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तेजेन्द्र शर्मा विशेष : सूर्यबाला का संस्मरण - ‘है किसी दोस्‍त/दुश्‍मन के बूते की बात!'

   (तेजेंद्र शर्मा - जिन्होंने हाल ही में अपने जीवन के 60 वर्ष के पड़ाव को सार्थक और अनवरत सृजनशीलता के साथ पार किया है. उन्हें अनेकानेक बधाईयाँ व हार्दिक  शुभकामनाएं - सं.)

है किसी दोस्‍त/दुश्‍मन के बूते की बात!'

किस्‍सा कोताह तेजेन्‍द्र शर्मा'

- सूर्यबाला

यह एक हकीकत है कि तेजेन्‍द्र सा खिलंदड़ा, तेजेन्‍द्र सा जुझारू, तेजेन्‍द्र सा अलमस्‍त और तेजेन्‍द्र सा जीवट वाला इंसान मैंने आज तक नहीं देखा। परेशानी यह है कि ऊपर गिनाये विशेषण या कह लीजिए खूबियाँ, उसके नाम के साथ चस्‍पा होने के साथ ही अपने डाइमेन्‍शन में इजाफा करने लगती हैं। मसलन, खिलंदड़ा है तो बेफिक्री की किस सीमा तक और जुझारू है तो क्‍या सिर्फ अपने लिये? सफलता का सेहरा सिर्फ अपने सिर बाँधना या बंधवाना चाहता है वह या दूसरों की कामयाबियाँ भी लोगों के सामने ले जाने के लिये भी बेहिचक आगे आता है ? बेशक दोस्‍त दुश्‍मनों (होंगे ज़रूर ... ) के जवाब और बातें अपने खाते में दर्ज होती रहेंगी लेकिन अपनी तरफ से मुझे इतना अवश्‍य जोड़ना है कि डॉयलाग अदायगी के तेजेन्‍द्र के दो-टूक अंदाज़ से लेकर उसके अड़ियलपन तक की मैं तहेदिल से कायल हूँ। जो कहेगा, डंके की चोट पर और जो ठान लेगा अच्‍छा या बुरा, उससे उसे डिगा पाना किसी दोस्‍त दुश्‍मन के बूते की बात नहीं। ....

कोई आज से ? हर्गिज नहीं। बीसेक साल तो हुए ही होंगे। पत्‍नी के निधन के बाद, उसके नाम से ‘इंदू शर्मा कथा पुरस्‍कार' की खबर सुनी तो कोई खास हलचल नहीं हुई। होने की बात भी नहीं। अपने आत्‍मीयजनों की स्‍मृति में पुरस्‍कारों की स्‍थापना जैसी परंपरा नई नहीं। जैसे इतने पुरस्‍कार, वैसे ही एक और। सो हो गई घोषणा। छप गए निमंत्रण-पत्र। लेकिन आये दिन आने वाले निमंत्रण पत्रों से सर्वथा अलग, कलात्‍मक और सुरूचिपूर्ण। पुरस्‍कार भी किसी नेता, अभिनेता टाइप द्वारा नहीं बल्‍कि वरिष्‍ठ कवि, कथाकार, धर्मयुग के पूर्व संपादक डॉ. धर्मवीर भारती के हाथों... जो ऐसे समारोहों में कभी आते-जाते ही नहीं...चलो, अनुनय विनय से मनावनी कर ली होगी.... बहरहाल कयास लग रहे थे, चर्चाओं की चिंदियां जहाँ-तहाँ बिखरी नज़र आती थीं और वक्‍तव्‍यों का फुटकरिया बाजार गर्म था।....

