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तेजेन्द्र शर्मा विशेष : सुमन कुमार घई का संस्मरण - तेजेन्द्र के अप्रवासी पात्र : अप्रवासी पाठक का दृष्टिकोण

(तेजेंद्र शर्मा - जिन्होंने हाल ही में अपने जीवन के 60 वर्ष के पड़ाव को सार्थक और अनवरत सृजनशीलता के साथ पार किया है. उन्हें अनेकानेक बधाईयाँ व हार्दिक शुभकामनाएं - सं.)

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तेजेन्द्र के अप्रवासी पात्र : अप्रवासी पाठक का दृष्टिकोण

: सुमन कुमार घई

कुछ दिन हुए, तेजेन्द्र शर्मा की कहानी बेघर आँखें पढ़ी और उसके कुछ दिन बाद छूता फिसलता जीवन। इन दोनों कहानियों के पढ़ने के बाद मन में कुछ प्रश्न उठे और उनके उत्तर भी उभरे। यही दो कहानियाँ ही क्यों; तेजेन्द्र शर्मा की जो कहानियाँ भारतेत्तर पृष्ठभूमि को लेकर रची गई हैं, उन सब के साथ आप्रवासी बहुत सहजता से जुड़ जाता है। आप्रवासी पाठक का वह लगभग जिया हुआ सच होता है या यूँ कहा जाए कि कथानक काल्पनिक न होकर सम्भावित घटनाक्रम होता है।

यह तो स्थापित तथ्य है कि लेखक अपनी रचनाओं में अपने समाज को उतारता है; चाहे वह चेतन से उभरे या अवचेतन से। जैसा कि तेजेन्द्र शर्मा ने अपने कहानी संकलन बेघर आँखें की भूमिका में भी कहा है कि ......इसीलिये मेरी कहानियों में, ग़ज़लों में, कविताओं में मेरे आसपास का माहौल, घटनाएँ और विषय पूरी शिद्दत से मौजूद रहते हैं। मैं अपने आप को अपने आसपास से कभी भी अलग करने का प्रयास नहीं करता। इसीलिये मेरी कहानियों में एअरलाईन, विदेश, प्रवासी, रिश्तों में पैठती अमानवीयता और खोखलापन, अर्थ से संचालित होते रिश्ते, महानगर की समस्याएँ सभी स्थान पाते हैं।”

तेजेन्द्र शर्मा के कथन में एक सत्य निहित है -....मेरे आसपास का माहौल, घटनाएँ और विषय पूरी शिद्दत से माजूद रहते हैं। मैं अपने आप को अपने आसपास से कभी अलग करने का प्रयास नहीं करता। वह एक लम्बे अर्से से इंग्लैंड के निवासी हैं और वहाँ का सामाजिक, प्राकृतिक और धार्मिक वातावरण और सरोकार उनकी रचनाओं में दिखाई देते हैं। किसी भी देश, प्रान्त, वर्ग या सभ्यता के कुछ स्थूल और कुछ सूक्ष्म गुण होते हैं। यह गुणवत्ता भी लेखक की सृजनधर्मिता का एक महत्वपूर्ण अंग है। इन गुणों को केवल ऊपरी रूप से देखने से नहीं समझा जा सकता बल्कि उस समाज का अभिन्न अंग बनकर; उस समाज को जीना पड़ता है। तभी यह सामाजिक अनुभव फिर लेखक की रचना में अनुमान नहीं अपितु अनुभव के रूप में निखरता है और लेखक की कलम सजीव हो उठती है।

इस लेख का उद्देश्य भारतीय मान्यताओं का खण्डन नहीं अपितु उनका आप्रवासी मान्यताओं के साथ तुलनात्मक अध्ययन है। इस बात का अध्ययन है कि एक ही घटना को अपनी अपनी मान्यताओं के अनुसार भारतीय और आप्रवासी भारतीय कैसे आंकते हैं।

‘बेघर आँखें का नायक शुक्ला भारत लौटकर किरायेदार से अपना घर खाली करवाना चाहता है। भारत प्रवास से पहले उसके पास इस घर को बेचने का भी विकल्प था परन्तु इस घर में उसकी स्वर्गीय पत्नी की स्मृतियाँ बसी हैं और वह उन्हें अभी भी जी रहा है। अपनी नई पत्नी की आपत्ति के बावजूद वह अपना घर किराये पर दे देता है। यहाँ पर उसकी पत्नी सुनेत्रा और उसकी तकरार की पर्तों को नहीं खोलेंगे। हमारा केन्द्र-बिन्दु शुक्ला और उसके मित्रों की सोच है। उचित विचार-विमर्श और परिस्थितियों को देखते हुए तय होता है कि किरायेदार को ज़बर्दस्ती निकालने के सिवाय कोई दूसरा उपाय नहीं है। शुक्ला के मित्र चिरपरिचित, सामन्य जीवन जीते हुए, मध्यवर्गीय महानगर निवासी हैं, कोई गुण्डे-मावाली नहीं। उनके लिए भी अगर किरायेदार सीधे ढंग से घर खाली नहीं करता तो उसका सामान, उसकी नव-ब्याहता के सामने, जिसका इस घर में अभी पहला ही दिन है; बाहर फेंक देना उचित है।

