पूंजी के उत्सव में


आवारा पूंजी के उत्सव में दबकर रह जाती है
कमजोर नागिरकों की सिसकी
असहाय कंठ की फरियादें
वंचित आबादी की अर्जी

आवारा पूंजी के पोषक मंद मंद मुस्काते हैं
कुछ अंग्रेजी में बुदबुदाते हैं
शेयर बाजार का चित्र दिखाकर आबादी को धमकाते हैं
कहते हैं छोड़ो जल-जमीन
नदियां छोड़ो जनपद छोड़ो
झोपड़पट्टी से निकलो बाहर
बसने दो शॉपिंग माल यहां
रियल इस्टेट का स्वर्ग यहां
यह कैसी भावुक बातें हैं
अपनी जमीन है मां जैसी

आवारा पूंजी के साये में
कितना बौना है लोकतंत्र
कितना निरीह है जनमानस

आवारा पूंजी के साये में
पलते-बढ़ते अपराधीगण
अलग-अलग चेहरे उनके
अलग-अलग हैं किरदारें
बंधक उनकी है मातृभूमि
उनके कब्जे में संसाधन

कैसे कहें आजाद हैं हम?

 

स्विस बैंकों तक बहने वाली खून की नदी में

स्विस बैंकों तक बहने वाली खून की नदी में
थोड़ा खून मेरी धमनियों का भी है
थोड़ा मेरे पूर्वजों का
थोड़ा मेरे ग्रामीणों का
थोड़ा मेरे शहर के निवासियों का
थोड़ा-थोड़ा खून एक अरब भाई-बहनों का

यह खून की नदी इतनी साफ-साफ नजर आती है
फिर भी जांच आयोग बनाने को लेकर
पंजे लड़ाने लगती है
न्यायपालिका से कार्यपालिका
बयानों का शोर मचाकर
नदी के होने न होने का
संशय पैदा किया जाता है

जबकि इस नदी को इस खून की नदी को
मैं उसी तरह महसूस कर सकता हूं
जिस तरह महसूस की जाती है हवा
बारिश धूप चांदनी
लालच की लपलपाती जुबान
कत्लगाह में खून से सराबोर हथियार
गुलाम बनाने वाली निगाहों की सिकुड़न
अभावग्रस्त चेहरे की बेचैनी।

 

अपनी शामों को बंधक रखकर

अपनी शामों को बंधक रखकर
न जाने कितनी अनुभूतियों से वंचित हो गया हूं
जब मैं शाम की परी को आंचल लहराते हुए
देख सकता था
जब मैं अमलतास के पेड़ों पर खिले आग के रंग
के फूलों को अंधरे में दहकते हुए देख सकता था

अपनी शामों को बंधक रखकर
प्रेक्षागृह के अंधरे में बैठकर नाटक का उपभोग करने से
वंचित हो गया हूं
कॉफी हाउस में सिगरेट के धुएं के बीच
जीवंत बहस का हिस्सा बनने से
वंचित हो गया हूं

अपनी शामों को बंधक रख कर
कांच के पिंजड़े में वातानुकूलन यंत्र की घरघराहट
सुनते हुए
तुच्छ सुविधाओं कं खोखलेपन पर
अपने आप से ही सवाल करते हुए
किसी पंछी की तरह मुक्त गगन में
उड़ने का ख्वाब देख रहा हूं।

 

टुच्ची दुनियादारी से जब फुरसत मिल जाएगी

टुच्ची दुनियादारी से जब फुरसत मिल जाएगी
मैं हरियाली से मिलने
नदियों से बातें करने
मौसम की बांह पकड़कर
एक दिन चला जाऊंगा

निर्मल जल के दर्पण में
आकाश की रंगत देखूंगा
चिड़ियों की बोली सुन-सुनकर
सूखे पत्तों पर चलते हुए
वीरानी का मंजर देखूंगा

टुच्ची दुनियादारी से जब फुरसत मिल जाएगी
जब कुछ कम हो जाएगी
सीने के भीतर जलन की अनुभूति
जब झुंझलाहट की वजह से
विकृत हुए मेरे चेहरे पर
सहजता रखेगी अपनी हथेली
जब यंत्र की पोशाक को फेंककर
किसी शिशु की तरह
पीछे मुड़े बिना
एक दिन चला जाऊंगा।

 

मेरी उदासी को किसी साज पर बजाया जाता

मेरी उदासी को किसी साज पर बजाया जाता
तो कुछ तो बोझ हल्का होता
कुछ तो जीवित रहने के समर्थन में
निर्मित होता वातावरण
कुछ तो घट जाती अमानवीयता

नहीं तो कर्कश दिनचर्या का बेरहम बर्ताव
अनवरत जारी रहता है
स्वार्थ की सूली उठाकर लपकते रहते हैं
शुभचिंतक चेहरे
अगवा किए गए शासनतंत्र के नियमों को ही
बताया जाता है धर्मग्रंथों की तरह पावन-पवित्र
अर्द्धसत्यों का नगाड़ा बजता रहता है चतुर्दिक
खुशहाली का विज्ञापन चील की तरह
झपटता रहता है अपनी चोंच में दबाने के लिए

मेरी उदासी को किसी साज पर बजाया जाता
मोमबत्ती की तरह ही पिघल जाती स्याह रंग वाली जड़ता
कुछ तो शर्म करता कायर दिमाग
छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए
अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रखते हुए
जीवित रहने की अनिवार्य शर्त समझौते को बताकर
तिल-तिलकर मरते हुए
मेरी उदासी को किसी साज पर बजाया जाता।

 

ग्वांतानामो

ग्वांतानामो एक दुःस्वप्न है मानवता के लिए
शक्ति के अहंकार की उल्टी करता हुआ एक देश
अपनी विकृतियों को ही न्याय का नाम देता है
नृशंसता की हदों को लांघते हुए
वह चाहता है उसके डर से
थरथर कांपने लगे पृथ्वी
उसकी अनुमति से बहे हवा
उसकी मर्जी के बगैर न उगे न डूबे सूरज

नहीं तो अलग-अलग देशों के अनगिनत नागरिक
निर्दोष होते हुए भी महज संदेह के आधार पर
क्यों सड़ते रहे हैं ग्वांतानामो में
क्यों उनके सिर को पानी में डालकर
झटके दिए जाते रहे हैं
क्यों उनके बदन में खतरनाक दवाओं का प्रयोग
किया जाता रहा
क्यों उन्हें मनुष्य की जगह
प्रयोगशाला का चूहा समझा जाता रहा है
क्यों ठुकराई जाती रही है उनकी न्याय की अर्जी

ग्वांतानामो एक दुःस्वप्न है मानवता के लिए
जहां सर्वशक्तिमान परखता है अपनी बर्बरता को
जिस तरह बहेलिया पकड़ता है पक्षी को
जिस तरह शिकारी खेलता है शिकार के साथ
जिस तरह नाजियों के यातना गृहों में तड़पती थी मानवता
ग्वांतानामो एक दुःस्वप्न है मानवता के लिए।

 

रूपट मर्डोक

रूपर्ट मर्डोक शार्मिंदा नहीं हैं
उन्हें तो केवल भरोसा है ऊंची पगार वाले विश्वस्त वकीलों पर
जो प्रत्येक आरोप का कानूनी जवाब ढूंढ़ सकते हैं
जो उनके जघन्य कृत्यों को भी
छिपा सकते हैं पूरे पृष्ठ के माफीनामे के परदे में
भले ही किसी बालिका के अपहरण और नृशंस हत्या के मामले में भी
चटखारे लेकर खबरें बेचने के लिए
दुनिया के इस मीडिया मुगल ने लांघ दी हो नैतिकता की हदें
इराक में मारे गए सैनिकों के परिजनों के आंसू भी
टेबलॉयड के सनसनीखेज मसाले बनकर
बरसाते रहते हैं पॉण्ड-डॉलर सिडनी से सैन फ्रांसिस्को तक

कोई कह दे उन्हें लालची अबरपति
मुंह पर फेंक दे ब्रिटिश संसद के भीतर झागदार शेविंग क्रीम
रूपर्ट मर्डोक को अपने किसी कृत्य पर अफसोस नहीं है
लालच को ही ईंधन बनाकर उन्होंने विश्वविजय करने के लिए
दौड़ा रखा है मीडिया का अश्वमेघ घोड़ा
किसी भी कीमत पर लालच की भूख शांत करने के लिए
वे मानवीय संवेदनाओं के साथ करते हैं खिलवाड़
शाही परिवार से लेकर आम आदमी तक
अपने निजी सुख-दुःख को गोपनीय नहीं रख पाया है
क्योंकि रूपर्ट मर्डोक हैकिंग और रिश्वत के हथियार से
तोड़ते रहे हैं समस्त मर्यादाएं
पचास देशों में आठ सौ कंपनियों के मालिक
अपनी पांच अरब की दौलत से संतुष्ट नहीं
आम आदमी की तकलीफों को बिकाऊ बनाकर
रिश्तों को भावनाओं को उत्पाद बनाकर
रूपर्ट मर्डोक को तसल्ली मिलती है

इसीलिए तो
रूपर्ट मर्डोक शार्मिन्दा नहीं हैं।

 


जलबंदी

अभिजात्य का तमाशा बन गया है
महलनुमा मकानों के भीतर मट मैला पानी
पानी में शराब की खाली बोतलें तैरती हुईं
कूड़ेदान का सारा कचरा
नालियों की सारी गंदगी ड्राइंगरूम में

