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तेजेन्द्र शर्मा विशेष : नूर जहीर का संस्मरण - एक रफ़ीक़

(तेजेंद्र शर्मा - जिन्होंने हाल ही में अपने जीवन के 60 वर्ष के पड़ाव को सार्थक और अनवरत सृजनशीलता के साथ पार किया है. उन्हें अनेकानेक बधाईयाँ व हार्दिक शुभकामनाएं - सं.)

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एक रफ़ीक़

- नूर ज़हीर

पहली मुलाक़ात पर ही आप डेढ़ घण्टे देर से पहुंच रहे हैं। शहर लन्दन और मिलने की जगह बेकरलू अण्डरग्राउण्ड रेल्वे लाइन का अन्तिम स्टेशन - हैरो अण्ड वील्डस्टोन हो। आपके दिमाग़ से माफ़ी के जुमले तो कबके उड़ चुके होंगे, क्योंकि मिलने की तो कोई उम्मीद ही नहीं रही होगी। जब देर दस पन्द्रह मिनट की थी तो दिल में क्षमा मांगने के कितने ख़ूबसूरत जुमले उभर रहे थे। मिनट जब घण्टे की तरफ़ बढ़ने लगे तब उस माफ़ी में कुछ विशेषण जोड़ कर, ग़लत ट्रेन पर बैठ जाने की अपनी बेवक़ूफ़ी और फिर किंग्ज़ क्रॉस स्टेशन पर खो जाने की हिमाक़त को बेहतरीन लफ़्ज़ों से संवारा था।

परन्तु जब देर एक घन्टे से भी आगे पार हो जाए और आपके पास फ़ोन या सूचित करने का और कोई माध्यम ही न हो, तो आपको यक़ीन हो जाता है कि मिलने वाला जा चुका होगा। स्टेशन की सीढ़ियां उतरते हुए आपकी नज़रें किसी अन्जान चेहरे में पहचान की उत्सुकता देखने के बजाए, चारों तरफ़ पब्लिक फ़ोन बूथ तलाश कर रही हों और जेब में पड़ा पांच पाउण्ड का अण्डरग्राउण्ड का पास, बार बार हाथ में आ कर यह याद दिला रहा हो कि आप इसके सहारे कहीं भी आ जा सकते हैं। ऐसे में इन्सानों के बजाए, लाज़मी है कि आप दीवारों पर दिशा-तीर ढूंढेंगे।

हिन्दुस्तानी लगने वाले साहब पर एक उचटती सी नज़र डालकर मैं आगे बढ़ रही थी कि उनकी मुस्कुराहट देख कर रुक गई। वैसे भी मुझे मुस्कुराते लोग पसन्द हैं। भूमण्डलीकरण, साम्प्रादायिकता और सामाजिक उठा-पटक के दौर में जो अकेला खड़ा मुस्कुरा रहा हो, वह वाक़ई पसन्द करने के क़ाबिल है और फिर मुस्कुराने वाला एक ख़ूबसूरत पुरूष हो... मैं चेहरे पर सवालिया निशान लिए उनकी तरफ़ बढ़ी और वह बड़े तपाक से बोले, “नमस्कार जी, मैं तेजेन्द्र शर्मा। सारी माज़रत और माफ़ी तो कबकी फ़ाइल हो चुकी थी। कौन सी फ़ाइल खोलें और क्या कहें की हड़बड़ी में मैं हकलाने लगी। मुस्कान ज़रा और फैली, “गाड़ी बाहर है, मेरे दामाद लेकर आए हैं।

उनकी मुस्कुराहट आंखों तक तो बहुत पहले पहुंच गई थी, अब उनका पूरा चेहरा मुस्कुरा रहा था और अजीब बात यह कि वे जब गम्भीर हो कर मुझे लन्दन के उस क्षेत्र से परिचित करवा रहे थे तब भी उनकी मूंछें मुस्कुरा रही थीं। उनके चेहरे पर मूंछें उस साज़ की तरह हैं, जो छेड़े जाने के बहुत बाद तक झनझनाता रहता है। शायद इसी गूंज से सुर मिला कर वह एक पुराना हिन्दी फ़िल्मी गीत गुनगुनाने लगे। बीच बीच में धुन तोड़कर कोई इमारत या मूर्ति दिखाते और दोबारा तालचक्र तोड़े बिना गीत की डोर थाम लेते। आदमी दिलचस्प मालूम दिए।