शुक्ला आप्रवासी है, उसके जीवन के मूल्य और मान्यताएँ बदल चुकी हैं। इस ज़बर्दस्ती के सौदे से वह अपराध-बोध ग्रस्त होता हुआ, अपने झूठे, बेईमान किरायेदार के आगे भी लगभग क्षमाप्रार्थी है। उसे अपनी स्वर्गीय पत्नी की आँखों में उभरते प्रश्नों का उत्तर जो देना है।

‘छूटता फिसलता जीवन में आप्रवासी चरित्र का एक दूसरा पक्ष उभरता है। कहानी की नायिका मैंडी (मनदीप) की या उसकी माँ की ओर ध्यान न जाकर मेरा ध्यान मैंडी के दारजी पर केन्द्रित हुआ। मैंडी का बलात्कार हो जाता है। माँ इस अपराध को छिपा लेना चाहती है क्योंकि उसे बेटी की बदनामी का डर है। परन्तु दारजी, सीधे-सादे, कानून पर विश्वास करने वाले सज्जन हैं। इस कहानी में भारतीय सोच/समझ जो कि वहाँ के सामाजिक अनुभव पर आधारित है और आप्रवासी सोच/समझ जो विदेशी सामाजिक अनुभव पर आधारित है, का अन्तर स्पष्ट होता है।

दारजी अपनी बेटी मैण्डी के साथ पुलिस-स्टेशन रिपोर्ट लिखवाने जाते हैं। वहाँ पर भेद-भाव की नीति के कारण उनकी रिपोर्ट दर्ज करने में देरी होती है तो दारजी भड़क उठते हैं, और सीधे पुलिस ऑॅफ़िसर से जाकर इसका विरोध करते हैं। सामने बैठा अधिकारी दारजी की अचानक डांट से गड़बड़ा गया। उसे किसी भी भारतीय मूल के व्यक्ति से इस प्रकार की भाषा की उम्मीद नहीं थी। वह दारजी की पोज़ीशन की इज्जत़ करते हुए रिपोर्ट लिखने लगा। मैण्डी के मेडिकल चैक-अप के लिये उसे हस्पताल भेजा गया। मैण्डी चुप थी, बीजी परेशान और दारजी आगे की सोच रहे थे।”

इस परिस्थिति को अब भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखिये। पहला प्रश्न है कि क्या कोई बाप बलात्कार की रिपोर्ट लिखवाने, विशेषकर अपनी बेटी को साथ लेकर पुलिस स्टेशन जाने का साहस करेगा? दूसरा, क्या पुलिस के रवैये के विरोध में अपनी आवाज़ उठा पाएगा? यद्यपि पुलिस स्टेशन में घटी इस छोटी सी घटना का कथानक में कोई विशेष रूप से अधिक महत्व नहीं है। परन्तु आप्रवासी सोच और भारतीय सोच; जो कि सामाजिक अनुभव पर आधारित है, के अन्तर को स्पष्ट करती है। क्या दारजी भारत में रहते हुए पुलिस के अनुचित व्यवहार के विरोध में अपना आक्रोश प्रकट कर पाते? इस प्रश्न का उत्तर अधर में छोड़ना ही उचित समझता हूँ। तेजेन्द्र जी अपने काव्य संकलन ये घर तुम्हारा है की भूमिका में भी इसी तुलना की बात कह रहे हैं - मेरे शहर हैरो में जो बदलाव आते हैं मुझे झकझोरते हैं. जहां अन्य हिन्दी प्रवासी लेखक भारत की ओर देख कर नॉस्टेलजिक हो जाते हैं मैं सोचता हूं कि मेरा प्रवासी देश मुझ से क्या कह रहा है. टेम्स के आसपास का आर्थिक माहौल गंगा के आलौकिक महत्व से उसका सीधी तुलना करवाता है. मन आंदोलित होता है, और यही है वो भावना जो मुझ से कविता लिखवाती है।'

यह तुलना हर आप्रवासी हर कदम पर करता रहता है। उसकी आत्मा में रची-बसी जन्म-भूमि की सुगन्ध, उसके चाहते न चाहते हुए भी उसके अन्तर्मन में समाई रहती है। परन्तु वह वर्तमान में जीता है। उसका भविष्य भी उसकी अपनाई हुई नई भूमि है जो सम्भवतः उसके बच्चों की जन्मभूमि है। इस वर्तमान के प्रति भी उसके मन में भावनाएँ होती हैं। इसीलिए जब भी कुछ विशेष घटना होती है तो यह तुलना स्वतः उभर कर समक्ष खड़ी हो जाती है।