जीवन की स्वभाविक गति ठिठक गई है
संवेदनशूल्य धनपशुओं के चेहरे पर
चिंता की लकीरें नजर आने लगी हैं
सारा ताना-बाना बिखरने लगा है
लॉन की सजावट नजरों से ओझल हो गई है
मटमैले पानी ने रंग-बिरंगे फूलों को ढक दिया है

अभिजात्य का तमाशा बन गया है
कुछ ही घंटों की बारिश के बाद
हफ्ते भर तक कैद रहे हैं नकचढ़े नागरिक
टीवी के कैमरे के सामने भौंकते हुए
नगर निगम को फटकारते हुए
अपने अभिनय को भूलकर
लगभग गिड़गिड़ाते हुए।

 

वर्ष का क्रूरतम महीना होगा मई


(कोलकाता में भू-माफिया के हाथों मारे गए अपने चचेरे भाई दिनेश के लिए)

वर्ष का क्रूरतम महीना होगा मई
किसने सोचा था
किसने सोचा था धूप की तीक्ष्णता के साथ
घुल जाएगी मृत्यु
मृत्यु का कोई रंग नहीं होगा
कोई तापमान नहीं होगा
न उसके सीने में होगी करुणा न दया
न ही उचित-अनुचित का विवेक

वर्ष का क्रूरतम महीना होगा मई
किसने सोचा था
किसने सोचा था फिर रचा जाएगा चक्रव्यूह
महाभारत के करुण पात्र की तरह
किसी को चारों तरफ से घेरकर
बनाया जाएगा असहाय
किसी के रक्त को पीने के लिए
नृशंस सफेदपोशों के बीच होगा अनुबंध

वर्ष का क्रूरतम महीना होगा मई
किसने सोचा था
किसने सोचा था महानगर के पास नहीं रहेगी आत्मा
दर्शकों के पास नहीं होगी सहानुभूति
देखते ही देखते कोई बन जाएगा बेजान
जिसकी राह देखते रहते थे अबोध चेहरे
जिसके हौसले से संचालित होता था जीविका का रथ
किसने सोचा था
वह शतरंज की बाजी का एक मोहरा बनकर
मृत्यु के सामने हार जाएगा।

 

वह जो फेसबुक का साथी है

वह जो फेसबुक का साथी है
किसी मशीन की तरह
या किसी बहुरुपिए की तरह
वह अपनी कुंठाएं उड़ेलता है
जब वह बिलकुल अकेला होता है
कुछ भद्दी गालियां देते हुए कल्पना करता है
कि इस तरह बदल जाएगा समूचा तंत्र

वह जो फेसबुक का साथी है
बनावटी है उसकी भावनाएं
वह जब करुणा की बातें करता है
उसके सीने में सुलगती रहती है घृणा
वह जब प्रेम दर्शाना चाहता है
जाहिर हो जाती है उसकी आत्मदया

वह जो फेसबुक का साथी है
देखते ही देखते वह नजर आने लगता है
बेजान बिजूका की तरह
उसकी आकृतियां गड्डमड्ड होने लगती हैं
वह बुद्धि विलास को ही समझता है क्रांति
वह मदिरापान करने के बाद
दार्शनिक बन जाता है
जीवन में पिट जाने पर कायर बन जाता है
वह उतना ही खोखला है
जितना कोई बेजान डिब्बा हो सकता है
वह उतना ही संवेदनशून्य है
जितना कोई यंत्र हो सकता है।

 

पी. साईंनाथ के साथ

उनकी आंखें हैं सुलगती हुई लपटों की तरह
इन लपटों में समाई है विसंगतियों की धरती
उनकी तिरछी मुस्कराहट तीखे व्यंग्य की तरह
सीधे चुभ जाती है व्यवस्था पर काबिज धन पशुओं के कलेजे में

उन्हें वश में करने के लिए व्यवस्था की तरफ से
कितनी तरकीबों को आजमाया जाता है
कभी थाली में परोस दिया जाता है पद्म भूषण
कभी किसी मलाईदार समिति में आने का न्यौता
उन्हें वश में करने के सारे प्रयास निरर्थक
साबित हो जाते हैं ऐसे तमाम प्रयासों के बाद
और भी बढ़ जाती है उनकी तल्खी
और भी बढ़ जाती है मारक क्षमता
जब वे किसानों की आत्महत्या को प्रोत्साहित
करने वाले तंत्र को नंगा कर देते हैं
जब वे कार्पोरेट के दलाल के रूप में किसानों की
जमीन हड़पने वाले शासकों की कलाई खोल देते हैं
जब वे विकास का विज्ञापन प्रचारित करने वाले प्रभुओं को
आदमखोर पिशाच के रूप में चौराहे पर खड़ा कर देते हैं

वे लगते हैं किसी पीर-फकीर की तरह
जो जानता हो सारे दुःखों का मूल क्या है
जो जानता हो किस लोकतंत्र के साथ असल में
किस तरह का फर्जीवाड़ा हुआ है
और जो सच बोलते हुए रक्तलोलुप ताकतवर वर्ग की
किसी भी धमकी की परवाह नहीं करता हो
जिसे प्यार है केवल जनता से
केवल देश की मिट्टी से
जो शब्दों को कर सकता है बारूद के रूप में रूपांतरण।

 

शहर में जीना

शहर मे जीना
यंत्रणाओं की अंधी सुरंग में
अनवरत यात्रा करने की तरह है
अपरिचय के जंगल में अपने आपको
आदमखोरों के आक्रमण से बचाते हुए
कदम बढ़ाने की तरह है


शहर में जीना
कदम-कदम पर छोटी-छोटी बातों के लिए
समझौता करना है
महंगाई हो या सड़कें बदहाल हों
लोडशेडिंग हो सा पेयजल का संकट
रक्तपिपासु मकान मालिक हों या
मिलावटी दूध बेचने वाले
सबके सामने नतमस्तक होना है

शहर में जीना
झिलमिलाते हुए बाजार की रोशनी में
अपने अभाव की पैबंद को
छिपाकर रखना है
अपनी छोटी-छोटी जरूरतों को
अनिश्चितकाल तक
स्थगित रखना है।

 

एक दिन बचेगा

एक दिन बचेगा समाज का मलाईदार वर्ग ही
शहर के इस मुख्य इलाके में
बाकी सारे कमजोर लोगों को
दूर-दराज की बस्तियों में जाकर
बिल्लियों के डर से बिलों में दुबके चूहों की तरह
जीने की आदत डालनी होगी

वे कहते हैं विकास के लिए इतना त्याग
तो करना ही पड़ता है
ऐसे नहीं हासिल हो जाता महानगर का दर्जा
ऐसे ही नहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी तिजौरी
खोलकर राजकोष की रक्षा करती हैं
ऐसे ही नहीं भूमाफिया से लेकर राजनेता तक
जी-जान से तैयार करते हैं अपना गिरोह

एक दिन बचेगा डार्विन के सिद्धांत वाला ताकतवर वर्ग ही
समस्त सुविधाओं पर काबिज होकर
उसकी सेवा करने के लिए भले ही
गुलामों की प्रजाति रहेगी मलीन बस्तियों में
दया की मोहताज बनकर
मतदाता सूची में दर्ज नाम बनकर।

 

बारिश उतर रही है

बारिश उतर रही है
भीतर घुलती जा रही है हरियाली
जागता जा रहा है उजलापन
मिट्टी की महक फैलती जा रही है
रोम-रोम में सोंधी-सोंधी

बारिश उतर रही है

भले ही अभी कुछ मजबूरियां हैं
भले ही धीमी है कदमों की रफ्तार
भले ही इन दिनों
दुनियादारी के शिकंजों में हूं
किसी पशु के जबड़े में कैद
शिकार की तरह

बारिश उतर रही है

अतीत की पगडंडी पर
जिस तरह भीगते हुए उल्लास से
तरोताजा हो जाता था
किसी की हथेली को थामकर
पहाड़ी रास्तों पर चढ़ जाता था
वह क्षण जाग रहा है
अभी भी भीतर जाग रहा है

बारिश उतर रही है।

 

दासता की जंजीर

एक अदृश्य दासता की जंजीर में
जकड़ा हुआ है हम सभी का जीवन
भले ही हमें लगता है हम सन् सैंतालीस से स्वाधीन हैं
हमें एक पवित्र पुस्तक ने दिया है
बराबरी का हक अपने भाग्य को निर्धारित करने का हक
परंतु उसी पवित्र पुस्तक को एक अदृश्य तहखाने में
कैद कर रखा गया है
उस पवित्र पुस्तक में दर्ज आदर्श-वाक्यों को अपहृत कर
दस्युओं ने बदल डाली हैं परिभाषाएं
सफेदपोश दस्युओं ने अपनी सुविधा के हिसाब से
गढ़ लिया है लोकतंत्र का मतलब

कितने निरीह हैं नागरिकगण
एक ऐसे सड़े हुए तंत्र के तहत जिन्हें
जीने के लिए मजबूर किया गया है
जिन्हें विरोध करने का कोई हक नहीं दिया गया है
कहा गया है चुपचाप सहते रहना है
दासता के दंशों को
निचोड़ते रहना है बदन से लहू को
ताकि सफेदपोश दस्युओं का वैभव कायम रहे
एक पुश्त से लेकर सात पुश्तों तक।