बचपन से यही सिखाया गया कि साहित्य से जुड़ा हर इन्सान अपने ही परिवार का सदस्य है। कभी कभी अपनापन दिखाते हुए, रूखे सूखे व्यवहार का भी सामना करना पड़ा है। और दिल ने यह तसल्ली दी है कि परिवार में हर क़िस्म के लोग होते हैं। फिर भी तेजेन्द्र जी के घर में दाख़िल होते हुए, दिमाग़ ने ज़रा संभल कर चलने की ताक़ीद की। दिल कितना ज़रूरी अंग है औ दिमाग़ कितनी फ़ालतू चीज़ इसका सुबूत अगले ही पल मिल गया। बैठक में फ़र्नीचर कम और पढ़ने लिखने का साज़ो-सामान ज़्यादा दिखा। भला पढ़ने लिखने में साज़ कैसे? तो वह ऐसे कि एक कोने में कम्प्यूटर भी रखा दिखा। पूरे कमरे का हाव भाव कह रहा था कि यहां औपचारिकता के लिए जगह नहीं है और अपनापन तो कहीं न कहीं जगह बना ही लेगा। मैं चौकड़ी मार कर दीवान पर बैठ गई। हैरानी का सिलसिला अभी ख़त्म नहीं हुआ था। गुड़िया जैसी प्यारी दिखने वाली, तेजेन्द्र जी की बेटी दीप्ति, बैंक की बड़ी अफ़सर निकली।

बातों का सिलसिला शुरू हुआ और खाने का भी, जिसके लिए खाने की मेज़ पर से किताबें, दस्तावेज़, पेन होल्डर वग़ैरह खिसका कर बड़ी मुश्किल से जगह बनाई गई। लखनऊ छूटने के बाद, इतनी उम्दा अरहर की दाल पहली बार खाई थी। तेजेन्द्र जी ने बताया कि उन्होंने ख़ुद बनाई है और कई साल पहले, मुम्बई के नामी रंगकर्मी दिनेश ठाकुर से सीखी थी।

ब्रेख़्त ने लिखा है कि खाना पकाते हुए उन्हें अपने नाटकों के प्लॉट सूझते हैं। मैनें पूछा, “क्या आज कोई कहानी लिखी है आपने? ” मुस्कान भरी आंखों में हैरानी के साथ ख़ुशी झलकी, “जी, आज ही एक कहानी सोची है, आधी के क़रीब लिख भी डाली है। अभी आपको सुनाऊंगा। खाना ख़त्म होते होते उनकी पत्नी, जो किसी मीटिंग में गई हुई थीं, लौट आईं, और कम्प्यूटर खोल कर अफ़सानागोई का दौर शुरू हुआ। एक साल बाद, यही कहानी, ‘क़ब्र का मुनाफ़ा' के नाम से तेजेन्द्र जी के नये कहानी संग्रह ‘बेघर आंखें' में प्रकाशित हुई। कहानी क्या मोड़ लेगी और कहां जाकर ख़त्म होगी, यह उन्होंने ठीक वैसे ही सुनाया। कहानी बग़ैर कोई डरावनी बात कहे, एक ऐसा भयावह किस्सा है जिसकी याद जब भी आए दिल को लरज़ा जाए।

अक्सर कहानीकार, अपनी लिखी हुई चीज़ ख़ुद मज़ा लेकर नहीं पढ़ते। शायद सारे ‘क्लाइमेक्स' और ‘ड्रामाटिक ऐलिमेण्ट' से वे स्वयं इतनी बार ग़ुज़र चुके होते हैं कि जाने पहचाने उतार चढ़ाव के बयान में नयापन नहीं पैदा कर पाते। कहानी के साथ साथ जब उनके पढ़ने के अन्दाज़ की भी मैंने तारीफ़ की तो वे ज़रा झेंपकर मुस्कुराए, मूंछें झनझनाईं और गालों पर हलकी सी लाली आ गई, “वो क्या है कि मैंने बहुत दिन थियेटर किया है न! ”