तेजेन्द्र शर्मा अपने लेखन में आप्रवासी अनुभव को पूर्णतः उतारा है। इसी अनुभव का दूसरा पक्ष क़ब्र का मुनाफ़ाक् में पढ़ने को मिलता है। जहाँ कुछ प्रवासी बरसों बाहर रहने के बाद भी यहाँ का जीवन नहीं अपना पाते तो कुछ ऐसे भी होते हैं जो स्वदेशी सभ्यता-संस्कृति से बिल्कुल विमुख हो जाते हैं। और अधिकतर ऐसे होते हैं जिनका सभ्यता-संस्कृति से कुछ लेना देना नहीं बल्कि उनके जीवन का उद्देश्य केवल मुद्रा अर्जन है। कब्र का मुनाफ़ा के दो पात्र ख़लील ज़ैदी और नजम जमाल इसी साँचे में ढले हैं। ऊपरी दिखावे की ज़िन्दगी उनके लिए अधिक महत्व रखती है - “भई, एक बार लाश रॉल्स राईस में रखी गई तो हैम्पस्टैड क्या और कार्पेण्डर्स पार्क क्या। यह कब्रिस्तान ज़रा पॉश किस्म का है। फ़ाइनेंशियल सेक्टर के हमारे ज़्यादातर लोगों ने वहीं दफ़न होने का फ़ैसला लिया है। कम से कम मरने के बाद अपने स्टेटस के लोगों के साथ तो रहेंगे।'

ऐसे आप्रवासियों की भी कोई कमी नहीं। प्रायः पार्टियों में ऐसी सोच वाले लोग मिल जाते हैं। अन्तर केवल इतना है कि लेखक इन्हें भुला नहीं पाता और यह अनुभव उसकी रचना का भाग बन जाते हैं।

तेजेन्द्र शर्मा ने इंग्लैण्ड के समाज की सफलताओं, विफलताओं, हँसी, रुदन, प्र.ति, इतिहास और प्रचलित विचारधाराओं को आत्मसात किया है। इसीलिए उनके लेखन में वहाँ के समाज के प्रति समझ, ईमानदारी और गहराई दिखाई देती है। ऐसा नहीं है कि उन्होंने अपना वर्तमान से नाता रखा है और भारत से सम्बन्ध ही तोड़ लिया हो - हाँ कई बार वह बँटी हुई वफ़ादारी के उहापोह से बहस करते हुए दिखाई पड़ते हैं। ऐसा उनकी यह घर तुम्हारा है काव्य-संकलन की रचनाओं में दिखाई देता है। उसकी एक रचना दोहरा नागरिक में उनका स्वयं से ही विवाद हो रहा है, कहते हैं -

मेरे बदन से नहीं आयेगी उसे

किसी दूसरे के शरीर की गंध

उसे नहीं रखना है मुझे

करके अपनी साँसों में बंद

क़द्र ओहदे की करे, इंसां को नहीं जाने

मुझसे अपनी ज़ुबां में वो कभी न बात करे

उसे बस रहता है मेरी पूंजी से ही काम

फिर चाहे मैं लिख दूं उसके नाम के साथ अपना नाम

इस आलेख के सन्दर्भ में एक और प्रश्न बार-बार मन में उठ रहा है। आज के विश्व में देशों की सभी सीमाएँ टूट रही हैं, अंतरजाल के माध्यम से दूरियाँ समाप्त हो रही हैं। देशों की संस्कृतियाँ मिश्रित रूप ले रही हैं। वास्तव में विश्व एक विश्वग्राम बनता जा रहा है। अगर यह सब सच है तो भारत से बाहर रचे जा रहे साहित्य को प्रवासी साहित्य कह कर मुख्यधारा से बाहर हाशिए पर क्यों रख दिया जाता है? अगर भारतीय आलोचक आप्रवासी साहित्य पर मुख्यधारा (?) से टूटे होने का आरोप लगाता है तो क्या आप्रवासी लेखक भारतीय आलोचक पर आप्रवासी लेखन को न समझ पाने का आरोप नहीं लगा सकता? कारण वही है जो तेजेन्द्र के आप्रवासी साहित्य में दिखाई देता है। दैनिक जीवन के सूक्ष्म अनुभव; जो जिए बिना नहीं जाने जा सकते। क्या किसी आलोचक को, जिसने इनको जिया ही नहीं, इनके खण्डन का अधिकार है?

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बहुत ही अच्छी अभिव्यक्ति सर.....शुक्ला.....मैड़ी...

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