जीवन का कोलाज

बीच में है कांच की दीवार
इस पार है मनहूसियत, बेबसी
और दुनियादारी का व्यापार
उस पार है शाम की रंगीनियां घर लौटते
परिंदे जिंदगी की रफ्तार

यहीं से देखकर खुश होता हूं खुद को
तसल्ली देता हूं
जीने के लिए कभी-कभी
तुच्छताओं से घिर कर भी
साबूत बचाकर रखना पड़ता है
महान कोमल सपनों को
तुच्छताओं के बीच भले ही
विवश होता है शरीर बंदी की तरह
मन रहता है सदा स्वाधीन
विचरण कर सकता है अनंत वेग के साथ
दुनिया के कोने-कोने में
साबूत बचाकर रख सकता है
एक बेहतर सवेरे की उम्मीद

बीच में है कांच की दीवार
इस पार है अपनी चुनी हुई कैद
और जीविका का आधार
उस पार है अपार संभावनाएं
जोखिम की दोधारी तलवार।

 


अतिमानव बनने की धुन में

अतिमानव बनने की धुन में
क्या-क्या नहीं गंवाया मैंने

हरियाली और इंद्रधनुष के दृश्य खो गए
कितने सपने आंखों से ओझल हो गए
किसी मोड़ पर जीवन का उल्लास खो गया
मेले में लुट जाने का अहसास रह गया

अतिमानव बनने की धुन में
क्या-क्या नहीं गंवाया मैंने

अंधी दौड़ में होगा भी तो क्या होगा हासिल
पत्थर की नगरी में जज्बातों की लाश पड़ी है
हिंसक पशुओं के घेरे में जीवन यापन
जहां नियम है इक-इक सांस की अग्रिम कीमत

अतिमानव बनने की धुन में
क्या-क्या नहीं गंवाया मैंने

थोड़ी सी राहत मिल जाती थोड़ा सा मैं दम ले लेता
सिक्कों की मायानगरी से इक दिन मैं बाहर हो जाता
नकली रिश्ते-नातों से इक दिन छुटकारा मिल जाता
बाजारों का शोर न होता मौसम मेरी बांह थामता

अतिमानव बनने की धुन में
क्या-क्या नहीं गंवाया मैंने।

 

रुग्ण समाज क्या देगा किसी को

रुग्ण समाज क्या देगा किसी को
कायदे से वह छिपा नहीं पाता अपने घाव
उसकी विकृतियों की सड़ांध फैली है चारों तरफ
अंतर्विरोधों से झुका हुआ है उसका माथा
अपने खोखलेपन की पीड़ा से छलछला उठी है उसकी आंखें

रुग्ण समाज क्या देगा किसी को
किसी दंगे की आग में जलाई जा रही स्त्री की
मदद नहीं करेगा बल्कि दूर से देखेगा तमाशा
किसी स्त्री को निर्वस्त्र कर मोबाइल से तस्वीर
उतार रही भीड़ के साथ पैशाचिक ठहाके लगाएगा

रुग्ण समाज क्या देगा किसी को
किसी भूखे व्यक्ति को चोर बता कर
सामूहिक पिटाई करते हुए हत्या कर देगा
लेकिन अपने सुरक्षित घेरे में सम्मानजनक आसन पर
बिठाकर रखेगा शोषकों को हत्यारों को

रुग्ण समाज क्या देगा किसी को।

 

बाढ़ और आंसू में डूबे हुए

बाढ़ और आंसू में डूबे हुए जनपद को इंतजार है
आएगी राहत करुणा की पोशाक पहनकर
राजधानी में किल्लत है करुणा की
संवेदना का जलाशय सूख चुका है
गिद्धों ने घोर लिया है अनुदानों को

बाढ़ और आंसू में डूबे हुए जनपद को इंतजार है
किसी दिन शुरू होगा अन्न का उत्सव
भूखे बच्चों के होठों पर लौटेगी संतुष्टि
धरती और आसमान के बीच
खड़ा हो सकेगा रैन बसेरा

बाढ़ और आंसू में डूबे हुए जनपद को इंतजार है
कि विकास की परिभाषा पर किसी दिन
शुरू होगी बहस पूछा जाएगा क्या विकास का मतलब
विनाश होता है क्या कारपोरेट घरानों की बिजली के लिए
जनपद की जल समाधि अनिवार्य शर्त होती है।


ज्ञान के साथ बलात्कार करने के बाद

ज्ञान के साथ बलात्कार करने के बाद
शिक्षा माफिया पुकारता है
आओ मध्यवर्ग निम्न मध्यम वर्ग की संतानों
हम तुम्हारे भविष्य को सुनहरा बनाएंगे
तुम्हें ऐसी पट्टी पढ़ाएंगे
कि तुम मनुष्य बनो या न बनो
ज्ञान पिशाच जरूर बन जाओगे

ज्ञान के साथ बलात्कार करने के बाद
विज्ञापन की पालकी पर सवार हो जाता है शिक्षा माफिया
अपनी जेब से निकालता है डिग्रियां और नौकरियां
नौकरियां और डिग्रियां
उसके एक पहलू में मुस्कराते रहते हैं राजनेता
दूसरे पहलू में गिड़गिड़ाते रहते हैं नौकरशाह

विज्ञापन की पालकी हवा में उड़ती हुई
किसी छत विहीन जर्जर सरकारी पाठशाला के
प्रांगण में उतरती है
शिक्षा माफिया के संदेश का सीधा प्रसारण
करते हैं सारे टीवी चैनल
वह कहता है कि अब ज्ञान की कोई जरूरत नहीं
केवल
ज्ञान पिशाचों की जरूरत है

ज्ञान के साथ बलात्कार करने के बाद
शिक्षा माफिया के चेहरे पर कौंधती है भेड़िए की मुस्कान।

 


मुल्क की सबसे बड़ी पंचायत में

मुल्क की सबसे बड़ी पंचायत में
जारी रहती है नूरा-कुश्ती
महंगाई पर बहस के दौरान अघाए हुए चेहरोें पर
मुस्कराहट रहती है जबकि बाजार में जाकर
हर आम नागरिक को अपने सीने में नश्तर
चुभने का अहसास होता है जहां राशन का
इंतजाम होने पर दवा का इंतजाम नहीं होता
दवा का इंतजाम होने पर कपड़े का इंतजाम नहीं होता
जहां रोज सवेरे उठते ही बदल जाते हैं वस्तुओं के दाम
जहां मुनाफाखोरों की गोद में बैठकर खाद्य मंत्री
महंगाई को बताते हैं विकास की अनिवार्य शर्त

मुल्क की सबसे बड़ी पंचायत में
जारी रहती है नुरा-कुश्ती
जहां गैर जरूरी हास्य-विनोद में उलझे हुए पंच गण
डिजाइनर पोशाकों में सज-धजकर
लोकतंत्र-लोकतंत्र का फूहड़ खेल खेलते रहते हैं
जबकि मुल्क के सुलगते हुए सवाल
अनुत्तरित ही रह जाते हैं
कि किस तरह आधी से ज्यादा आबादी बीस रुपए से भी
कम आमदनी पर जी रही है
किस तरह पूरी आबादी के हिस्से पर कुंडली मारकर बैठ गए
मुट्ठी भर धनपशु
किस तरह मायूसी के अंधेरे में सुलगने लगती है गुस्से की आग
ऐसे तमाम सवालों से बेखबर पंचगण
बनावटी विरोध बनावटी क्रोध
बनावटी बयान बनावटी जवाब।

 

बाजार सबको नचाता है

बाजार सबको नचाता है अपने इशारे पर
कहता है निरर्थक है भावना-संवेदना
असली चीज है खनखनाता हुआ सिक्का
इसे हासिल करने के लिए बेच दो
जो कुछ भी है तुम्हारे पास बेचने लायक
अगर बेचेने लायक कुछ भी नहीं है
तो बाजार कहता है तुम्हें भूमंडलीकरण के सवेरे में
जीवित रहने का कोई हक नहीं है

बाजार सबको नचाता है अपने इशारे पर
इसीलिए तो खोखले हो रहे हैं मानवीय रिश्ते
बढ़ती जा रही है गणिकाओं की तादाद
बढ़ते जा रहे हैं संवेदनशून्य चेहरे
यंत्र की तरह दौड़ती-भागती भीड़
बाजार के इशारे पर जीना
बाजार के इशारे पर मरना।

 

रूहुल अली को मैंने देखा था

रूहुल अली को मैंने देखा था
सबसे पहले टीवी के परदे पर
उसके हाथ में एक बैनर था जिस पर
लिखा था- हमसे जबरन हमारा घर मत छीनो

सात वर्षीय रूहुल अली उस भीड़ में
सबसे आगे खड़ा था जो न्याय की गुहार लगाने के लिए
शासक के दरवाजे तक आई थी
इस भीड़ में शामिल हर नागरिक के घर को तोड़ दिया गया था
किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को विशाल भूखंड प्रदान करने के लिए

जब विरोध प्रदर्शन के दृश्य का सीधा प्रसारण
किया जा रहा था तभी चारों तरफ धुआं फैल गया
चीख-पुकार मच गई
और कुछ देर के बाद साल साल का रूहुल अली
बेजान पड़ा था
उसके सीने से बह रहा था खून
किसी पुलिस अधिकारी ने सर्विस रिवॉल्वर से
बिल्कुल करीब से उसे गोली मार दी थी

