बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

अमरीक सिंह कंडा की लघुकथाएँ

कंडे का कंडा

जानवर मनुष्य

ब्रह्मा जी ने आदेश दिया कि एक महीने के बाद मनुष्य बनाने का काम बंद कर दिया जाए। देवता जल्दी-जल्दी जानवर बनाए जा रहे थे। ब्रह्मा जी उनके पास बैठे थे। जानवरों के अंगों के ढेर लगे पड़े थे। देवताओं ने पूछा, ‘‘ब्रह्मा जी, हम मनुष्य बनाना क्यों बंद कर रहे हैं?’’

ब्रह्मा जी बोले, ‘‘एक मनुष्य को बनाने के लिए एक हजार जानवरों जितना समय लग जाता है। ये मनुष्य नीचे जाकर जानवरों को खाने लगते हैं। हमारा नरक वाला हिस्सा पूरी तरह भरने वाला है। कुछ देर तक यह मनुष्यों से भर जाएगा। इससे पहले कि यह भर जाए मैं दुनिया का नए सिरे से सृजन करूंगा।’’ अब देवता चुप थे

 

ड्यूटी

‘‘रीना आज फिर तुम 2 घंटे लेट आई हो। मेहता साहब बहुत गुस्से में हैं। तुझे कैबिन में बुलाया है। जल्दी जा कहीं नौकरी से हाथ न धो बैठना।’’ भानू प्रसाद ने कहा।

‘‘मे आई कम इन सर?’’

‘‘कम इन। तुम 2 दिन दफ्तर क्यों नहीं आई?’’

‘‘सर, मेरी मां बहुत बीमार है, मैं इसलिए नहीं आ सकी।’’

‘‘बहुत बढ़िया बहाना है, आज 2 घंटे लेट होने का बहाना। तुम कोई और नौकरी तलाश करो। तुम ड्यूटी को ड्यूटी नहीं समझती।’’ मेहता साहब गुस्से में सामने खड़ी रीना को कह रहे थे।

‘‘सर, मेरी 2 छोटी-छोटी बहनों तथा बूढ़े मां-बाप का क्या होगा? मुझे नौकरी से मत निकालिए। यदि मुझे नौकरी से निकाल दिया तो हम सब किस के सहारे जीएंगे?’’

‘‘मेरे सहारे।’’ मेहता साहब ने शैतानी हंसी हंसते हुए कहा।

रीना दिन की बजाय अब रात की ड्यूटी पर आने लगी थी। उसे अब ड्यूटी का वास्तविक अर्थ पता चल गया था। अब मेहता साहब को रीना से कोई?शिकायत नहीं थी।

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