उनकी शख़्सियत की परतें एक एक करके खुल रही थीं। क़ब्र का मुनाफ़ा' कोई लम्बी कहानी नहीं है। उसे सुनने के बाद फ़िराक़ गोरखपुरी की कही हुई बात याद आई, “लफ़्ज़ों के इस्तेमाल में एहतियात बरतिए। इनमें जान होती है। ”

तेजेन्द्र जी के कवि पहलू से मुलाक़ात तो दिल्ली से लन्दन की फ़्लाइट पर ही हो चुकी थी। उनकी कविताओं का प्रूफ़ मेरे हाथ प्रकाशक ने लन्दन भिजवाया था। नौ घन्टे के उकता देने वाले सफ़र में कई अच्छी कविताओं का साथ रहा।

अगर साहित्य रचना को काम न मानें और उसी वक़्त-गुज़ारी को काम गिनें जिससे आमदनी होती है तो तेजेन्द्र जी लन्दन के ओवरग्राउण्ड रेल्वे कम्पनी में काम करते हैं। लेकिन साहित्य से ताल्लुक़ रखने वाले लोगों में एक ऐसे रचनायक का दर्जा रखते हैं जो अपने दायरे को लांघ कर, वह मोती तलाश करने की कोशिश करता है जिसके मौजूद होने का उसके पास कोई पक्का सुबूत न हो। जो अपनी यात्रा से लौटते हुए, क़ीमती मगर आम मिल जाने वाले मोती के बजाए, ऐसे नायाब और अनदेखे गौहर ले आए कि देखने वालों की आंखें फटी रह जाएं।

मैनें अक्सर पाया है कि लोग अपने जानकारों से परिचय करवाते हुए कतराते हैं। आपसे बहुत अच्छी तरह पेश आने के बावजूद, आपको असरदार लोगों से मिलवाने की बात पर साफ़ कन्नी काट जाते हैं। शायद इस डर से कि कहीं वे आपके अच्छे दोस्त ना बन जाएं। तेजेन्द्र जी इसके उलट हैं। इसका एक उदाहरण कुछ ही देर में हाथ में केक का डिब्बा लिए दाख़िल हुआ - ज़कीया ज़ुबैरी - हिन्दुस्तान की पैदाईश, पाकिस्तान में शादी और अब ब्रिटेन की नागरिक और लन्दन के कॉलिन्डेल क्षेत्र की काउंसलर। डटकर यू.पी. के भाईयों ने गप लड़ाई। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने अपनी मर्सीडीज़ में घर तक छोड़ा।

तेजेन्द्र जी से अच्छी पहचान, बेहतर दोस्ती से होती हुई गहरी मित्रता की तरफ़ चल निकली थी। मगर अभी तक उतनी पुरानी नहीं हुई थी कि उनपर उस जगह ले जाना थोपा जा सके जहां जाए बग़ैर मेरा लन्दन आना अधूरा था। भारत नाम के पुराने देश की प्राचीन सभ्यता और पुरातन संस्कृति की यह नई जटिलता है। हम झट से किसी के सामने अपनी ख़्वाहिशें पूरा करने का दामन नहीं फैला सकते। इस मामले में अमरीका और ऑस्ट्रेलिया के निवासी हमारे मुक़ाबले काफ़ी तेज़ हैं। पहली मुलाक़ात के तीसरे ही दिन उनका फ़ोन आया। उस दिन की ख़ातिर पर धन्यवाद को काटते बोले, “आप शनिवार को क्या कर रही हैं ? जो भी कर रही हैं उसे कैंसिल कर दीजिये, क्योंकि आपको हमारे साथ चलना है।