फिर मैंने शासक को सफाई देते हुए देखा था
कि रूहुल अली वास्तव में बंगलादेशी घुसपैठिया था
और उसके पिता ने सरकारी जमीन पर कब्जा कर
झोपड़ी बना ली थी और उसे गोली गलती से लग गई थी।

 

मोमबत्ती जुलूस में जो शामिल हैं

मोमबत्ती जुलूस में जो शामिल हैं
उन्हें अच्छी तरह पता है कि
तस्वीर बदलने वाली नहीं है
रातों-रात होने वाला नहीं है कोई परिवर्तन
मुर्दे की तरह जीनेवाले नागरिकों के सीने में
एक ही झटके में पैदा नहीं होने वाली है आग की लपटें
नींद से जागते ही प्रभु वर्ग का
हृदय परिवर्तन नहीं होने वाला है
संभव ही नहीं है कि भेड़िए
शिकार पर पाबंदी लगाने के लिए नियम बनाएं
संभव ही नहीें है कि इस मुल्क का परजीवी वर्ग
रक्तपान की परंपरा को वर्जित कर दे

मोमबत्ती जुलूस में जो शामिल हैं
उन्हें अच्छी तरह पता है कि
उन्हें टीवी पर दिखाया जाएगा
जो उन्हें करीब से जानते हैं वे गाली देते हुए कहेंगे
वह देखो मिलावट खोर, तस्कर, माफिया, अपराधी
भ्रष्टाचार के खिलाफ जुलूस में
मोमबत्ती जला रहा है।

 

वे जो हमें नायक की तरह नजर आते हैं

वे जो हमें नायक की तरह नजर आते हैं
असल में वे प्रेशर कुकर की सीटी की
भूमिका निभा रहे होते हैं
हमें लगता है कि वे हमारे हितोें की चिंता में
आमरण अनशन कर रहे हैं
डिजाइनर पोशाक में सज-धजकर
असंख्य टीवी कैमरों के सामने आग उगल रहे हैं
बदरंग तस्वीर को पूरी तरह
बदल देने का दावा कर रहे हैं

वे जो हमें नायक की तरह नजर आते हैं
असल में वे हमारे असंतोष की आग पर
बर्फ रखने की भूमिका निभा रहे होते हैं
वे हमारा ध्यान अनर्गल प्रलापों की तरफ
केंद्रित करना चाहते हैं
ताकि हम पूछ न सकें कोई असुविधाजनक सवाल
ताकि हमें अंधेरे में रखकर
वे लोग हमारे जीवन के साथ खिड़वाड़ करने की
साजिशों को अंजाम देते रहें

वो जो हमें नायक की तरह नजर आते हैं
असल में वे खलनायकों की मदद करने में जुटे रहते हैं।

 

जो भ्रष्ट हैं

जो भ्रष्ट हैं वे बनाते हैं
आदर्श आचार संहिता
बताते हैं हमें यही है जीने का सलीका
तय करते हैं कायदे-कानून

ये सत्य को कभी रोशनी में
आने देना नहीं चाहते
इसीलिए अंधेरे को कायम रखने के लिए
खुफिया एजेंसियां
जांच आयोग
शासन-प्रशासन के बेरहम तंत्रों का
किया जाता है प्रयोग

वे पहले हमारे भोजन में जहर मिलाते हैं
फिर जांच आयोग बिठाते हैं
वे हमारे हिस्से की तमाम बुनियादी चीजें छीन लेते हैं
और फिर हमारी हिफाजत करने का
आश्वासन देते हैं।

 

जश्न मनाने के बाद

जश्न मनाने के बाद बेसुध होकर
सो रहा है जनपद
गणिकाओं ने उतार दिए हैं मुखौटे
और थकान की बांहों में समाकर
सो रही हैं गहरी नींद में
फुटपाथों पर जाग रहे हैं ठिठुरते हुए भिखारी
गलियों में सर्दी को कंधे पर उठाकर
चहलकदमी कर रहे हैं चौकीदार

जश्न मनाने के बाद बेसुध होकर
सो रहा है जनपद
रात भर धन पशुओं का नाच जारी रहा
जारी रही आतिशबाजी
पानी की तरह बहती रही शराब
कैलेंडर बदल गया रात के बारह बजे
आ गया नया साल
बाजार का आदेश था
इसलिए उत्सव का आयोजन
इसीलिए केक पेस्ट्री चाकलेट
रंग-बिरंगे बल्बों की सजावट

थकी हुई गलियों में फैली हुई वीरानी
नाच घरों में फैला हुआ सन्नाटा
अब अंधेरा छंटने के बाद देखेंगे
क्या सचमुच तस्वीर बदल गई है।

 


कवि चुप था

कवि चुप था
भले ही घुटने को महसूस कर रहा था
भीतर ही भीतर
किसी तूफान का सामना कर रहा था
फिर भी कवि चुप था

जीवन की तुच्छताओं में घिरी हुई थी
सृजन की आग
जब वह रचना चाहता था मधुर गीत
भौतिकवाद का दबाव बढ़ता जा रहा था
खुरदुरे यथार्थ के दंश से
लहूलुहान होती जा रही थी संवेदना

कवि चुप था
विवशताओं से लड़ा रहा था पंजा
किसी पंक्षी की तरह बटोर रहा था दाना
जुटा रहा था तिनकों को
मौन की शक्ति को महसूस कर रहा था
इसीलिए
एक अर्से से कवि चुप था।


प्रिय ऑक्टोपस

प्रिय ऑक्टोपस
तुम निचोड़ते हो मेरी धमनियों से
बूंद-बूंद लहू
और उगलते हो
जूठन ऑक्सीजन
जिनको मैं ग्रहण करता हूं
और मरते-मरते
बच जाता हूं

मेरी छटपटाहट
मेरी बेचैनी
आंखों की तरलता
आहत संवेदना
तुम्हें हृदय परिवर्तन के लिए
प्रस्तुत नहीं कर सकती

तुम्हारी पकड़ के विरुद्ध
मेरी समस्त शक्ति
भीतर ही भीतर
घुमड़कर रह जाती है
मेरे सुन्न हो रहे अंगों में
तुम्हारे ठंडे स्पर्श
की अनुभूति बची रहती है।

 


घृणा के साथ सहवास संभव नहीं

घृणा के साथ सहवास संभव नहीं
संभव नहीं है
अपनी इच्छाओं के खिलाफ
कीट-सा जीवन जीना

आदेशों-अध्यादेशों में गुम
हो चुका है भविष्य और
बीमा के किस्तों में बंट चुके हैं
सपने

अपनी आवाज भी लगती है
अजनबी की आवाज
अपनी परछाई भी लगती है
शत्रु की परछाई

इसी तरह बुनते हैं जाल
इसी तरह अपने वजूद को
बंदी बनाते हैं हम
जीवन को उज्ज्वल बनाने के लिए

घृणा के साथ सहवास संभव नहीं
और वनवास के सारे
रास्ते बंद हैं
घृणा के आलिंगन में
कोमल भावनाओं का जीवित रहना
संभव नहीं है।

 

मूर्तियों के शहर में

मूर्तियों के शहर में सन्नाटा है
शायद इन मूर्तियों को गढ़ने वाले शिल्पी का आह
शहर को लग गई है

कैसी विचित्र मूर्तियां हैं इस शहर में
भ्रष्ट दलालों की मूर्तियां
भ्रष्ट राजनेताओं की मूर्तियां

कुछ मूर्तियां वेश्याओं की हैं
कुछ मुर्तियां धार्मिक ठेकेदारों की
कुछ मूर्तियां चमचों की

संगमरमर से बनी मूर्तियों की
गरदनें दंभ से अकड़ी हुई हैं
आंखों में है वहशीपन

मूर्तियों के शहर में
सत्य की समाधि है
अहिंसा की समाधि है

मूर्तियों के शहर में
गणतंत्र की लाश है
जिसे चील-कौवे नोच रहे हैं।

 

नाचघर

नाचघर में घुटन का माहौल है

बासी संगीत की धुन पर नाचती
नर्तकी थकी-थकी-सी है
पीली रोशनी मध्यम है
नर्तकी बीमार सी लग रही है

नाचघर में तंबाकू का धुआं फैला हुआ है

वे जो दर्शक हैं उनके चेहरे
एक जैसे सपाट हैं
वे रिक्शा खींचने वाले मजदूर हैं
या दफ्तर के बाबू हैं
नाचघर में जिस्म की गंध है
वे गोश्त को चबा रहे हैं
नर्तकी के शरीर के गोश्त को
निगाहों से माप-तौल कर रहे हैं

नाचघर में विषाद का माहौल है

जिंदगी की शाम काटने वाले
दर्शकों का मन नाच में नहीं
घर में सुलग रहे चूल्हे
और भूखे बच्चों पर टिका हुआ है।

 

जीवित रहने का प्रस्ताव

नहीं समझा पाऊंगा विषाद की वजह क्या है
सुविधाओं के बिल में दुबके रहो
बंकर में छिपे रहो युद्ध में जुटे राष्ट्र की तरह
सुनते रहो देववाणी
गमलों के फूलों की खुशबू से बौराते रहो

फूल मुरझा रहे हैं जल खाद और रोशनी के अभाव में
बच्चे मर रहे हैं अनाज दवा देखभाल के अभाव में
विकलांगता फैलती जा रही है शरीर में दिमाग में
धमनियों में समाता जा रहा है विषैला धुआं

