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चंद्रेश कुमार छतलानी की कविता : यादें उलझी सी

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कुछ उग चुके कांटे जब मुझे बहुत तड़पाते हैं
पलकों के ठिकाने पे अपने दर्द को पहुंचाते हैं।

मैं तब यह राज़ जान कर ठगा सा रह जाता हूँ
ज़ख्म यादों के परों पे आकाश को चले जाते हैं।

कभी यादें मंझधार, कभी खुद किनारा होती हैं
राह में गिराती हैं, कभी सबका सहारा होती हैं ।

मैं आईने में खुद को जब सीधा खडा देखता हूँ
सारे अक्स मेरे यादों की हवा से लड़खड़ाते हैं ।
... ज़ख्म यादों के परों पे आकाश को चले जाते हैं।

यादें साज़ भी हैं, यादें ही संगीत, सुर औ राग हैं
यादें नज़रों का नूर भी है और चहरे के भी दाग हैं ।

मैं जब जानना चाहूँ इनको ये कुछ और हो जाती हैं
मेरे सारे हर्फ़ कैसे इस सागर में घुल जाते हैं ।
... ज़ख्म यादों के परों पे आकाश को चले जाते हैं।

---

चंद्रेश कुमार छतलानी

परिचय

जन्म - २९ जनवरी १९७४
जन्म स्थान  - उदयपुर (राजस्थान)

शिक्षा - एम. फिल. (कंप्यूटर विज्ञान), तकरीबन १०० प्रमाणपत्र (ब्रेनबेंच, स्वीडन से)
भाषा ज्ञान - हिंदी, अंग्रेजी, सिंधी

लेखन - पद्य, कविता, ग़ज़ल, गीत, कहानियाँ

पता - ३ प ४६, प्रभात नगर, सेक्टर - ५, हिरण मगरी, उदयपुर (राजस्थान)
फोन - ९९२८५ ४४७४९
ई-मेल - chandresh.chhatlani@gmail.com
यू आर एल - http://chandreshkumar.wetpaint.com

कार्य - १३ वर्षों से कंप्यूटर सोफ्टवेयर एवं वेबसाईट डवलपमेंट का कार्य
        अभी एक विश्वविद्यालय (जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ) में सहायक आचार्य (कंप्यूटर विज्ञान)

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