“जी !” मैंने ज़रा चौंकते हुए पूछा।

“जी हां! हमने तय किया है आपको शनिवार को कार्ल मार्क्स की क़ब्र दिखाने ले जाएं।

अचम्भे से मेरी बोलती बन्द हो गई। शायद मैं काफ़ी देर चुप रही क्योंकि उन्होंने काफ़ी जोर से ‘हेलो, हेलो' कहा। मेरे हकलाते, लड़खड़ाते शुक्रिए को फिर से काटते हुए वह फ़िंचले रोड के स्टेशन पर पहुंचने का वक़्त और रास्ता समझाने लगे।

पहली बार का कुछ कर्ज़ उतरा क्योंकि इसबार तेजेन्द्र जी 20 मिनट देर से आए। ज़कीया बाजी गाड़ी लेकर कुछ दूरी पर खड़ी थीं। हम पच्चीस मील के सफ़र पर निकल चले। लन्दन की भीड़ भाड़ का इलाक़ा जल्द ही पीछे छूट गया और सड़क हरे भरे जंगल को काटती हुई गुज़रने लगी। तेजेन्द्र जी बराबर मुझे बाहर दिखने वाली चीज़ों के बारे में जानकारी दे रहे थे। बीच बीच में ज़कीया बाजी टिप्पणी करती जातीं। हम जंगल से निकलकर फिर आबादी में आ गए। ज़कीया बाजी बता रही थीं कि लंदन के फैलाव को देखते हुए तक़रीबन दो सदी पहले इस जंगल को महफ़ूज़ कर लिया गया था ताकि हरियाली बनी रहे। यह बीहड़ जंगल नहीं है, सभ्य जंगल है जिसकी बाक़ायदा देख रेख भी होती है, और जिसमें भीतर जा कर टहलने के कई रास्ते हैं।

यह बातें चल ही रही थीं कि तेजेन्द्र जी ने अचानक एक तालाब के पास गाड़ी रोकने को कहा। ज़कीया बाजी के ‘क्यों' पर बड़ी सादगी से बोले, “नूर, यह जगह ज़रूर देखना चाहेगी। ... नूर, यहां पर कीट्स अपने अंतिम दिनों में रोज़ टहलने आया करते थे। मैं उत्सुकता से बाहर देखने लगी। छोटा सा तालाब था, जिसे शायद संजोये रखने के लिये पक्का कर दिया गया था। चारों तरफ़ भी पत्थर की चिनाई, जिसे ‘काबल्ड' कहते हैं, करीने से की गई थी। कुछ दूरी पर लोहे की, बहुत पुरानी कंगूरेदार बेन्चें थीं। शायद इन्हीं पर वह कमज़ोर होता हुआ, तपेदिक़ का मारा शरीर, डूबते सूरज की तरफ़ मुंह करके कुछ देर सुस्ताता होगा। और वह दिल जो हर वक़्त भावनाओं को शब्द में ढालने का यत्न करता था, उदास होकर जिस्म से कहता होगा, “इतनी जल्दी क्या है साथ छोड़ने की अभी तो बहुत कुछ कहना बाक़ी है। मैंने तेजेन्द्र जी की तरफ़ देखा तो उन्होंने ‘हां' में सिर हिलाया। बग़ैर कुछ बोले वह कह रहे थे, “जो दुबला सा उदासी के बादल से घिरा साया तुम्हें दिख रहा है उसे मैंने भी देखा है। उस लम्हे से लगने लगा कि हम एक ही राह के मुसाफ़िर हैं। हो सकता है कुछ आगे पीछे हो जाएं या कभी कभार कोई पगडण्डी पकड़, मुख्य पथ से कुछ अलग निकल जाएं, लेकिन हमें एक जैसी अनुभतियों से गुज़रकर, एक जैसी मंज़िल को पाना है।

कुछ इसी यक़ीन की वजह से शायद, एक क़दीम और नामी पब में खाना ऑर्डर करते हुए, उन्हें ज़रा असमंजस में देख कर मुझे ज़रा हैरानी हुई।

“आप कौन सा मीट खाना पसन्द करती हैं? ”

ओहो! तो यह बात थी! “अब नौ से चूहे खा कर क्या हज करें तेजेन्द्र जी। सब कुछ खाते हैं, पोर्क भी और बीफ़ भी।