सुरक्षित रहो किले के भीतर
जारी करते रहो बयान आलीशान शयनकक्ष में लेटकर
कैसे समझ सकते हो
खुले आसमान के नीचे बारूद और बरसात
महंगाई और राजनीति की मार झेलने वाली आबादी
किस विषाद नामक बीमारी को झेल रही है

दबोचकर रखो हमारे हिस्से की धूप
भरे रहें तुम्हारे भंडार नियंत्रित रहे मौसम
चलती-फिरती लाशों को मत समझाओ
प्रेम की परिभाषा
डार्विन का सिद्धांत

हमें लड़ने दो अपने छोटे-बड़े मोर्चों पर
हमें मरने दो खड़े-खड़े
हमारी लाशों की सीढ़ी पर चढ़कर
आएगा एक पवित्र भविष्य।


तलाश

मैं बहुत दिनों से तलाश कर रहा हूं
कोई मुझसे सवाल करता
कि मेरा असली ठिकाना कहां है
कैसा मौसम है वहां
कैसे हैं सूरज-चांद-सितारे
कैसी औरतें हैं वहां
कैसे हैं रीति-रिवाज
कैसी है लोकगीत की धुन
कि कबसे मैं दुःख और सुख की
पहचान करने लगा था
कि कबसे अकेलापन और अंधेरा
मुझे भाने लग था
कि मेरी पसंद का रंग कौन-सा है
मेरी पसंद का फूल कौन-सा है
वह कौन-सी कहानी है
जिसे मैं पसंद करता हूं
कि मेरा पहला प्यार कैसा था
कैसा था पहला चुंबन
कब मैं पहली बार किसी के साथ
बारिश में भीगा था
कब मैंने वसंत का स्पर्श किया था
मेरी आदतें कैसी हैं
कब मैं खुश होता हूं
कब मैं दुःख से घायल होता हूं
मेरी मुस्कराहट कैसी है
मेरी लंबाई क्या है
मेरा वजन कितना है
कैसी पोशाक मुझे पसंद है
क्या-क्या खाना मुझे अच्छा लगता है
फुरसत के पलों में मैं क्या करता हूं

मैं बहुत दिनों से तलाश कर रहा हूं
कोई मुझसे सवाल करता।

 

गुवाहाटी की शाम

गुवाहाटी की शाम
मेरे भीतर समा जाती है
विषाद की तरह
भूरे रंग के बादल
मंडराते रहते हैं
और नारी की आकृति की
पहाड़ी मानो
अंगड़ाई लेती है

गुवाहाटी की शाम
सड़कों पर दौड़ते-भागते लोग
साइरन की आवाज
और दहशत से पथराए चेहरे
एक डरावना सपना
अवचेतन मन में
उतरने लगता है
नश्तर की तरह

गुवाहाटी की शाम
स्मृतियों में
बारिश की फुहारों सी
लगती है
जब भीगते हुए
गुनगुनाते हुए उम्र की पगडंडी पर
सरपट दौड़ना अच्छा लगता था।

 

इन दिनों

मनुष्यता भी गिरवी रख दी
और समय पर चुकाते रहे
चक्रवृद्धि ब्याज

गणित के कलाकार ने
सफाई से बांधी है
जीवन की डोर

अर्थशास्त्र का पत्थर सीने पर
रखकर कहा जा रहा है
आजादी के गीत गाओ

सपनों की लाश हासिल करने के लिए
रिश्वत मांगेंगे देवता
या गिरवी रखनी पड़ेगी भावना

मुल्क के कानून को मानो या
दंड भुगतो या निर्वासित होकर
जियो- यही प्रावधान है

कब सिया था होठों को
तारीख याद नहीं
याद है
सुई की तीखी चुभन
और लहू का स्वाद।

 

युद्ध

तर्कों के बिना ही
हो सकता है आक्रमण
युद्ध की आचार संहिता
पढ़ने के बावजूद
निहत्थे योद्धा की
हो सकती है हत्या

अदृश्य युद्ध में स्पष्ट नहीं होता
दोनों पक्षों का चेहरा
सिर्फ धुएं से ही
आग की खबर मिल जाती है
गिद्ध
मृतकों की सूचना दे देते हैं

अनाथ बच्चों के हृदय में
युद्न समा जाता है
हृदय को पत्थर बनने में
अधिक समय नहीं लगता

असमय ही विधवा बनने वाली
स्त्रियों के चेहरे पर
राष्ट्रीय अलंकरण के बदले में
मुस्कान नहीं लौटाई जा सकती

गर्भ में पल रहा शिशु भी
अदृश्य युद्ध का एक
पक्ष होता है
युद्ध राशन कार्ड से लेकर
रोजगार केंद्र-मतदाता सूची
खैराती अस्पताल-राहत शिविर तक
हर जगह हर रोजमर्रा की जरूरत की
चीजों में घुला-मिला रहता है

युद्ध का स्वाद
समुद्र के पानी की तरह
खारा होता है।

 

टीन की छत

सुबह निश्छल बच्ची की तरह
हल्के से छूती है
जगाती है

पंछियों का पदचाप
टीन की छत से छनकर
कानों तक पहुंचता है

खिड़की से झांकता है
जाना-पहचाना आग का गोला
टीन की छत के नीचे ही
नवरस की अनुभूति करता हूं
कभी वेदना से हाहाकार कर उठता है
हृदय
कभी आनंद से उछलने लगता है
हृदय
टीन की छत पर बारिश का संगीत
सुनते हुए
विषादग्रस्त रातों में भी
रोमानी अनुभूतियों सें सराबोर
हो जाता हूं
कि इस बुरे वक्त में भी
आसमान और धरती के बीच
एक स्नेहमय आंचल
सिर पर है।

 


डायनासोर

उन्हें नष्ट होना पड़ता है
परिवेश-समय-भूगोल से जो
संतुलन नहीं बना पाते
उनके जीवाश्म रखे जाते हैं
अजायबघरों में
उन पर शोध किया जाता है

वे लुप्त हो गए
धरती के तापमान के साथ
तालमेल नहीं रख पाने के कारण
वे अतीत के विस्मृत पृष्ठ बन गए

वे लुप्त हो जाएंगे
वे नष्ट हो जाएंगे
जो सत्य को लेकर
आदर्श को लेकर
जीवन मूल्यों को लेकर
पूरी मानवीय गरिमा के साथ
जीना चाहेंगे

एक दिन इस अमानवीय धरती पर
डायनासोर की तरह
उनके जीवाश्म ही बचे रहेंगे।


यह जो प्रेम है

शाम भी घायल हुई थी
बांसुरीवादक के विषाद से
बादलों ने रोककर जाहिर किया
अपना मातम
किसी की राह देख रही थी
रात
जिसे बिछाकर सो गया था
भिखारी
धुएं से सराबोर आबादी
के बीच भी
बचा हुआ था जीवन
हर मोर्चे पर चोट खाने के
बावजूद भी
आदमी भूल नहीं पाया था
प्रेम।


जगजीत सिंह को सुनने के बाद

वायलिन का स्वर बरसता रहता है
अवसाद की लंबी रातों में
मधुर दिनों की स्मृतियां
बचपन का सावन
यौवन का चांद
प्रियतमा का मुखड़ा
बिछोह की पीड़ा

वायलिन का स्वर बरसता रहता है
और मैं भीगता रहता हूं
पिघलता रहता हूं
पथराई हुई आंखें नम हो जाती हैं
संवेदना की सूखी हुई धरती
उर्वर बन जाती है।

 

वे दंगाप्रिय ईश्वर के उपासक हैं

वे दंगाप्रिय ईश्वर के उपासक हैं
इसीलए इतनी असहिष्णुता
इतनी बर्बरता
इतना रक्तपात
धर्म की घृणा मिश्रित व्याख्याएं

वे दंगाप्रिय ईश्वर के उपासक हैं
उनकी उपासना
इहलोक में स्वार्थों को सिद्ध करना है
उनकी उपासना है
सिंहासन और पदाभिषेक की
गुप्त राह

वे दंगाप्रिय ईश्वर के उपासक हैं
शिकारी जानवर के वंशज
रक्तपान करना जिनका
आदिम स्वभाव है
विषवमन करना जिनका
दैनन्दिन कर्म है।

 

अपहरण

कोमल भावनाओं का अनजाने में ही
हृदय के चौराहे से अपहरण किया गया
फिरौती के रूप में मांगा जा रहा है
सबसे हसीन सपना

चेतावनी दी गई है
सपने नहीं दिए गए तो
कोमल भावनाओं का वध किया जाएगा

कोई फायदा नहीं रपट लिखवाने से
कोई फायदा नहीं थाने में
सो रही है पुलिस राजधानी में धुत्त पड़ी है सरकार

रिक्त हृदय को सांत्वना दे पाना
संभव नहीं
सांत्वना देने का रिवाज
प्रतिबंधित हो चुका है

अपहरणकर्ताओं का कोई नाम नहीं होता
कोई चेहरा नहीं होता
हृदय नहीं होता
हृदय में संजोकर रखी गई कोमल भानवाएं नहीं होतीं

सूखे कुएं की तरह अपने हृदय को लेकर
कहां जाऊंगा मैं कहां जाऊंगा।

 

भूख मेरी प्रतीक्षा कर रही होगी

भूख मेरी प्रतीक्षा कर रही होगी
उसके होंठ सूख चुके होंगे
और अंतड़ियों में ऐंठन
शुरू हो गई होगी