लेकिन निश्‍चित दिन, निर्धारित समय, एयर इन्‍डिया के सभागार में शुरू हुए और गरिमापूर्वक सम्‍पन्न हुए इस आयोजन की भव्‍यता लोगों के लिये एक स्‍थायी स्‍मृति छोड़ गई। दुःखों को ग्‍लोरीफाई क्‍या ‘ग्‍लैमरीफाई' तक करने जैसे छुपे आरोपों के बावजूद, तेजेन्‍द्र के तरीके से लोगों को भला क्‍यों गुरेज होगा अगर वह यह काम सलीके से कर ले जाता है और लोगों को दाँतों तले उंगलियाँ दबानी पड़ जाती हैं। तो तेजेन्‍द्र को काम करने का सलीका आता है।

इंदू शर्मा कथा-पुरस्‍कार से ही जुड़ी, दूसरे वर्ष की बात है। सुबह की पूजा से उठते-उठते तेजेन्‍द्र का फोन आता है और अपने विशिष्‍ट लहजे में वे जो कुछ कहते हैं उसका आशय यह कि चूँकि इस वर्ष धीरेन्‍द्र अस्‍थाना को मिलने वाले पुरस्‍कार-समारोह के सिर्फ गिने चुने दिनों पहले, निदा साहब अपने आने को लेकर असमर्थता और अनिश्‍चितता ज़ाहिर कर रहे हैं, इसलिए क्‍या मैं निदा साहब की जगह धीरेन्‍द्र की कहानियों पर बोलने की तकलीफ उठा सकती हूँ ? मैंने तेजेन्‍द्र के असमंजस को खत्‍म करते हुए स्‍वीकृति दी और अपनी समझ से बड़ी सदाशयतापूर्वक कह दिया कि मैं धीरेन्‍द्र के कथासंग्रह पर बोल तो दूँगी ही, निदा साहब की जगह भी मंच पर सुरक्षित रखो, मैं हॉल में बैठ लूंगी और अपनी बारी आने पर बोल आऊंगी।

लेकिन तेजेन्‍द्र को उस शुरूआती दौर से ही अपने बूते पर, पूरे इत्‍मीनान और बेलौसी से निर्णय लेने की आदत है। उनके तरीके में किसी ढीलमढाल की गुंजाइश नहीं रहती, न ऐसी छोटी-मोटी सदाशयता सहूलियतों के साये में काम करने की आदत। इसलिए बगैर किसी द्वंद्व-विधा के और बगैर जरा भी खुश हुए उन्‍होंने सपाट लहजे में कहा कि.... ‘जी, ऐसा है कि जिस कमा के लिए जो कुर्सी तय है वह तो वहीं से होना है। मैं एक एक्‍स्‍ट्रा चेयर क्‍यों खर्च करूँ ? बैठने की व्‍यवस्‍था में किसी रद्दोबदल की गुंजाइश मैं बिल्‍कुल नहीं देखता।......

यह निर्भीकता तेजेन्‍द्र के पोर-पोर में धंसी हुई है इसीलिये वह हमेशा बेलौस, बेखौफ दीखता है।

एकदम शुरू में उसके इस लहज़े मुझे थोड़ा चौंकाया था। भौंहें खिंचने-खिंचने को हो गई आई थीं। पहला-पहला फोन आया था उसका। कुल जमा एक, अर्थात अपने पहले कथासंग्रह ‘काला सागर' के युवा कथाकार, तेजेन्‍द्र शर्मा का। फोन पर वह उसी इत्‍मीनान से अपना परिचय दिए जा रहा था कि अभी दिल्‍ली में उसके इस कथा संग्रह पर गोष्‍ठी हुई थी जिसमें जैनेन्‍द्र और नरेन्‍द्र कोहली जैसे लेखकों ने शिरकत की थी। मैं शायद जल्‍दी में थी। थोड़ी बेसब्री में बोली थी - जहाँ तक आप अपनी पुस्‍तक पर मुझसे बुलवाना चाहते हैं, मुझे कोई आपत्ति नहीं। अच्‍छा लगेगा, लेकिन एक बात मैं आपसे पहले ही कह देना पसंद करूंगी कि पुस्‍तक मुझे जैसी लगेगी वैसी ही बोलने की पूरी छूट चाहती हूँ मैं....... यदि आप मात्र प्रशंसा की अपेक्षा रखते हैं तो.....

