बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

भूपिंदर सिंह के कुछ शेरो-शायरी

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1.बन्दा ए दिल ए नाज़ुक का मक़ान है
रात भर छत को नज़र पे उठाये रहता है


2. शर -गफ्त बहक-आदाब और बे-नू सा दिखा
अदना गली का हर शख्स भूखा और मय-बू सा दिखा

( शर गफ्त - बुरा बोलने वाला या गालीबाज़ , बहक आदाब - बहके से आचरण वाला , बे-नू - पुराना
मय -बू   - जिस से शराब की महक आती हो )


3. ख़ुर्शीद मग़रिब के इधर आया न कभी
सहरी की दहलीज़ पे मेरे साये ना गए


( खुर्शीद - सूरज , मग़रिब - पश्चिम , सहरी - सुबह या इस शेर में पूर्व दिशा के लिए कहा है )
 
4परस्तिश के लिए हर दीवार से लटकाया गया
पाबन्द ए दीन ए ईमाँ का बेहतर क्या अंजाम होता

(परस्तिश - पूजन , पाबंद ए दीन ए ईमान - ईमानदारी के धर्म का पालक )

5कोई किस्मती इबारत सोने आ जाये कभी
पेशानी के बिस्तर से ये सिलवटें हटाइए
( इबारत - लेख , पेशानी - माथा )

6 लकीरों का राहगीर सहरा की दौड़ में
छोड़ेगा कोई नज़ीर तो भटकों के वास्ते
( सहरा - रेगिस्तान , नजीर - उदाहरण )

7 सिफ़्ल पयामी तेरा न मक़बूल तब्सरा होता
वज़्न शाना तेरे भी और ख़ुश्क गर पैमां होता

( सिफ्ल पयामी - जादुई या सफल  वर्णन कार , मकबूल - प्रसिद्द , तब्सरा - चर्चा , वज़न शाना - बोझिल कंधे ,यहाँ ज़िम्मेवारियों के लिए प्रयुक्त , खुश्क - सूखा , पैमां - मदिरा का पात्र )

8. हर रहबर के साये में सिमटने की क़वायद थी
कई  फ़लसफ़े रद्द हुए और कई ख़ुदा बदल गए
( रहबर - सहयात्री यहाँ साथी , कवायद - प्रक्रिया , फ़लसफ़े - दर्शन /दार्शनिक विचार )

9.  हुक़ूक़ ए जवांदिल  बे तर बे तरीन न हुए
पयामे ख़ाबीदा यूं नहीं के नाज़रीन न हुए
( हुकूक - अधिकार /यहाँ कर्तव्य , बेतर-बेतरीन  - छिन्न भिन्न , पयामे ख़ाबीदा - सपने में दिए सन्देश अथवा सपने में आने वाली के सन्देश , नाज़रीन - दर्शक /यहाँ घटित )

10. ठहर न सकेगी दीद ए महफ़िल नूर ए हुस्न पे आज
ज़िक्र ए रुसवा सर ए महफ़िल लब बदला करेगा
( दीद ए महफ़िल - महफ़िल की नज़र , नूर ए हुस्न - सौन्दर्य की आभा , जिक्र ए रुस्वा - बदनाम की चर्चा ,सर ए महफ़िल - भरी महफ़िल )

11. परवाज़ ए बयाँ अपने के पर ज़रा गिन लूं
सुना हद तेरे क़िरदार की आसमाँ से बात करती है
( परवाज़ - उड़ान )
12.एक दोस्ती आपकी फिर तल्खियाँ निज़ाम से
हो जाएगा मशहूर बेशक  'मामूली ' भी एक दिन
( तल्खियां - कटुता , निज़ाम - प्रशासन/व्यवस्था )

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