खाली बरतन आपस में
उदासी बांट रहे होंगे
स्टोव के पास उपेक्षित पड़ा होगा
किरासन का खाली पीपा

अंधेरे में कोई आकृति
हिलती होगी
तो भूख की आंखों में
चमक आ जाती होगी
मैं जानता हूं वह
कितनी निढाल हो गई होगी
आशा और निराशा के बीच
मुझे सोच रही होगी

मेरे लौटने पर
मुझसे लिपट जाएगी
जन्म-जन्मान्तर की प्रेमिका की तरह
आरंभ होगा अन्न का उत्सव।

 

भूपेन हजारिका

बेचैनी मांझी की पुकार सुनता हूं
नदियों-सागरों-महासागरों को
लांघकर
आती हुई दर्दभरी पुकार

बैशाख की रातों में चुपके से
पलते हैं कुछ मीठे सपने
कांसवन जैसा अशांत मन
वोल्गा से गंगा तक
मेघना से ब्रह्मपुत्र तक
दौड़ाता रहता है यायावर को

वह जो आदमी के भविष्य का
गीत है
वह जो अल्पसंख्यकों को सुरक्षा
का वादा है
वह जो पूस की रात में ठिठुरते
किसी गरीब की चीख है
वह जो प्रेम में न पाने की टीस है
मेरे हृदय में प्राचीन लोकगीत की तरह
वह स्वर धड़कता है

जीवन की रेल में तीसरे दर्जे के
मुसाफिरों के आंसू शब्द में
परिवर्तित होते हैं
प्यार के दो मीठे बोल की तलाश में
एक पूरी उम्र बीत जाती है

बेचैन मांझी की पुकार सुनता हूं
समाज परिवर्तन के लिए
संगीत एक हथियार है
कहीं बुदबुदाते हैं पॉल रॉबसन-
‘वी आर इन द सेम बोट ब्रदर!
वी आर इन द सेम बोट ब्रदर!!
वी आर इन द सेम बोट ब्रदर’!!!


शीतल पेयजल पीता है सूरज

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का नया प्रतिनिधि
सूरज
डूबने से पहले शीतल पेयजल पीता है
और चांद
एक बोतल की शक्ल में उभर आता है

बच्चे गाते हैं
विज्ञापन के गीत
उछलते हैं- नाचते हैं
अजीब-अजीब आवाज के साथ

एक खुशहाल देश को
प्रायोजित किया जाता है
किस कदर गद-गद होता है
अंग्रेजी में लिपटा हुआ देश

शेयर बाजार के दलालों के फूले हुए चेहरे
पाप और पुण्य की सिकन को
कभी महसूस नहीं कर सकते
जीने की जरूरी शर्त बन गई है
धूर्त होने की कला

गरीबी की रेखा की ग्लानि से
ऊपर उठकर उधार की समृद्धि
तिरंगे पर फैल जाती है
कूड़ेदानों में जूठन बटोरते हुए बच्चों
और अधनंगी औरतों के बारे में
कोई विधेयक पारित नहीं होता
ठंडे चूल्हों को सुलगाने के बारे में
न्यायपालिका के पास
कोई विशेषाधिकार नहीं है

बाजारू बनने की होड़ में बिकाऊ
बना दिया गया है सूरज को
चांद को धरती को
मनुष्य की गरिमा को।

 

भय जब दस्तक देता है

भय जब दस्तक देता है
शयनकक्ष में
रातभर जागता है विवेक

चिड़ियों की तरह
लोग बुनते हैं घोंसले
बच्चों को सिखाते हैं
दाने चुगना

धूप और बारिश
की मार झेलते हुए
एक स्वतंत्र देश में
गुलाम बनकर जीते हुए
दैत्यों के चरणों में
शीश झुकाते हुए
मतपेटियों में अंगूठा काटकर
बंद करते हुए
लोग
ईश्वर और भाग्य को
दोष देते हैं
जन्मकुंडली के ऊपर
कुंडली मार कर बैठे
शनि और राहु को
कोसते हैं
नीलम-गोमेद-पन्ना-पुखराज
घोड़े के नाल की
अंगूठी पहनते हैं

भय जब दस्तक देता है
कायर दिमाग सोचता है
पलायन का रास्ता।

 

खुशी प्रायोजित की जाएगी

खुशी प्रायोजित की जाएगी
ठंडे चूल्हे के पास बैठी हुई
एक बीमार औरत
मुस्कराएगी

विदेशी कार से उतरेगी
एक गदराई हुई औरत
और बनावटी फूल
बीमार औरत को सौंपकर
नववर्ष की शुभकामनाएं देगी

हताश चेहरे जादुई शीशे में
खिले हुए नजर आएंगे
सरकार जादुई शीशे
मुफ्त बंटवाएगी

असफलताओं की खाई में
एक उत्सव का दृश्य होगा
मरघट जगमगा उठेंगे
खोमचे वाले बेचेंगे सपने

जिन्हें नींद नहीं आती
जो देश के बारे में
इतिहास के बारे में
भूगोल के बारे में
अर्थनीति के बारे में
अधिक सोचते रहते हैं
उन्हें अफीम चाटने के लिए दिया जाएगा
पदवियां दी जाएंगी
पुरस्कार दिए जाएंगे

दुनिया देखेगी
खुशी के दमकते चेहरे
दूरदर्शन के सीधे प्रसारण में
इंटरनेट पर
अंग्रेजी पत्रिकाओं के
रंगीन आवरण पृष्ठों पर।


नृशंसता के जंगल में

नृशंसता के जंगल में
करुणा की नदी सूख जाती है
सड़कों पर सड़ती रहती है
मानव देह
लावारिश लाशों को
जमीन में गाड़ दिया जाता है
बिहू नर्तकी की चीख
वीरानी में गुम हो जाती है

वापस लौटती हैं
घोषणाएं
निरंकुश घोषणाएं
सुनते-सुनते आबादी
पत्थर की तरह जड़ हो गई है
राजपथ से गुजरती रहती है
अर्थियां
सेना की गाड़ियां
राजनेताओं का काफिला

नृशंसता के जंगल में
यंत्रणा के साथ जीवन
पशुओं की तरह गुर्राते हुए
नोचते हुए खसोटते हुए
बिना सोचे-विचारे
गुजरता रहता है।

 

पोवाल दिहिंगिया


(जाह्नू बरुवा की फिल्म ‘सागरलै बहुदूर’ देखने के बाद)

मांझी के सपने खो जाते हैं
दिहिंग नदी की जलधारा में
जो ब्रह्मपुत्र में मिलती है
सागर तक पहुंचती है

वर्षा से पहले स्तब्ध प्रकृति
मांझी के चेहरे का रंग
नीला पड़ जाता है
सर्पदंश से पीड़ित मरणासन्न व्यक्ति की तरह

हेमिंग्वे का बूढ़ा आदमी
समुद्र किनारे से वेष बदलकर
कब आया दिहिंग किनारे हाट में
उसने नाम रख लिया
पोवाल दिहिंगिया

चप्पू चलाता है तो तनती हैं
चेहरे की शिराएं
बांसुरी की तान सुनकर
आहत होता है पहाड़ भी

नदी और पुल
पुल और सूनी नाव
मांझी और उसकी कुटिया
पराजय और विषाद
और
जूझते रहने की निरंतरता...।

 

एकता कपूर का ककहरा

एकता कपूर को क से प्रेम है
क कमाल का अक्षर है
जो विज्ञापन का सोना बरसाता है
दर्शकों की तादाद बेहिसाब बढ़ता है

एकता कपूर का ककहरा
समूचा मध्यवर्ग रट रहा है
इस ककहरे में कोई
संवेदना नहीं है
कोई समस्या नहीं है
कोई वेदना नहीं है

इस ककहरे में जीवन एक
अंतहीन उत्सव है
इस उत्सव में छल-कपट की
सीढ़ियों पर चढ़कर कामयाबी हड़पने वाले
निर्मम किरदार शामिल हैं
इस उत्सव में डिजाइनर पोशाकों में
शौकिया सिंथेटिक आंसू बहाने वाली गदराई स्त्रियां शामिल हैं

एकता कपूर का ककहरा पढ़कर
मध्य वर्ग अपने लिए जीने की शैली
विकसित कर रहा है
इस नई शैली में परिवार का मतलब
एक कुरुक्षेत्र का मैदान है
इन नई शैली में जीवन का मतलब
केवल और केवल वैध-अवैध तरीके से
पैसों को अर्जित करना रह गया है

एकता कपूर के ककहरे में
इतनी संपन्नता है जो
हमें आतंकित करती है
हमारे इर्द-गिर्द की पीली उदास बीमारी
अभाव की मार झेलती दुनिया
एकता कपूर के ककहरे में शामिल नहीं है।

 

करुणा बचाकर रखो

करुणा बचाकर रखो
आपातकाल के लिए
अंग्रेजी पत्रिकाओं के चमकते
रंगीन पृष्ठों पर
लहूलुहान तस्वीरें
तुम्हें हिला नहीं सकतीं
रेंगते हुए
घिसटते हुए लोग और
उनकी चीख से
पिघलती नहीं
तुम्हारे भीतर संवेदना
इर्द-गिर्द की खामोशी
हताशा से झुलसे हुए चेहरे
तुम्हें सोचने के लिए
विवश नहीं कर सकते

बचाकर रखो करुणा
मुनाफे का सौदा करते वक्त
किसी को
गुलाम बनाते वक्त
काम आएगी करुणा।

