रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

चंद्रेश कुमार छतलानी के दो लघु आलेख - सदगुरु, नवरात्रि

 

(1) सद्गुरु

सद्गुरु का अर्थ ऐसा सच जो हमें अन्धकार से प्रकाश की और ले जाए। शिक्षा देने वाले हमें कई मिल जाते है, शिक्षा - सीख है और ज्ञान - सच !
कई लोग गुरु की तुलना शिक्षक से भी करते हैं। गुरु जो कि गोविन्द से भी पहले होता है, शिक्षक उसकी बराबरी नहीं कर सकता है। गुरु क्या है, गुरु के बारे में कहा गया है कि 

गुरुबुध्यात्मनो नान्यत् सत्यं सत्यं वरानने |
तल्लभार्थं प्रयत्नस्तु कर्त्तवयशच मनीषिभिः ||


अर्थात गुरु हमारे स्व-चेतन से भिन्न नहीं है। बुद्धिमान पुरुषों के आत्मज्ञान लेने के लिए गुरु के पास जाना चाहिए। गुरु सर्वोच्च ज्ञान देता है, शिक्षक सिर्फ शिक्षा तक ही सीमित है। शिक्षा और ज्ञान में फर्क है। हम लोग कई बार अज्ञानवश शिक्षा को सब कुछ समझ लेते हैं, शिक्षा शब्द शिक्ष धातु से बना है जिसका अर्थ है 'सीखना।' भौतिक शिक्षा अनुकरण के द्वारा सीखी जाती है जिसका संबंध ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेद्रिंयों व मन बुद्धि तक ही सीमित है। लेकिन जो बुद्धि से परे है जो आत्मा से जुड़ा है और जो सच के अनुभव पर आधारित है वो ज्ञान है।


शिक्षा कई बार अहंकार पैदा कर देती है क्योंकि शिक्षित व्यक्ति को यश मिलता है, लेकिन ज्ञान अहंकार को दूर कर देता है क्योंकि ज्ञान होने के बाद व्यक्ति स्व से जुड़ जाता है।


हालांकि ज्ञान को पाकर भी कई लोग ज्ञान को समझ नहीं सकते हैं, उन्हें वो तुच्छ लग सकता है, ये भी अहंकार है। इसलिए सद्गुरु की आवश्यकता होती है, जो अहंकार को पूर्ण रूप से ख़त्म करके, ज्ञान को अंतर्मन में उतार देता है और फिर पहले हमारी आत्मा और धीरे धीरे हमारी ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेद्रिंयां, मन और बुद्धि ज्ञान को आत्मसात कर लेती है और हम ज्ञान में डूब जाते हैं। तब ज्ञान का आनंद आना शुरू होता है, हर पल, हर जगह, हर परिस्थिति में। सोते जागते खाते पीते हमें ज्ञान का बोध रहता है और इस अवस्था में आने के बाद हम ज्ञानी कहलाते हैं। यह अवस्था सद्गुरु के आशीर्वाद के बिना नहीं आ सकती है ।


सिर्फ ज्ञान प्राप्त करने वाला ज्ञानी नहीं हो जाता, ज्ञान के साथ जीने वाला ज्ञानी होता है। ज्ञान के साथ जी लें, ईश्वर हमें यह आशीर्वाद दें। हम सब ज्ञानी बनें, सिर्फ ज्ञान को लेकर बैठें नहीं ज्ञान को अपने में बैठा लें।

(2) नवरात्रि में ना रहे देवी उदास

नवरात्रि की आप सब को बहुत बहुत शुभकामनाएं।।
हिंदू धर्म में मान्यता है कि सार्वभौमिक रचनात्मक बल स्त्री लिंग हैं | मूल बल महामाया है जिसकी प्रेरणा से ईश्वर और बाकी ब्रह्मांड बने हैं। महामाया के बिना संरचना, पोषण, रक्षा और आनंद की कल्पना नहीं की जा सकती। यह प्रेरणा ही सम्पूर्ण सृष्टि की जीवन शक्ति है| सभी बड़े और छोटे ऊर्जा और बल का प्रतिनिधित्व विभिन्न देवियों द्वारा हिन्दू धर्म में किया गया है। इस प्रकार, एक कुंवारी लड़की को शुद्ध बुनियादी रचनात्मक शक्ति का प्रतीक माना गया है और नवरात्रों में इनकी पूजा का विधान है। नवरात्र में हम उसी नारी शक्ति को पूजते हैं. भारतीय दर्शन ने मां दुर्गा के माध्यम से नारी-शक्ति को महत्व दिया है.

ईश्वर की उत्पत्ति के इस प्रतीक को हम जिस तरह से पूज रहे हैं वो वास्तव में सराहनीय है। देवी माता की पूजा और फिर देवी की ह्त्या -- भ्रूण में ही। ईश्वरीय रचना और ऊर्जा व शक्ति के इस समय में इन नौ रात्रियों को नवरात्रि से हम में से कई लोग हमारी देवी के लिए ही  कालरात्रि बना देते हैं। यानी कि ईश्वर द्वारा बनाए हुए विधान में भी परिवर्तन -- सराहनीय है !!!


और सिर्फ नवरात्रि ही नहीं -- हर रात्रि कालरात्रि हो गयी है -- जबकि सिर्फ सातवीं रात्रि कालरात्रि होती है | हर दिन कोई ना कोई देवी भ्रूण वध कर रहा है।
तो फिर इसके बाद -- क्या अधिकार है हमें देवी पूजन का ? पहले वध और फिर पूजन ये तो वही हुआ कि स्मैक और चरस के व्यापारी ड्रग्स निरोधक संस्थानों के अधिपति बने हुए हैं। और फिर देवी पूजा से फ़ायदा भी क्या, जिस धनात्मक ऊर्जा की प्राप्ति हम करना चाहते हैं, उससे बहुत अधिक ऋणात्मक ऊर्जा तो हम वातावरण में पहले ही बिखेर चुके हैं। अगर हम नहीं तो कई इसे लोग जिन्हें हम जानते हैं।


कैसे हम उच्च ऊर्जा पायेंगे, देवी पूजन से उत्पन्न हुई ऊर्जा तो वातावरण को सही करने में ही लग जायेगी -- हम तक तो पहुँचना दूर की बात है। मन की संतुष्टि ज़रूर हो जायेगी। हाँ, लेकिन जिस दिन आपको लगे कि देवी भ्रूण वध सही नहीं है, वातावरण का सत्यानाश हो रहा है इसके जरिये -- तो आप समझिये कि अब देवी पूजा का सही समय है। अब वो ऊर्जा आप तक पहुँच रही है -- अन्यथा तो सब ढकोसले ही हैं


नवरात्रि की प्रथम दिवस पूज्या शैलपुत्री को प्रणाम।।।
प्रथम दुर्गा त्वहिभवसागर तारणीम्.
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
त्रिलोकजननींत्वंहिपरमानंद प्रदीयनाम्.
सौभाग्यारोग्यदायनीशैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन.
भुक्ति, मुक्ति दायनी,शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन.
भुक्ति, मुक्ति दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥

चंद्रेश कुमार छतलानी

 

-- 


Chandresh Kumar Chhatlani

http://chandreshkumar.wetpaint.com

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget