रविवार, 21 अक्तूबर 2012

प्रमोद कुमार सतीश की कविता-- आज की हकीकत


ओहदा बढ़ रहा है गद्दारों का
निशां मिट रहा है वफादारों का
तू यहां इंसानियत ढूंढता है
ये शहर नहीं है खुद्दारों का
हर तरफ बिखरी पड़ी हैं लाशें
दौर है जिन्दगी के व्यापारों का
जो भी आता है बिक जाता है यहाँ
अजब रुतबा है खरीददारों का
शोहरत से तय होती है औकात
यही चलन है बाजारों का
शराफत सरॆआम होती है नंगी
यहाँ कब्जा है गुनहगारों का
बगावत की बू हवा में उड़ जाती है
कोई हाकिम नहीं है राजदारों का
सियासत की नदी हद भूल बैठी है
सब्र टूट रहा है किनारों का

--
प्रमोद कुमार सतीश
म0न0 109/1 तालपुरा झाँसी

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