 

प्रिय भूख, तुम नहीं जीतोगी

प्रिस भूख, तुम नहीं जीतोगी
तुम्हारी क्रूरता का
तुम्हारी संवेदनशून्यता का
एक-एक वार व्यर्थ जाएगा

तुम्हारा घिनौना स्पर्श
छीन सकता है मेरे बच्चों के
होठों की पवित्र हंसी
विषाद के विषैले धुएं से
धुंधली बना सकती हो
तुम हमें भींच सकती हो
कुपोषण के जबड़े में
घोल सकती हो
हमारी मीठी नींद में
तेजाब

प्रिय भूख तुम नहीं जीतोगी
हमेशा की तरह
तुम पराजित होगी
और शुरू होगा
अन्न का उत्सव।

 

दुनिया की सबसे हसीन औरत

दुनिया की सबसे हसीन औरत
गरीबी की रेखा पर चढ़कर
मुस्कराती है
ठंडे चूल्हे की तरह सर्द है
उसके होंठ
असमय ही वृद्धा बन जाने वाली
बच्ची से मिलती है
उसकी आंखें

दुनिया की सबसे हसीन औरत
हमें बताएगी
भूख लगने पर रोटी नहीं मिले
तो केक खा लेना
प्यास लगने पर
शुद्ध पेयजल नहीं मिले
तो कोल्ड ड्रिंक्स पी लेना

दुनिया की सबसे हसीन औरत
हमारी नींद की गुफा में
समा जाती है
हमारे सबसे हसीन सपनों को
बटोरती है
और गायब हो जाती है।


आइए हम जनहित याचिका दायर करें

आइए हम जनहित याचिका दायर करें
करुणा के बारे में
जो पहले रहती थी सबके हृदय में
जो बहती थी धमनियों में
जो हमारे जीवन का हिस्सा थी
जो आज गुम होती जा रही है

आइए हम जनहित याचिका दायर करें
भावना के बारे में
जो पहले छलछलाती थी आंखों में
धड़कती थी अनुभूतियों के संग-संग
जो मानवीय गुणों को बचाती थी
जो आज गुम होती जा रही है

आइए हम जनहित याचिका दायर करें
प्रेम के बारे में
जो पहले एक पवित्र अनुभूति का नाम था
जो अपरिचित हृदयों को जोड़ता था
जो जीवन को उज्ज्वल बनाता था
जो आज नीलाम होता जा रहा है

आइए हम जनहित याचिका दायर करें।


सूनी हवेलियां

कस्बे की अधिकतर हवेलियां सूनी हैं
इनका सूनापन तंग गलियों में
विलाप करता है
कोई परदेशी इस तरफ क्यों नहीं आता

किसी हवेली में हैं सौ कमरे
और पांच सौ झरोखे
हवादार मुंडेर
जहां बैठा है कबूतरों का समूह
किसी हवेली में रहती है
एक अकेली स्त्री
जो या तो विधवा है
या जिसका पति वर्षों से नहीं लौटा

उस अकेली स्त्री के सामने
हवेली की भव्यता
धुंधली नजर आने लगती है
सूनी हवेली भी अकेली स्त्री बन जाती है।

 

जंगल में अकेले

जो लोग जंगल की ओर चले गए
वे न तो वैरागी थे
न ही थी उनकी उम्र इतनी
कि वे अध्यात्म की प्यास
बुझाने के लिए कहीं निकल सकें

वे अभी ठीक से
जवान भी नहीं हुए थे
ठीक से देखा भी नहीं था
जीवन को

अभी तो उनकी उम्र फूलों से
नदियों से खेतों से फसलों से
प्यार करने की थी
अभी तो उन्हें करना था
अपनी पसंद की लड़की से
प्रेम निवेदन

जो लोग जंगल की ओर चले गए
उनके गुस्से को नहीं समझा गया
उनकी कठोरता के पीछे
छिपे कोमल हृदय की कोई
परवाह नहीं की गई

उनके पवित्र सपनों को कुचला गया
नियमों के नाम पर
लालफीताशाही में लिपटी व्यवस्था के नाम पर
उनकी बातों को बकवास कहकर
हवा में उड़ा दिया गया

वे जंगल में आज भी सोचते हैं
अपने सपने के समाज के बारे में।


देव प्रसाद चालिहा

देव प्रसाद चालिहा को आप नहीं जानते
और अगर जानते भी हैं
तो आप मानेंगे नहीं कि
देव प्रसाद चालिहा को आप जानते हैं

अपने बच्चे भी जान नहीं पाए
देव प्रसाद चालिहा को
पत्नी भी नहीं जान पाई
दोस्त और रिश्तेदार भी नहीं जान पाए
कार्यालय के सहकर्मी भी
अनजान ही रहे

प्रशासन को भी देव प्रसाद चालिहा की
जानकारी नहीं मिली
अखबारों में चुनाव और घोटाले के बीच
खून और खेल के बीच
एक सर्द खबर के रूप में
उपस्थित था वह शख्स
देव प्रसाद चालिहा

कल ऐसा भी हो सकता है
कि आप बन जाएं
देव प्रसाद चालिहा या फिर
मैं बन जाऊं
देव प्रसाद चालिहा या
समूचा देश बन जाए
देव प्रसाद चालिहा

जिस तरह कार्यालय में विषपान
कर छटपटाता रहा वह शख्स
उसी तरह हम सभी
एक-एक कर छटपटाते रहें
एड़ियां रगड़कर मरते रहें
अपना आदर्शों और सिद्धांतों के साथ
अपनी भूख और अपनी शर्म के साथ
अपने दायित्व और अपनी विवशता के साथ
राजकोष पर कुंडली मारकर बैठे रहे सांप
तीन महीने तक वेतन न मिले और
आंखों के सामने अन्न के लिए मचलें बच्चे
जीवन हो मृत्यु से भी बदतर
एक गाली की तरह
जहां बिकना ही हो जीने का एकमात्र रास्ता

चूंकि पशु नहीं बना
इसीलिए कहलाया देव प्रसाद चालिहा
चूंकि बिका नहीं
इसीलिए कहलाया देव प्रसाद चालिहा
और जो भी इस रास्ते पर चलेगा
कहलाएगा देव प्रसाद चालिहा।


धरती की तबियत ठीक नहीं है

धरती की तबियत ठीक नहीं है
इसीलिए बात-बात पर
झुंझला उठती है
अकारण ही मुंह फुला लेती है
किसी बात का गुस्सा
किसी बात पर उतारती है

धरती की तबियत ठीक नहीं है
इसीलिए हवा आहिस्ता बहती है
गुमसुम परिंदे पंख नहीं फड़फड़ाते
नदियां उदासी के साथ
फुसफुसाती हैं

धरती की तबियत ठीक नहीं है
इसीलिए हमलोग
अकारण ही गुर्राने लगे हैं
घृणा के कांटे हमारी देहों में
उगने लगे हैं
संशय के अंधेरे ने
जीवन की गरिमा छीन ली है।


हथेली

विषाद से भीगे चेहरे
रखना चाहता हूं
हथेली
पराजय से झुके हुए कंधों पर
रखना चाहता हूं
हथेली

चाहता हूं चट्टान की तरह
मेरी हथेली
रोक ले
अंधरे को
आंखों में समाने से पहले

चाहता हूं हथेली पकड़कर
डूबने वाला
किनारे तक पहुंच जाए

तितली की तरह सुख को
रखना चाहता हूं
हथेली में बंद करके

पंखुड़ियों की तरह टीस को
हथेली पर फैलाकर
महसूस करना चाहता हूं

अपनी धरती को रखकर
अपनी हथेली पर
मैं मग्न रह सकता हूं

छूकर देखो इसे
हथेली नहीं
मेरा हृदय।

 

परिचय

हवा ने बीज से नहीं पूछा था
उसकी जाति के बारे में
उसके प्रांत के बारे में
उसकी मातृभाषा के बारे में
और हवा
बीज को उड़ाकर ले आई थी

बीज मिट्टी के साथ
घुल-मिल गया था और
एक फूल के पौधे के रूप में
अंकुरित हुआ था

हवा की तरह चिड़िया भी
बीज से नहीं पूछती
निर्धारित प्रपत्र के प्रश्न
हवा की तरह चिड़िया भी
बीज से नहीं मांगती
सच्चे-झूठे प्रमाण-पत्र

और मनुष्य जड़ की तलाश में
उन्मादित हो जाता है
अतीत के मुर्दाघर में भटकता है
हवा की तरह
चिड़िया की तरह
और मिट्टी की तरह
सहज नहीं रह जाता

खून के लाल रंग को भूलकर
पीले और नीले
काले और भूरे रंग के भ्रम में
पंचतंत्र का शेर बन जाता है
मेमने पर पानी गंदा करने का
आरोप लगाता है
मेमने की सफाई सुनकर
उसके पूर्वज को दोषी बताता है
और मेमने को दंडित करता है।

 

मेरे सतरंगे सपने

मैं खोई हुई चीजों की तलाश में निकला था
सरसों के फूलों से छिपे खेतों ने चुराए थे
बचपन के कुछ पीले सपने

मैंने पहली बार जाना कि पीलापन
सिर्फ बीमार चेहरों का रंग ही नहीं होता
पीलापन इंद्रधनुष का भी हो सकता है
और फूलों का भी

जलकुंभी से लदे पोखर ने चुराए थे
बचपन के कुछ हरे सपने

हमने बार-बार डुबकी लगाकर पानी के भीतर
जलपरी की तलाश की थी
उस सुरंग की तलाश की थी
जो जाती थी सोने-चांदी के देश में

मैंने नीले आकाश और धुंध की सफेदी के बीच
नीले और सफेद सपनों की तलाश की

मेरे सतरंगे सपने
गांव से लेकर शहर तक
बिखरे हुए थे और मुझसे आंखें मिलाकर
पूछ रहे थे-
टूटने का कोई दर्द भी होता है?