उनके चेहरे पर इत्मीनान आया और ज़कीया बाजी हंस हंस कर अपने एक बार ग़लती से पोर्क खाने का किस्सा सुनाने लगीं।

हाईगेट सिमेट्री का टिकट लेकर हम तीनों अन्दर दाख़िल हुए। मौत को संजीदा, गम्भीर हुस्न देना तो कोई अंग्रेज़ों से सीखे। यह सिमेट्री, कब्रिस्तान कम और दिलकश बाग़ ज़्यादा है। एक कोना शायद वामपन्थी विचारधारा के लोगों के लिए अलग है। यहां पर मुसलमान, ईसाई और यहूदियों की क़ब्रें हैं। शायद इन लोगों ने मार्क्स की क़ब्र के पास दफ़नाए जाने की ख़्वाहिश प्रकट की होगी। एक तरफ काले रंग की कार्ल मार्क्स की क़ब्र है, जिसके ऊपर उनका मुज्जसिमा है।

सारे रास्ते तेजेन्द्र जी बातें करते रहे थे। हाईगेट सिमेट्री में दाख़िल होते ही वह बिल्कुल चुप हो गए। क़ब्र के पास तक ले जाने वाली पगडण्डी पर वे दो क़दम पीछे हो गए और हाथ के इशारे से ज़कीया बाजी को भी अपने साथ कर लिया। मैं जानती हूं कि तेजेन्द्र जी कम्युनिस्ट नहीं हैं। बहुत खींचतान करके उन्हें वामपन्थी भी नहीं कहा जा सकता। फ़लसफ़े के स्तर पर मार्क्स के फ़ैन हों, ऐसा भी नहीं है। लेकिन वे एक ऐसे इन्सान हैं जो यह समझ सके, कब दोस्त को ख़ामोशी की ज़रूरत है। कब दोस्त, बहुत अच्छी मित्रता में भी, कुछ लम्हे अपने साथ अकेले रहना चाहता है।

उसके बाद तेजेन्द्र जी से दिल्ली में एक बार मुलाक़ात हुई। मगर फ़ोन और ई-मेल पर अक्सर बातें होती रहीं। उस दोपहर से लेकर आजतक मैं यह सोच रही हूं कि तेजेन्द्र जी से अचानक हुई दोस्ती को क्या नाम दूं - दोस्त, बन्धु, मित्र को दिमाग़ एक के बाद एक, घिसा पिटा, मामूली, हलका कहकर रद्द करता रहा।

कुछ दिल पहले जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में मेरी नई किताब ‘माई गॉड इज़ ए वुमैन' पर चर्चा रखी गई। किताब बेहद तारीफ़ और कड़ी निन्दा के बीच डोल रही थी। शरीयत को आज के दौर में तौलते हुए लिखी गई किताब का, मुस्लिम बहुमत के माहौल में क्या हाल होगा, यह सोचकर दिल बेचैन था। इसीलिये मैंने बहुत क़रीबी दोस्तों को सूचित नहीं किया।

ऐन चर्चा के दिन तेजेन्द्र जी का ई-मेल आया। न जाने कहां से उन्हें लन्दन में ख़बर मिल गई थी। बेहद नाराज़ थे कि उन्हें सूचित क्यों नहीं किया। लेकिन अन्त में कार्यक्रम सफल होने की कामना भी थी और अपने साथ होने का आश्वासन भी।

सचमुच ऐसी दोस्ती को क्या नाम दिया जाए? ऐसा दोस्त, जो हज़ारों मील दूर रहकर भी, मेरे भीतर चल रही कशमकश को जान जाए, मेरी घबराहट और अन्देशों को समझ जाए और यह मानकर कि चिन्ता के बावजूद यह सब बातें कहना मेरे लिये कितना ज़रूरी है, दिमाग़ी और रूहानी तौर पर मेरे साथ हो।

रफ़ीक़! शायद ऐसे ही दोस्त को रफ़ीक़ कह सकते हैं .... शायद!

 

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