‘जी ऐसा है कि प्रशंसा तो मैं बेशक चाहूँगा' , आश्‍चर्य ! उसकी आवाज में जरा भी कंपन नहीं था- ‘लेकिन साफ नीयत के साथ की गई आलोचना भी मेरे हक में ही जाएगी, यह भी जानता हूँ।....

‘एक बात और भी मेरे घर से संगोष्‍ठी-स्‍थल तक मुझे ले जाने और ले आने की ज़हमत भी आपको ही उठानी होगी मैं ज्‍यादा इन रास्‍तों की जानकार नहीं।'

‘जी बिलकुल.... मैं निश्‍चित दिन, निश्‍चित समय स्‍वयं सभागार चलते वक्‍त आपको साथ ही लेता चलूँगा।'

आज तक हिंदी के किसी एक कथासंग्रह के कद वाले कथाकार की आवाज में इतना पुख्‍तापन मैंने नहीं पाया था।

निश्‍चित दिन बेल बजाने पर बाहर निकली तो उसकी लाल मारूति में एक बेहद सजीला चेहरा झाँक रहा था। ‘मेरी पत्‍नी इंदु! .... मुझे अच्‍छा लगा, रास्‍ते में कार रोक कर पिलाया गया जूस भी... जिसका जिक्र मैंने अपने वक्‍तव्‍य में भी किया था। बहरहाल आज से बीसेक वर्ष पहले किसी लेखक की पहली पुस्‍तक पर हुई इतनी गहमागहमी भरी वीडिओ रिकॉर्डिंग से लैंस गोष्‍ठी मैंने पहली बार देखी थी। लेकिन आश्‍वस्‍ति का वास्‍तविक अहसास तब हुआ जब उक्‍त संगोष्‍ठी के आठ दस दिनों बाद तेजेन्‍द्र का फोन आता है और उसकी पुस्‍तक पर हुई इतनी सफल संगोष्‍ठी पर मेरे बधाई देने पर वह कहता है कि संगोष्‍ठी में बोलनेवाले वक्‍ताओं की रिकार्डिंग सुनते हुए मैं आपके वक्‍तव्‍य के उस अंश को बड़े ध्‍यान से सुनाता रहा जहाँ आपने कहा है कि.... ‘कहानियाँ बेशक पठनीय और दिलचस्‍प है..... मर्मस्‍पर्शी भी... लेकिन कहानी का रोल क्‍या इतने पर समाप्‍त हो जाता है ? नये कथाकार के लिये इस पर सोचने की बहुत ज़रूरत है'...

तेजेन्‍द्र के कथाकार पर मेरा एतबार उसी दिन गहरा आया था। भरोसा जमा था कि यह सिर्फ हवा में फिकरें उड़ाने वाला युवा लेखक नहीं है धुन कर काम करने की मंशा भी रखता है।

सचमुच ग़जब की ऊर्जा है उसमें। अंदर बाहर दोनों की ताकत से लबरेज़। बाहर की ताकत, जवाँ मर्दो वाला डीलडौल होने के बावजूद, कई बार धक्‍के खाने के बाद अपना अंदरूनी ताकत के बूते पर धूल झाड़ कर उठ खड़ी हुई है।

मुंबई के नानावती अस्‍पताल में बीसियों दिन एडमिट रहने वाला तेजेन्‍द्र आप बीती यों सुनाता है (फोन पर ) जैसे किसी और के साथ गुज़रा आँखों देखा वाकया बयान कर रहा हो -- ‘वो यों हुआ जी कि लंदन में सब-वे की अपनी ड्‌यूटी से निकल कर आता मैं लम्‍हे भर को ब्‍लैक आउट हो वहीं रोल किये पाइप पर गिरा रह जाता हूँ.... और जब यही हादसा दुहराता तिहराता है... यानी ब्‍लैक आउट, यानी ब्‍लड-प्रेशर, कंधों का दर्द पुरानी स्‍पॉन्‍डिलाइटिस... तो सोचा, अब इन सबकी शिनाख्‍़त जरूरी है.... और आ गया यहाँ परसों रिपोर्ट आनी है... फोन करूँगा आपको....