सोमालिया में जेन फोंडा

सोमालिया में दम तोड़ते हुए एक बच्चे का
हाथ थाम लिया है जेन फोंडा ने
जेन फोंडा बच्चे की आंखों में
मौत की परछाई को पहचानने की कोशिश कर रही है
और मौत को तेजी से बढ़ते हुए देख रही है

जेन फोंडा के चेहरे पर दुःख है
यह दुःख हॉलीवुड की फिल्मों से
अगल किस्म का दुःख है
छायाकारों का झुंड इस क्षण को
कैमरे में कैद कर रहा है

प्रति मिनट मरने वाले पंद्रह बच्चों में
वह बच्चा भी शामिल है
जिसका हाथ जेन फोंडा ने थाम रखा है
कुछ ही सेकेंड में सर्द होकर लुढ़क जाएगा
उस बच्चे का कोमल हाथ।


स्कूल में गोलीबारी

वीडियो गेम की काल्पनिक दुनिया में
वे रचते थे असली नजर आने वाले किरदारों को
माउस की क्लिक के सहारे वे नष्ट करते थे
अपने ही किरदारों को
उन्हें खून बहते हुए देखकर
तनिक भी डर नहीं लगता था

डर उन्हें लगता था अंधेरे से
अकेलेपन से रिश्तों के खोखलेपन से
माता-पिता के असंभव सपनों पर सवार होकर
वे जिस सफर पर निकले थे
वह सफर किसी मंजिल पर नहीं पहुंचता था

पैसे के क्रूर परिवेश ने पैदा होने के बाद ही
धुन की तरह नष्ट करना शुरू कर दिया था
उनके भीतर की संवेदनशीलता को
उन्होंने प्रतिशोध का पाठ सीखा था
परिवार से समाज से देश और दुनिया से
इसीलिए उन्होंने वीडियो गेम की काल्पनिक दुनिया की तरह
असली जीवन में भी जब अपने ही सहपाठी को
गोली मारी तो वे तनिक भी डरे नहीं।


प्रवासी मजदूर भजन गाते हैं

प्रवासी मजदूर भजन गाते हैं
शाम ढलते ही सड़क के किनारे अर्द्ध निर्मित मंदिर में
एक मजदूर की सधी हुई उंगलियां
पुराने हारमोनियम पर दौड़ती रहती हैं
एक मजदूर ढोलक बजाता है
और बाकी मजदूर तालियों की थाप के साथ
सुर में उड़ेलते रहते हैं प्राण

प्रवासी मजदूर भजन गाते हैं
‘कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ...’
‘की लए के शिव के मनायब हे
शिव मानत नाहीं...’
ऐसे कई गीत जो गांव में चलते वक्त
वे स्मृतियों की गठरी में बांधकर ले आए थे

प्रवासी मजदूर भजन गाते हैं
और दिन भर बहाए गए पसीने की टीस
भूलने की कोशिश करते हैं
अगली सुबह जिंदगी से दो-दो हाथ करने के लिए
अपने आपको तैयार करते हैं।


लुभावने वादों का पार्श्वसंगीत

लुभावने वादों का पार्श्वसंगीत बज रहा है
कड़वा यथार्थ तीखी धूप बनकर आबादी को
झुलसा रहा है
अजीब दौर है जब इठलाती हुई झूठ चल रही है
राजमार्गों से होकर गरीबों की झोपड़ियों तक
झूठ की यात्रा का सीधा प्रसारण हो रहा है
गदगद होकर शासकगण कह रहे हैं
यही सच है प्रजागण, जिसे तुम झूठ
समझ रहे हो असल में यह झूठ नहीं है
उसका जन्म होता है चुनावी घोषणाओं के गर्भ से
उसे योजनाओं की पालकी में झुलाया जाता है
सोने की लंका में लाड़-प्यार के साथ पाला जाता है

लुभावने वादों का पार्श्वसंगीत सम्मोहक होता है
धीरे-धीरे लुप्त होने लगती है आम आदमी की स्मृतियां
वह भूल जाता है पुराने वादे पुराने विश्वासघात
प्राकृतिक आपदा राष्ट्रहित का सौदा घपलों की खाई में
गिरने वाली आकृतियां रक्तपात की आग में घी डालने वाले हाथ
वह फिर आशा की कश्ती पर हिचकोले खाने लगता है
रटने लगता है चुनाव के नए नारे कतार में खड़ा हो जाता है
भीख की तरह कंबल या साड़ी हासिल करने के लिए।


बर्बर भी करते हैं शांतिपाठ

बर्बर भी करते हैं शांतिपाठ
पहनते हैं मानवता का मुखौटा
मानवीय सहायता की हामी भरते हैं
सरहद पर रोक देते हैं अनाज
दवा, कपड़ों से भरे हुए वाहनों को
बर्बर जब आक्रमण करते हैं तो
कहते हैं इंसाफ कर रहे हैं
स्कूलों, अस्पतालों और रिहाइशी इलाकों पर
बम बरसाते हुए वे तर्क देते हैं
कि उनकी चेतावनी सुनी नहीं गई
इसीलिए वे आक्रमण रोकने का अनुरोध
नहीं सुनते है
टीवी फुटेज में बच्चों के शवों के ढेर को
देखती रहती है दुनिया
बच्चे जो भविष्य के निर्माता थे
युद्ध के स्मारक बन जाते हैं
बर्बर पहले उन्हें जीने की
अनुमति नहीं देना चाहते
बर्बर की बर्बरता पर कोई
सवाल नहीं खड़ा होता।


जिंदा रहते हैं सपने

विद्रोह को कुचल दिया जाता है
लेकिन जिंदा रहते हैं सपने
सपनों का कोई मुख्यालय नहीं
न ही छिपने के लिए बंकर
न ही भागने के लिए कोई गुप्त मार्ग

जब अन्याय फहराता है जीत का पताका
वंचित के सीने में बीज की तरह
अंकुरित होता है सुलगता हुआ सपना
जब अन्याय विद्रोह की छाती पर पैर रखकर
घोषणा करता है कि अब
खत्म हो गई हैं सारी चुनौतियां
खामोश हो गए हैं प्रतिवादी स्वर
उसी समय किसी बच्चे की मुट्ठी तन जाती है
आंखों में विद्रोह समा जाता है

विद्रोह को कुचल दिया जाता है
लाशें बिछा दी जाती हैं खेतों में खलिहानों में
नदी और सागर को लाल कर दिया जाता है
विद्रोहियों के रक्त से
नए सिरे से जन्म लेता है विद्रोही
प्राचीन सपने को कलेजे से लगाकर
आदेश या अध्यादेश मानने से
वह इंकार कर देता है।


सपनों का शिलान्यास

सपनों का शिलान्यास किया जाता है
श्रीमान अथवा सुश्री के कर-कमलों को कष्ट देते हुए
मंचित किया जाता है पूर्व निर्धारित पाखंड अथवा प्रहसन
दर्शक किराए के होते हैं अथवा
डंडे के जोर पर जुटाए गए होते हैं
तालियों का समय तय होता है कि किस पंक्ति के बाद
बजेगी कितनी देर तक तालियां
नारों का समय तय होता है किस मुखड़े पर मुस्कराहट देखने के बाद
दोहराए जाएंगे नारे

सपनों का शिलान्यास किया जाता है
श्रीमान अथवा सुश्री को अमरत्व की खुशफहमी दिलाने के लिए
योजनाओं की सवारी तंत्र की सुरंग में गुम हो जाती है
शिलान्यास के स्थान पर उग आते हैं जंगली पौधे
लोगों की प्रतीक्षा खत्म होने का नाम नहीं लेती
शिलान्यास की परिघटना के बावजूद
निर्मित नहीं हो पाता सपने का शिल्प
पृष्ठभूमि में धकेल दिए जाते हैं श्रीमान अथवा सुश्री
मिटा दिए जाते हैं पत्थर पर लिखे गए अक्षर।

 

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दिनकर कुमार

जन्म     :    5 अक्टूबर, 1967, बिहार के दरभंगा जिले के एक छोटे से गांव ब्रहमपुरा में।
कार्यक्षेत्र    :    असम
कृतियां    :    तीन कविता संग्रह, दो उपन्यास, दो जीवनियां एवं असमिया से पैंतालीस पुस्तकों का अनुवाद।
सम्मान     :    सोमदत्त सम्मान, जस्टिस शारदाचरण मित्र स्मृति भाषा सेतु सम्मान, जयप्रकाश भारती पत्रकारिता सम्मान एवं शब्द भारती का अनुवादश्री सम्मान।
संप्रति    :    संपादक, दैनिक सेंटिनल (गुवाहाटी)
संपर्क     :    हाउस नं. 66, मुख्य पथ, तरुणनगर-एबीसी, गुवाहाटी-781005    (असम), मो. 09435103755,
ई-मेल : dinkar.mail@gmail.com

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
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