बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

सुरेन्द्र अग्निहोत्री की कविता - नौसिखुआ न कहो

नौसिखुआ न कहो.....

जवां हैं हम

जवां हैं उमंगें

हर ताल पर झूम

सजगता की अभिव्यक्ति

रंगो से बुना यथार्थ

बाजीगरों के नए ठिकाने

रोशनी की नई किरण

महलों में गूंजता ककहरा

परंपरा की डोर थामे

उदारता हो प्‍यार का आधार

लय की समझ के लिए

लिख रही तकदीर परदे पर

रग-रग में उतरता राग

सुनाई दे रही

भविष्‍य की दस्‍तक

हरफन मौला हो

तो मुश्‍किल नहीं चुनौती

एक सपना उंची उड़ान का

अनुभव असल जिन्‍दगी के

अब यहां से कहां जाए हम

सपने कभी नहीं मरते

कभी न कभी सच होते हैं

कभी अंधेरे में जन्‍मते हैं

तो उजाले में पूरे होते हैं

000

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

ए-305, ओ.सी.आर.

विधान सभा मार्ग;लखनऊ

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