सिर्फ तन पर ही नहीं, मन पर भी गुज़री थी, बहुत कुछ। कुछ शारीरिक अक्षमता के कारण ‘सब-वे' (लोकल) की ड्राइवरी के अयोग्‍य मानकर नौकरी तक जाती रही थी। लेकिन हार मानकर बैठ जाये, वो तेजेन्‍द्र शर्मा कैसा ? सो बाकायदे डटा रहा मोर्चे पर कि ट्रेन का सारा महकमा सिर्फ ड्राइवरी ही तो नहीं करता, अगर मैं ड्राइव करने के लिये अक्षम माना जा रहा हूँ तो नौकरी लेने की जगह दूसरा काम क्‍यों न दिया जाए ?

बात हक और असूल की थी। कहाँ तक गलत ठहराई जाती।

यूँ भी जितना कुछ मैंने देखा, बहुत थोड़ा ही सही पर अंदाज तो लग ही जाता है और उस अंदाज के आधार पर मैंने कभी किसी डर या सकपकाहट को तेजेन्‍द्र के आसपास फटकते नहीं देखा। मस्‍त दिखता है तो रहता भी ज़रूर होगा। क्‍योंकि खूब काम करने वाला ही इतना खुश रह सकता है।

काम की कहें तो -- कहानी, कविता, गीत, गज़ल के साथ-साथ मुंबई से लेकर लंदन तक के कहानीकारों की रचनाओं का चयन, संचयन, कथाकार सूरज प्रकाश के सहयोग से। इंदु शर्मा कथा सम्‍मान तथा ब्रिटेन के किसी कथाकार को दिये जाने वाले ब्रह्मानंद कथा पुरस्‍कार आदि की चयन-प्रक्रिया और आयोजन से जुड़ी तमाम सारी गतिविधियों को अंजाम देना तथा सबसे बढ़ कर हाउस ऑफ लॉर्ड्स जैसे सभाग्रह में किया जाने वाला आयोजन मज़ाक नहीं हुआ करते। प्रशंसा दस की मिलेगी, गालियाँ बाकी नब्‍बे की। वह भी पीठ पीछे।

लेकिन पीछे मुड़ कर देखने का तेजेन्‍द्र के पास टाइम कहाँ है ? समय उसका हाथ छुड़ा कर भागना चाहता भी है तो तेजेन्‍द्र अपने रोबीले अंदाज में रोक कर रखता है समय को। अपना काम करवा कर ही जाने देता है। और, जो चाहा है, ‘समय' से करवाया है उसने। हाथ बाँधे खड़ा रहता है समय जिन्न की तरह उसके सामने। जिंदगी का कोई उधार बकाया रखने में विश्‍वास नहीं करता तेजेन्‍द्र। वह शेष साहित्‍य-जगत की तरह सिर्फ भावना विचार और कल्‍पना में विचरने की जगह, ठोस ज़मीन पर अपने स्‍वप्‍न को साकार करने का माद्दा रखता है और दूसरों के लिये भी सोचता जरूर है वरना कैसे लिखता कि मैं ही मैं हूँ, चलो सोच ऐसी दफन करें.. हर एक को दाद मिले और कोई बात बने।

डॉ. सूर्यबाला

बी-504 रूनवाल सेंटर

गोवंडी स्‍टेशन रोड, देवनार,

मुबई-400 088,

--

साभार-

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