रविवार, 21 अक्तूबर 2012

देवेन्द्र पाठक 'महरूम' की ग़ज़ल - राम मेँ क्यूँ रहमान न देखा, क्यूँ रहमान मेँ राम न देखा

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राम मेँ क्यूँ रहमान न देखा .

क्यूँ रहमान मेँ राम न देखा .

 

देखी पूजा-पाठ,इबादत ;

पर मन का शैतान न देखा .

 

दोपाए आदमख़ोरोँ का ;

कोई धरम-ईमान न देखा .

 

मंदिर-मस्जिद बनते जिनसे;

अलग-अलग सामान न देखा.

 

बारिश,धूप,हवा,ख़ुश्बू पर ;

सरहद का व्यवधान न देखा.

 

ढाई आखर का कुरआन या

गीता मेँ अपमान न देखा .

 

कल्लूख़ान या कल्लूराम मेँ ;

क्यूँ 'महरूम' इंसान न देखा.

= = = = = = = = = = = =

3 blogger-facebook:

  1. महोदय आपकी इस रचना का जबाव नही,
    परन्तू जो आप इसमेँ पूछ रहेँ हैँ तो अपने शब्दोँ मे बताना चाहूँगा कि हम नाकारात्मक सोच वाले इंसान है,
    हमने कल्लुखान और कल्लुराम मे जो "नही" मिलता वो तो देख लिया पर जो मिल रहा है वो न देख पाये!

    उत्तर देंहटाएं
  2. महोदय आपकी इस रचना का जबाव नही,
    परन्तू जो आप इसमेँ पूछ रहेँ हैँ तो अपने शब्दोँ मे बताना चाहूँगा कि हम नाकारात्मक सोच वाले इंसान है,
    हमने कल्लुखान और कल्लुराम मे जो "नही" मिलता वो तो देख लिया पर जो मिल रहा है वो न देख पाये!

    उत्तर देंहटाएं
  3. achhi rachanayen. insan ke dilo dimag par asar karne layak.

    manoj 'aajiz'

    उत्तर देंहटाएं

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